(जनवादी कवि ओमसिंह अशफ़ाक की एक लोकप्रिय कविता है ‘जब इंसाफ कहीं ना होता हो'(अन्याय गाथा)। उक्त कविता के कुछ बंध प्रसंगवश कुछ लेखों में हमारे पाठकों तक पहुंचे तो कुछ ने पूरी कविता पढ़ने की जिज्ञासा प्रकट की। पाठकों की सुविधा के लिए शेष बंध भी यहां किस्तों में दिए जा रहे हैं ताकि पाठक देख सकें कि उस वक्त के हालात और आज के हालात में कितनी आश्चर्यजनक समानता है! फिर सरकारों के बदलने से आख़िर क्या बदला है? -संपादक)
समय के सामने कवि और कविता-2
ओमसिंह अशफ़ाक
कविता: जब इंसाफ कहीं ना होता हो!
1.
जब फाईनेंसर आंख दिखाता हो !
बिना कुड़क करे ना जाता हो !
गुंडागर्दी पे अड़ आता हो !
ना इज्जत का कोई खाता हो !
कोई रस्ता भी नजर ना आता हो !
सत्ता में उनका हिस्सा हो !
यूं रोज-रोज ये किस्सा हो !
ना अंटी में जब पिस्सा हो !
फिर चतरा हो,चाहे घिस्सा हो !
भई! दिन बरजण के आन पड़े !
2
जब कर्जे-नीचे घिट्टी हो !
उपजाऊ खेत की ना मिट्टी हो !
जब दिन में तारे दिखने लगें !
जब डंगर-ढोर भी बिकने लगें !
बाजार रात-दिन चढ़ता हो !
और उत्पादन ना बढ़ता हो !
यूं टोटा घर में बढ़ने लगे !
कुणबा आपस में लड़ने लगे !
भई! दिन बरजण के आन पड़े !
3.
जब बादल संकट के ना छटते हों !
अख़बार मौत से अंटते हों !
नौजवान रोज़ ही घटते हों !
जण नदी किनारे रपटते हों !
पूरे कुणबे के ना पटते हों !
नेता ना बचन पे डटते हों !
बस पूंजी-पूंजी रटते हों !
भई ! दिन बरजण के आन पड़े !
4.
जब मालिक का धर्म मुनाफा हो !
मज़दूर के घर में फा़का हो !
यूं रोज-रोज फिर साक्का हो !
कोई भी चाहे इलाका हो !
ना साधाारण कोई वाक्का हो !
दुनिया में सुणे धामाका हो !
भई ! दिन बरजण के आन पड़े !
5.
फिर गुड़गांव में खूनी खेल चलै !
श्रमिक के ‘लहू की रेल’ चलै !
जब ‘जापानी’ खून का प्यासा हो !
मज़दूर पे चलता गंडासा हो !
अफ़सर बोल्लें वही भाषा हो !
ना सी. एम. देण दिलासा हो !
भई ! दिन बरजण के आन पड़े !
(दिसंबर,2006)
(शेष शीघ्र अगली किस्त में)
