क्या ये चुपचाप अमेरिका का भारत को एक बड़ा झटका है
संजय श्रीवास्तव
बीते जून में अमेरिकी सेना ने अपने इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर फिर से पैसिफिक कमांड कर दिया…. कहने को इसका मतलब कुछ खास नहीं माना जाएगा. भारतीय मीडिया जगत ने तो इसको कोई महत्व ही नहीं दिया. बेशक अमेरिका के पास अपने कमांड का नाम बदलने का अधिकार है और वो ऐसा कर भी सकता है.
लेकिन अगर इसका प्रतीकात्मक मतलब देखा जाए तो इसमें अहम भू-राजनीतिक संकेत भी छिपे हैं. अमेरिका की नजर में भारत का महत्व कम हो रहा है. पाकिस्तान अमेरिका और चीन के साथ संतुलन में बाजी मार चुका है. साथ ही अमेरिकी की नई रणनीति में भारत के पड़ोसियों को अमेरिका पहले से कहीं ज्यादा महत्व देने लगा है.
खैर पहले यूएस पैसिफिक कमांड की बात कर लेते हैं. क्यों इसका नाम बदलकर भारत को आठ साल पहले ट्रंप के पहले कार्यकाल में एक खास इज्जत बख्शी गई थी. वर्ष 2018 में ट्रंप प्रशासन ने अपनी प्रशांत महासागर से लेकर हिंद महासागर तक सक्रिय रहने वाली कमांड का नाम इंडो पैसिफिक कमांड कर दिया गया. बीते जून में ये नाम फिर से पैसिफिक कमांड हो गया. ये कमांड 1947 में स्थापित हुई थी. ये अमेरिका की सबसे पुरानी और सबसे बड़ा यूनिफाइड कांबेटेंट कमांड है.
जब 2018 में इसका नाम इंडो पैसिफिक कमांड दिया गया तो मकसद था: भारतीय और प्रशांत महासागरों के बढ़ते कनेक्शन को स्वीकार करना. खासकर भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका पर मुहर लगाना. सबसे बड़ी वजह चीन के बढ़ते प्रभाव को काउंटर करना.
जब ट्रंप दूसरी बार सत्ता में आए तो उन्होंने भारत को लगातार कई झटके दिए. इसके उलट पाकिस्तान से सदाशयता दिखाई. ट्रंप प्रशासन का कहना है कि कमांड का नाम फिर से बदला गया ताकि उसकी ऐतिहासिक विरासत को सम्मान दिया जाए. सैनिकों में गर्व की भावना जगाएं. पेंटागन का कहना है कि ये केवल नाम में बदलाव भर है.
अब प्रतीक संदेशों पर बात कर लेते हैं. अमेरिका ने क्वाड को पहले ही ठंडे बस्ते में डाल दिया है. भारत ने पिछले दिनों क्वाड में गर्मी लाने के लिए आस्ट्रेलिया से बात कई लेकिन मामला ठन ठन गोपाल ही ज्यादा रहा. अमेरिका पिछले कुछ समय से भारत की भूमिका को लगातार डाउनग्रेड कर रहा है, ये कदम उसी तरफ एक इशारा हो सकता है.
भू-राजनीति की बुनियादी बातें बताती हैं कि नाम कभी केवल नाम नहीं होते. वे संकेत, रुख और रणनीतियां होते हैं. वे अगली कूटनीति और सैन्य गतिविधियों के आगामी चरणों की तैयारी भी होते हैं.
जब अमेरिकी पैसिफिक कमांड से इंडो शब्द हटाया गया तो भारतीय सांसद शशि थरूर ने X पर लिखा, “क्या यह क्वाड के ताबूत में एक और कील है?” हालांकि देखा जाए तो दक्षिण एशिया में अमेरिका चुपचाप बहुत कुछ ऐसा कर रहा है., जो भारतीय हितों के लिए चिंताजनक है.
पहले ढाका, काठमांडू और कोलंबो के साथ कुछ करने के लिए अमेरिका आमतौर पर भारत को भी विश्वास में लेने लगा था वाशिंगटन चुपचाप उस युग के अंत की घोषणा कर रहा है जिसमें भारत इस क्षेत्र के लिए अमेरिका का कथित उप-ठेकेदार था. अब वो इन देशों से सीधे संपर्क साध रहा है. बीच में अब भारत की कोई भूमिका नहीं.
अब एक अलग दक्षिण एशिया का उदय हो रहा है जिसमें अमेरिका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल के साथ सीधे और अधिक घनिष्ठ रूप से जुड़ रहा है. भारत की भूमिका को खत्म कर रहा है. वाशिंगटन ने दक्षिण एशिया की हर राजधानी को नई दिल्ली की शाखा के रूप में मानना बंद कर दिया है.
अमेरिका बीजिंग के साथ चुनिंदा समझौते कर रहा है, बांग्लादेश में लोकतांत्रिक बदलावों का समर्थन कर रहा है, नेपाल के साथ सीधे तौर पर बातचीत कर रहा है, म्यांमार में ऐसे कदम उठा रहा है जिन्हें भारतीय सरकार अपने पूर्वोत्तर की सुरक्षा को जटिल बनाने वाला मानती है.
इसमें सबसे ज्यादा फायदे की स्थिति में पाकिस्तान है. उसकी विदेश नीति के सारे पत्ते इस समय ऐसा लगता है कि सही पड़े हैं. चीन के साथ उसके रिश्ते और मजबूत हुए हैं. वो चीन को अपने यहां रेको डिक तांबा और सोने के भंडारों को तलाशने और प्रोसेस करने का ठेका दे रहा है.
दूसरी ओर अमेरिका से भी 19 प्रतिशत का अनुकूल टैरिफ हासिल कर चुका है. बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को अमेरिका द्वारा आतंकवादी संगठन घोषित करवा चुका है. कुल मिलाकर पाकिस्तान ने अपने दोनों हाथों में लड्डू पकड़े हुए हैं.
बांग्लादेश बेशक भारत के साथ संबंध बेहतर रखने की बात कर रहा है लेकिन चीन और पाकिस्तान को ज्यादा तवज्जो दे रहा है. अमेरिका के लिए भू रणनीतिक और व्यापारिक तौर पर ज्यादा मुफीद जगह बन रहा है. तो फिलहाल शतरंज के इस खेल में भारत के मोहरे अब उस स्थिति में नहीं रहे, जैसा पहले लगते थे.
संजय श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से साभार

लेखक – संजय श्रीवास्तव
