जसवीर त्यागी की कविताएं- कामगार स्त्री और स्वप्न

जसवीर त्यागी की कविताएं- कामगार स्त्री और स्वप्न

कामगार स्त्री

 

वह सुडौल कामगार स्त्री
शिशु को साथ लेकर आती है काम पर

ठेकेदार चार बात सुनाता है
शिशु को देखकर नाक भौं सिकोड़ता है
स्त्री के प्राण शिशु में बसते हैं

ठेकेदार स्त्री को अकेली देख
फेंकता है प्रेम का पासा
मौका पाकर करता है चुहलबाजी

और अहसान जताता है
उसी के रहमोकरम पर
मिल रही है स्त्री को रोज की दिहाड़ी

अपने काम में डूबी स्त्री रहती है मौन
ठेकेदार उसके मौन को स्वीकृति समझता है

कामगार स्त्री
सब जानती-समझती है
ईंट,रेत,मिट्टी,पानी का गुण

ठेकेदार की चालाकियों से ज्यादा
उसे अपने शिशु की
नींद की चिंता सताती है।

स्वप्न

जब कविताएँ
नहीं लिख पाता

तब कविताओं की पुस्तक
सिरहाने रखकर सोता हूँ

चाहता हूँ
अगर कविता नहीं लिख पा रहा

तो कविता के स्वप्न ही
बचे रहे जिंदगी में।

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