विदेशी कंपनियों का खेल

जन सरोकार

विदेशी कंपनियों का खेल

रणबीर सिंह दहिया

कमलू – इन विदेशी कंपनियों में और अमरीका में भी ठनी है कभी? सरला – अब तक तो ठनी नहीं है। बेशक आपस में कहा सुनी करती हों पर टाइम आने पर एक हो जाती हैं। ठमलू – और एक बात का और कमाल कर दिया इन कंपनियों ने। सरोज – थोड़ी खोल के बता। ठमलू – हवा, पानी, आकाश सब जगह जहरीली गैसों का जहर घोल दिया और किसे की सुनती भी नहीं।

रमलू – तो फिर ये दुनिया जिएगी कैसे ? कमलू – इन को क्या लेना देना है। उनको तो अपने मुनाफे से मतलब है। इनको सत्ते और सरोज से क्या लेणा? सरला – देखो पूरी मानवता को और मनुष्यता को खतरा पैदा हो गया है। रमलू – एक बात है। सरला – कौनसी?

रमलू – ये तो जहर घोल रही हैं पर हम भी तो जहर घोलने मैं उनका साथ देते हुए आगा पीछा नहीं देखते। सरोज – हमने तो अपना आप ही नहीं देखना शुरू किया है, आगा पीछा कौन देखेगा? ठमलू – भाई या बात तो समझ आगी कि अपने मुनाफे के लिए इन कंपनियों ने नाश कर दिया, फेर क्या किया जाए?

कमलू – हमारी तो गुजरेगी भाई। फेर दुनिया के नौजवान युवक युवतियां को ये सारी बात देखनी और समझणी पड़ेंगी। सरला – यह तो यही बात है कि जवान लड़कियों को शामिल करे बिना बात सिरे नहीं चढ़ेगी। रमलू – सही बात है अब तो इस जवान पीढ़ी से ही कुछ उम्मीद है।

सरोज – इनको ही ये पूरी वैश्वीकरण और उदारीकरण की मार झेलनी है। ठमलू – हां,इन खूंखार और जंगली बहुराष्ट्रीय कंपनियां के वार झेलने हैं। सरला – इन नौजवानों का भी राह बान्ध दिया इन कंपनियां ने। ठमलू – वो कैसे? सरला – नशा, हिंसा और अश्लीलता सारे के परोस रखी बताई इन के लिए।

ठमलू – और के इनकी सोच, इनके रहण सहण के ढंग बदलने लग रही हैं ये कंपनी। सरोज – इनको गुमराह करने लग रही हैं। कमलू – इन कंपनियां को डर कि कभी ये नौजवान तबका उनके खिलाफ ना खड़ा हो जाए। रमलू – नौजवानों में सांस्कृतिक प्रदूषण बुरी तरह फैलाने लग रही हैं ये कम्पनी और हमारी बड़ी – बड़ी कम्पनियों वाले।

सरला – वातावरण का प्रदूषण भी तो उतनी ही रफ्तार से फैलाने लग रहे हैं। ठमलू – और क्या कहीं भूचाल आ रहा है, कहीं बाढ़ आ रही है, और कहीं तापमान बढ़ गया। सरोज – ये सारा प्रदूषण जहरीली गैसों के कारण बढ़ा है। सरला – म्हारे पर्यावरण का भठ्ठा बिठा दिया इन कंपनियां ने। ठमलू – इनके कारखाने और बी कसूता काम करने लग रहे हैं। रमलू – धरती का नीचे का पानी बिल्कुल खराब हो लिया बताया।

कमलू – नौजवानों की बात चली थी। इन को दारु की बोतल पकड़ा दी। सरोज – लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करनी सिखादी टीवी ने। सरला – कितना ए समझाल्यो फेर समझ ही नहीं आंती इनको। ठमलू – नहीं समझेंगे तो और दुख पायेंगे। रमलू – ठीक है पर ज्यादा नौजवान ऐसे नहीं हैं। वे चाहते हैं कुछ करना।

सरला – पर एक नौजवान, एक गांव, एक प्रदेश, एक देश के न्यारा न्यारा इन बहुराष्ट्रीय खूंखार जानवरों का मुकाबला कर सकता है क्या?

कमलू – नहीं कर सकता। कुछ नहीं होना जाना। रमलू – अमरीका का आज मुकाबला कौन कर सकता है? सरोज – ये सुना है कि क्यूबा कर रहा है मुकाबला। ठमलू – सही बात है। क्यूबा ने अब तक गोड्डे नहीं टेक लिये। सरला – तो इस मन्डी के खूंखार जनावरों से कैसे मुकाबला किया जा?

कमलू – मतलब हमारे इन आढ़तियां की लूट से बचने की राह भी शामिल कर लियो। सरोज – समाज में बसी जनता को अपनी अपनी जगह जात गोत नात भूल कर कठ्ठ बणा कर संघर्ष का बिगुल बजाना पड़ेगा। ठमलू – मतलब एक नौजवान से शुरू करके पूरे गाम में। रमलू – एक गाम से शुरू करके पूरे प्रदेश में। सरोज – एक प्रदेश से शुरू करके पूरे देश में।

कमलू – एक देश से शुरू करके पूरी दुनिया में बिगुल बजाणा पड़ेगा। रमलू – तो क्या असल में ऐसा हो सकता है क्या ? सरला – हो क्यों नहीं सकता। फेर मिनिस्टरों के बस्ते उठा कर नहीं होगा। ठमलू – चोरी करके? कमलू – चौबीस घंटे दारू पीके? सरोज – स्मैक चढ़ाके? रमलू – घरआली की पिटाई करके?

ठमलू – बलात्कारियां का साथ निभाके? कमलू – टीवी ऊपर उघाड़ी फिल्म देखके? सरला – अपना आप्पा खतम करके? ठमलू – बिन आई फांसी खाके? कमलू – सब क्याहैं को बिसराके अब काम नहीं चलेगा। रमलू – तो काम कैसे चलेगा?

कमलू – काम चलेगा सोच विचार करने से, बात को सही ढंग से समझ कर संगठन की ताकत बढ़ा करके। सरोज – सारे ईकठ्ठे होकर इस अमरीका के और इसके बाजारवाद के खिलाफ हमला बोलेंगे तो बात बनेगी। रमलू – इसके लिए तो फेर बड़ी तैयारी की जरूरत पड़ेगी लगता है । ठमलू – काम आसान नहीं है, फेर करना तो होगा ही।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *