‘टीएमसी के गुंडों और कम्युनिस्ट हरमादों के लिए’ एंटी-गुंडा कानून के समर्थन में सुवेंदु के बयान से आलोचकों की आशंकाएं और बढ़ीं
पश्चिम बंगाल सरकार के इस नए कानून पर कानून के जानकारों की राय पर रिपोर्ट
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी द्वारा राज्य के नए ‘एंटी-गुंडा कानून’ का बचाव करने से कानूनी विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ गई हैं। उनका कहना है कि अधिकारी की बातों से पता चलता है कि इस कानून का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कैसे किया जा सकता है।
सोमवार को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अघिकारी ने बयान दिया कि “34 साल के कम्युनिस्ट ‘हरमाड’ (हिंसक कैडर) और पिछले 15 साल के तृणमूल गुंडों पर लगाम लगाने के लिए इस कानून की बहुत ज़रूरत थी,” विधि के जानकारों ने कहा कि इससे ऐसा लगा मानो उन्होंने खुद ही मान लिया हो कि इस नए कानून का नतीजा क्या हो सकता है।
द टेलीग्राफ ऑनलाइन ने अपने पोर्टल पर सुवेंदु अधिकारी के बयान के बाद अहेली बनर्जी की कानून के जानकारों से बातचीत प्रकाशित की है। विशेषज्ञों ने इसे लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि उन्हें डर है कि यह कानून सरकार के राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने का एक हथियार बन सकता है।
आलोचकों का कहना है कि इस कानून को “कम्युनिस्ट हरमाड” और “तृणमूल गुंडों” — ऐसे शब्द जो बंगाल की राजनीतिक शब्दावली में गहराई से रचे-बसे हैं — के खिलाफ़ एक कदम के तौर पर पेश करके अधिकारी ने ध्यान आपराधिक गतिविधियों से हटाकर पहचाने जा सकने वाले राजनीतिक विरोधियों की ओर मोड़ दिया।
सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील कॉलिन गोंसाल्वेस ने ‘द टेलीग्राफ ऑनलाइन’ को बताया, “लोग इस बात से डरे हुए हैं कि यह कानून सरकार के राजनीतिक विरोधियों के लिए क्या मुसीबतें खड़ी कर सकता है।”
ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क के फाउंडर गोंसाल्वेस ने कहा, “यह कानून बेहद कठोर है। और भी बुरी बात यह है कि न्यायपालिका के प्रहरी सोए हुए हैं और सरकार के सख्त रवैये से पूरी तरह डरे हुए हैं।”
उनकी मुख्य आपत्ति ‘प्रिवेंटिव डिटेंशन’ (एहतियातन हिरासत) को लेकर है, जिसके तहत किसी अपराध के होने के बजाय भविष्य में गलत काम करने की आशंका के आधार पर ही व्यक्ति को हिरासत में लिया जा सकता है। कानून के मुताबिक, जिन लोगों को “गुंडा” करार दिया जाता है, उन्हें बिना किसी मुकदमे के 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है।
हिरासत में लिए गए लोग अपनी पसंद का वकील नहीं रख सकते और उन्हें सरकार की तरफ से दी जाने वाली कानूनी मदद पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील बिक्रम बनर्जी, जो इस हफ़्ते इस कानून को चुनौती देते हुए एक PIL (जनहित याचिका) दायर करने की योजना बना रहे हैं, ने इसे “जीवन के अधिकार का उल्लंघन” बताया।
उन्होंने ‘द टेलीग्राफ ऑनलाइन’ से कहा, “यह कानून मनमाना है और पुलिस को बहुत ज़्यादा अधिकार देता है। यह 2026 का कानून नहीं हो सकता; यह मध्ययुगीन है।”
सोमवार को मानवाधिकार कार्यकर्ता मिलन मालाकार और सीपीएम नेता सब्यसाची चटर्जी ने कलकत्ता हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की, जिसमें राज्य द्वारा कानून के गलत इस्तेमाल का मुद्दा उठाया गया। इस मामले पर इसी हफ़्ते सुनवाई होने की उम्मीद है।
कई लोग ‘एंटी-गुंडा कानून’ या ‘वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ़ एंटी-सोशल एक्टिविटीज़ एक्ट, 2026’ (CASA) को ‘ठगी कानूनों’ का आधुनिक रूप मान सकते हैं।
ब्रिटिश-काल के ‘ठगी और डकैती दमन कानून’ (CASA) को संगठित अपराध पर लगाम लगाने के लिए बनाया गया था, लेकिन ये कानून औपनिवेशिक शासन की मनमानी का प्रतीक बन गए। इन कानूनों ने अधिकारियों को शक के आधार पर लोगों को जेल में डालने, कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार करने और अपराध खत्म करने के नाम पर पुलिस को व्यापक अधिकार इस्तेमाल करने की ताकत दी।
CASA पुलिस को बिना वारंट के संदिग्धों की तलाशी लेने, संपत्ति ज़ब्त करने और जनहित में गिरफ्तारी की जानकारी न देने का अधिकार भी देता है। आलोचकों का कहना है कि ये अधिकार आपातकाल के दौरान सरकार को मिले असाधारण अधिकारों की याद दिलाते हैं।
CASA के तहत आने वाले कई अपराध — जैसे जबरन वसूली, संगठित हिंसा, ड्रग्स की तस्करी, ज़मीन पर कब्ज़ा और आपराधिक धमकी — पहले से ही भारतीय न्याय संहिता (BNS), आर्म्स एक्ट और NDPS एक्ट जैसे मौजूदा कानूनों के तहत दंडनीय हैं।
कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील जयंत नारायण चटर्जी ने पूछा, “जब मौजूदा कानून ही काफी हैं, तो हमें ऐसे कानून की क्या ज़रूरत है?”
हालांकि 44वें संविधान संशोधन के बाद भी अनुच्छेद 22 के तहत ‘प्रिवेंटिव डिटेंशन’ (एहतियाती हिरासत) संवैधानिक रूप से मान्य है, लेकिन संविधान मनमानी गिरफ्तारी के खिलाफ सुरक्षा की गारंटी भी देता है। इसमें कानूनी मदद पाने और 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने का अधिकार शामिल है।
आलोचकों का तर्क था कि बंगाल का नया कानून उस संवैधानिक संतुलन को बिगाड़ता है।
उन्होंने कहा कि ‘एंटी-गुंडा कानून’ उस नाजुक संतुलन की परीक्षा लेता है जिसे संविधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता और भविष्य के खतरों को रोकने की राज्य की शक्ति के बीच बनाए रखना चाहता है।
यह अधिनियम संवैधानिक जांच में टिक पाएगा या नहीं, इसका निर्णय अंततः अदालत में किया जाएगा। लेकिन अधिकारी के बचाव ने पहले ही राजनीतिक बहस को बदल दिया है। आलोचकों को आश्वस्त करने के बजाय कि कानून अपराध को लक्षित करेगा, इसने उस सवाल को और तीखा कर दिया जो वे हमेशा से पूछ रहे थे: कौन तय करता है कि “गुंडा” कौन है?
कानूनी विद्वान और NALSAR विश्वविद्यालय, हैदराबाद के पूर्व कुलपति फैजान मुस्तफा ने द टेलीग्राफ ऑनलाइन को बताया, “भारत एक अति-विनियमित समाज है। एकमात्र मुद्दा समर्थकों को खुश करना है।”
उन्होंने ‘टेररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज़ (प्रिवेंशन) एक्ट, 1987’ और ‘महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ़ ऑर्गनाइज़्ड क्राइम एक्ट (MCOCA), 1999’ के गलत इस्तेमाल का ज़िक्र करते हुए कहा कि ऐसे कानून राजनीतिक हिसाब-किताब बराबर करने का ज़रिया बन जाते हैं। उन्होंने ऐसे मामलों का हवाला दिया जिनमें बेगुनाह लोगों और छोटे बच्चों को हिरासत में लिया गया था।
क्रिमिनल लॉयर और कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील अनिर्बान गुहा ठाकुरता ने कहा कि किसी अपराध के चार चरण होते हैं: इरादा, तैयारी, कोशिश और अंजाम देना।
उन्होंने कहा, “युद्ध और डकैती के मामलों को छोड़कर, अपराधों के लिए कोशिश करने के चरण से ही सज़ा का प्रावधान है। यह कानून तैयारी के चरण से ही सज़ा लागू करता है।”
हालांकि ठाकुरता और नारायण जैसे कुछ कानूनी विशेषज्ञ उम्मीद कर रहे हैं कि कानून की कमियों में सुधार किया जाएगा, लेकिन ज़्यादातर आलोचकों का तर्क है कि ऐसे कानून ऐतिहासिक रूप से कभी भी आपराधिक व्यवहार को कम करने में कारगर साबित नहीं हुए हैं।
मुस्तफा ने कहा, “एक मज़बूत आपराधिक न्याय प्रणाली विकसित देश की पहचान होती है। आपराधिक न्याय को मानवीय बनाना ही लक्ष्य है। ऐसे कानून एक सभ्य न्याय प्रणाली पर दाग की तरह होते हैं।”
इतिहास गवाह है कि ऐसे कानूनों का गलत इस्तेमाल हो सकता है।
बेनिटो मुसोलिनी के दौर में इटली के ‘लेगी फासिस्टिसिमे’ (Leggi Fascistissime) कानूनों ने कार्यकारी शक्तियों को केंद्रित किया और राजनीतिक विरोध को दबा दिया। वहीं, नाज़ी जर्मनी में एडॉल्फ हिटलर के कहने पर जारी ‘राइखस्टैग फायर डिक्री’ (Reichstag Fire Decree) ने देश की सुरक्षा के नाम पर नागरिकों की आज़ादी छीन ली।
हर सरकार का मानना होता है कि सत्ता में रहते हुए वह विशेष शक्तियों का इस्तेमाल ज़िम्मेदारी से करेगी। लेकिन संवैधानिक लोकतंत्र एक अलग सोच पर आधारित होते हैं — कि कानून सिर्फ़ आज के शासकों के लिए नहीं, बल्कि भविष्य के शासकों को ध्यान में रखकर बनाए जाने चाहिए।
‘एंटी-गुंडा कानून’ (Anti-Goonda law) अब बंगाल को इसी सवाल का सामना करने पर मजबूर कर रहा है। इतिहास बताता है कि विशेष कानूनों की असली परीक्षा इस बात से नहीं होती कि वे कैसे शुरू हुए, बल्कि इस बात से होती है कि आखिर में उनका इस्तेमाल कैसे किया गया।
