ज्ञान विज्ञान
क्या भूत-प्रेत होते हैं? क्या कहता है विज्ञान
ओमप्रकाश तिवारी
हवा दिखाई नहीं देती, फिर भी उसका प्रभाव मापा जा सकता है। गुरुत्वाकर्षण दिखाई नहीं देता, फिर भी उसका प्रभाव मापा जा सकता है। डार्क मैटर दिखाई नहीं देता, लेकिन उसके गुरुत्वीय प्रभावों के अनेक प्रमाण हैं। इसी तरह भूत-प्रेत भी दिखाई नहीं देते तो क्या उनके अस्तित्व को महसूस किया जा सकता है? मापा जा सकता है? भूत-प्रेत के बारे में न्यूरो साइंस क्या कहता है?
हवा या डार्क मैटर और भूत-प्रेत की तुलना करने पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि दोनों दिखाई नहीं देते, बल्कि यह है कि क्या उनके अस्तित्व का कोई वस्तुनिष्ठ (objective), मापने योग्य (measurable) और दोहराया जा सकने वाला (repeatable) प्रमाण है?
सवाल यह है कि क्या भूत-प्रेत के अस्तित्व को महसूस किया जा सकता है? इसका जवाब यही होगा कि हां, लोग ऐसा अनुभव होने की रिपोर्ट करते हैं। उदाहरण के लिए लोग बताते हैं कि कमरे में किसी की उपस्थिति महसूस हुई। उन्हें किसी ने छुआ। किसी की आवाज़ सुनाई दी। कोई आकृति दिखाई दी। किसी के चलने की आहट आई। विज्ञान इन अनुभवों को झूठ नहीं कहता। अनुभव व्यक्ति के लिए वास्तविक हो सकता है।
लेकिन विज्ञान एक दूसरा प्रश्न पूछता है कि क्या वही अनुभव दूसरे लोग भी उसी समय, उसी स्थान पर, उसी परिस्थिति में माप सकते हैं? यहीं से विज्ञान और व्यक्तिगत अनुभव अलग हो जाते हैं।
अब सवाल यह है कि क्या भूत-प्रेत को मापा जा सकता है? तो इसका जवाब यह है कि अब तक तो ऐसा नहीं हो पाया है। यदि कोई सत्ता वास्तव में भौतिक संसार में मौजूद है, तो उसे किसी न किसी प्रकार का प्रभाव उत्पन्न करना चाहिए।
उदाहरण के लिए-द्रव्यमान होगा तो गुरुत्वाकर्षण होगा। ऊर्जा होगी तो ऊर्जा का संरक्षण (Conservation of Energy) प्रभावित होगा। विद्युत प्रभाव होगा तो उपकरण उसे दर्ज करेंगे। तापमान बदलेगा तो थर्मामीटर मापेगा। ध्वनि होगी तो माइक्रोफोन रिकॉर्ड करेगा। आज तक ऐसा कोई प्रयोग नहीं हुआ जिसमें भूत-प्रेत का प्रभाव विश्वसनीय और दोहराए जा सकने वाले तरीके से मापा गया हो। यही सबसे बड़ा अंतर है।
न्यूरोसाइंस क्या कहता है? न्यूरोसाइंस कहता है कि हमारे सभी अनुभव—देखना, सुनना, छूना, डरना, किसी की उपस्थिति महसूस करना—अंततः मस्तिष्क में उत्पन्न होते हैं। यदि मस्तिष्क की कार्यप्रणाली बदल जाए, तो अनुभव भी बदल सकते हैं।
“किसी की उपस्थिति” को महसूस होने को न्यूरोसाइंस में उपस्थिति मतिभ्रम ( किसी अदृश्य उपस्थिति का भ्रम) कहा जाता है। उपस्थिति मतिभ्रम वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति को ऐसा महसूस होता है कि उसके पास या उसके पीछे कोई व्यक्ति मौजूद है, जबकि वास्तव में वहां कोई नहीं होता। यह अनुभव इतना वास्तविक लग सकता है कि व्यक्ति को पूरा विश्वास हो जाता है कि उसके आसपास कोई है। न्यूरोसाइंस के अनुसार, उपस्थिति मतिभ्रम मस्तिष्क के उन भागों की कार्यप्रणाली में अस्थायी गड़बड़ी से जुड़ा हो सकता है जो शरीर की स्थिति, स्थानिक बोध और स्वयं तथा दूसरों के बीच अंतर को समझते हैं।
यह अनुभव निम्न परिस्थितियों में हो सकता है। अत्यधिक थकान। नींद की कमी। स्लीप पैरालिसिस। अत्यधिक तनाव या भय। कुछ तंत्रिका संबंधी रोग। बहुत ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में ऑक्सीजन की कमी।
उपस्थिति मतिभ्रम वह मानसिक अनुभव है जिसमें व्यक्ति को किसी अदृश्य व्यक्ति की उपस्थिति का आभास होता है, जबकि वहां वास्तव में कोई नहीं होता।
स्लीप पैरालिसिस की स्थिति तब होती है जब अचानाक आंख खुल जाती है। शरीर हिल नहीं सकता। कमरे में किसी की उपस्थिति महसूस होती है। कई लोगों को काली आकृति दिखाई देती है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि कोई सीने पर बैठा है। न्यूरोसाइंस इसे नींद और जागने की अवस्था के मिश्रण के रूप में समझाता है।
मस्तिष्क स्वयं वास्तविकता का निर्माण करता है। हम सोचते हैं कि आंखें दुनिया दिखाती हैं। वास्तव में आंखें केवल प्रकाश भेजती हैं। वास्तविक चित्र मस्तिष्क बनाता है। यदि मस्तिष्क कहीं गलती कर जाए तो व्यक्ति ऐसी चीज़ भी देख सकता है जो वास्तव में मौजूद नहीं है।
भय का प्रभाव तब दिखता है जब किसी व्यक्ति से पहले ही कहा जाए कि इस घर में भूत है, तो उसका मस्तिष्क छोटी आवाज़ों को बड़ा बना देगा। परछाइयों को इंसान समझ सकता है। हवा से हिलते पर्दे को आकृति समझ सकता है। इसे मनोविज्ञान में Expectation Effect और Top-down Processing जैसी प्रक्रियाओं से समझाया जाता है।
न्यूरोसाइंस यह भी स्वीकार करता है कि कुछ लोगों को गहरे आध्यात्मिक अनुभव होते हैं लेकिन किसी अनुभव का होना और उस अनुभव की बाहरी वास्तविकता सिद्ध हो जाना दो अलग बातें हैं। मसलन, यदि किसी व्यक्ति को स्वप्न में अपने दिवंगत पिता दिखाई दें तो अनुभव वास्तविक है। लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि पिता वास्तव में कमरे में उपस्थित थे।
सवाल यह है कि क्या भविष्य में विज्ञान भूतों को खोज सकता है? इसका जवाब सैद्धांतिक होगा। कहा जा सकता है कि यदि भूताें का प्रभाव मापा जा सके, प्रयोग दोहराए जा सकें, अलग-अलग वैज्ञानिक वही परिणाम प्राप्त करें, उनसे संबंधित परीक्षण योग्य सिद्धांत विकसित हो तो भूतों को खोजा जा सकता है। विज्ञान किसी संभावना को केवल इसलिए नहीं नकारता कि वह असामान्य है; वह उसे स्वीकार करने के लिए पर्याप्त प्रमाण मांगता है। फिलहाल विज्ञान के पास भूत-प्रेत के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं है।
