खेती-किसानी
कीटनाशक आधारित कृषि मॉडल बदलना जरूरी
कुलभूषण उपमन्यु
1960 के दशक में भारतवर्ष को अन्न संकट का सामना करना पड़ा था. जिससे निजात पाने के लिए नए नए आज़ाद हुए देश के पास अभी तक अपनी कृषी शोध संस्थाओं का भी आभाव था. लिहाज़ा मजबूरी में हमें अमेरिकी रासायनिक कृषि मॉडल का अनुकरण करना पड़ा. उच्च उत्पादकता के लिए वही उपलब्ध और स्थापित मॉडल था. जिसके अन्तर्निहित खतरे भी अभी तक सामने नहीं आए थे.
हरित क्रांति के नाम पर नई कृषि पद्धति का भारत में आगमन हुआ जो मुख्यतः रासायनिक खादों से उपज बढ़ाने और फसलों को लगने वाली बिमारियों पर नियंत्रण के लिए रासायनिक कीट नाशकों के प्रयोग पर आधारित थी. शुरू शुरू में उपज बढ़ाने में अच्छी सफलता मिली, अन्न उत्पादन में देश आत्मनिर्भर हुआ. धीरे धीरे इस पद्धति की सीमाएं सामने आने लगी हैं. यह स्पष्ट होता जा रहा है कि यह पद्धति टिकाऊ नहीं है.
रासायनिक कृषि एक आत्मघाती पद्धति साबित होती जा रही है. रासायनिक कीट नाशकों के अनियंत्रित प्रयोग से एक ओर जहां मिटटी के उपजाऊ पन को हानी पंहुच रही है वहीं कीटनाशकों का जहर खाद्यानों फलों सब्जियों में पंहुच कर मनुष्य स्वास्थ्य के लिए भयानक खतरा पैदा करता जा रहा है. फसलों और फलों के परागण के लिए जरूरी किसान के मित्र कीट भी नष्ट होते जा रहे हैं. बहुत से मित्र कीट और पक्षी जो फसलों में बीमारी फ़ैलाने वाले कीटों को नियंत्रित करते थे वे भी नष्ट होते जा रहे है.
जैवविविधता और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक जहर भारत में अनियंत्रित रूप से प्रयोग हो रहे हैं. कीटनाशक बनाने वाली कंपनियां ही शायद नियंत्रण के लिए प्रभावी कानून बनाने में सबसे बड़ी रुकावट हैं. इसका प्रमाण यह है कि 1968 के कीटनाशक एक्ट के बाद कोई प्रभावी और अनुभवों के आधार पर नया एक्ट बन ही नहीं सका है. 2008, 12, और 20 को इसके लिए किए गए प्रयास नामालूम कारणों से ठंडे बसते में ही पड़े रहे हैं.
2025 में भी नया ड्राफ्ट बनाने की बात सुनी है किन्तु अभी उसका भी अता पता नहीं है. जिसके चलते ऐसे जहर जो दुनियां के बहुत से देशों में प्रतिबंधित हैं वे भारत में धडल्ले से प्रयोग हो रहे हैं और बेचे जा रहे हैं. हरित क्रांति में कई बीज भी अमेरिका, मेक्सिको आदि देशों से आए थे. उनके साथ कई खरपतवारों के बीज भी आ गए. लेंटाना, युपिटोरियम, पार्थेनियम, आदि अनेक खरपतवार फ़ैल गए.
उनके नियंत्रण के लिए वनस्पति नाशक रसायनों का प्रचलन हो गया. जिनमें पैराक्यूएट, और ग्ल्य्फोसेट जैसे अति जहरीले रसायन हैं जो दुनियां के बहुत से देशों में प्रतिबंधित हैं. इन रसायनों का कुछ अंश फसलों, फलों, सब्जियों में स्प्रे के बाद बचा रहता है और भोजन के साथ मनुष्य शरीर में चला जाता है.
फसलों, फलों सब्जियों के नमूने जाँच करने के बाद पता चला है कि लगभग एक तिहाई खाद्य पदार्थों के नमूनों में कीटनाशकों और वनस्पति नाशकों के अंश पाए गए. इन अंशों की अधिकतम निर्धारित सीमा से अधिक जहर 3.5% नमूनों में पाया गया. परिणाम स्वरूप कीट नाशक जनित रोगों में बढ़ोतरी हो रही है. जिनमें सबसे ज्यादा खतरनाक केंसर है.
हिमाचल में फलों और सब्जियों पर भारी मात्र में कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है. जिसके चलते केंसर वृद्धि दर जहां राष्ट्रीय स्तर पर 0.6% है, वहां हिमाचल में यह 2.2% है. जो बहुत ही चिंता जनक स्थिति है. स्प्रे के दौरान भी किसान दुर्घटना वश कीटनाशकों के जहर की चपेट में आ जाते हैं. जिनमें से बहुत से अकाल मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं.
2023 में पंजाब, हरयाणा, हिमाचल में इस तरह से जहर की चपेट में आने से 1197 मौतें दर्ज की गईं. देश भर में 10,000 मौतें स्प्रे के समय जहर की चपेट में आने से हर वर्ष होती हैं. लाखों जहर प्रभावितों को मंहगे इलाज करने पड़ते हैं. जिनमेंसे कई स्थायी अपंगता का शिकार हो जाते हैं.
आत्महत्याओं में भी कीटनाशकों का बड़े पैमाने पर प्रयोग होता है. 2024 में कुल जहर से होने वाली आत्महत्याओं में से 18% आत्महत्याएँ 26,921 कीटनाशकों से हुईं. सरकारी नीतियां कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों के हितों का ज्यादा ध्यान रखती हैं और आम समाज विशेष कर किसान और ग्रामीण लोग इसका दंश झेलने को मजबूर होते हैं. कुछ तो मजबूरी में और कुछ असावधानी और संरक्षक उपायों के अभाव में.
चिकित्सकीय शोध में पाया गया है कि माताओं के दूध में भी कीटनाशकों के अंश पाए गए हैं. यह इतना खतरनाक है कि इनमें से कुछ जहर जरायुवी अवरोध (प्लेसेंटा बेरियर) को भी पर कर जाते हैं और गर्भस्थ शिशु पर भी इन जहरों का असर हो जाता है. यहाँ तक कि डी.एन.ए. भी दुष्प्रभावित हो जाता है. यानि हमारी गलतियों का दंड अजन्मा शिशु भी भुगतने को अभिशप्त होता है.
अत: अब समय आ गया है कि रासायनिक कृषि की विसंगतियों को चिन्हित किया जाए. और उनके निराकरण के लिए वैकल्पिक वैज्ञानिक रास्ते तलाशे जाएं. जन चेतना के अनुभवों में भी काफी कुछ संजोया हुआ मिल जाएगा , जिसे वैज्ञानिक आधार पर संशोधित और संवर्धित करने की जरूरत है. प्राकृतिक खेती, जैविक खेती, जीरो बजट खेती जैसी अनेक पहलें शुरू की गई हैं जिनको व्यापक बनाने की जरूरत है.
कृषि विश्व विद्यालयों में इस दिशा में अत्यधिक शोध कार्य करके निरापद पद्धति का विकास करना होगा. किन्तु तात्कालिक रूप से कीटनाशकों का श्रेणी करण करके अति खतरनाक विषैले स्प्रे कानूनन बंद किये जाने चाहिए. जिसके लिए सख्त क़ानून बनाने की जरूरत है.
फसलों को लगने वाली बीमारियों के नियंत्रण के लिए वैकल्पिक जैव कीटनाशक और समग्र कीट नियंत्रण कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए. जिसके लिए किसानों को व्यापक प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए.
कृषि बागवानी में अफसरी व्यवस्था के बदले क्षेत्रीय कार्यकर्ता संस्कृति का विकास करना चाहिए. जहां सब अधिकारी ही बन जाते हैं वहां काम कौन करे. कागज़ी घोड़े दौड़ाने का ज्यादा लाभ नहीं हो सकता. 60 के दशक में समुदायक विकास विभाग में पंचायत स्तर पर एक ग्रामसेवक का पद होता था. जिसे क्षेत्रीय जरूरत के मुताबिक कृषि बागवानी का बुनियादी प्रशिक्षण होता था.
मैंने देखा है कि ग्रामसेवक खेत में जा कर खाद का गड्ढा सामने बनवा रहे हैं, धान की पनीरी का लाईन में रोपण करवा रहे हैं. ऐसा जज्बा लेकर काम होना चाहिए. वरना मुख्यधारा का बदलाव नहीं आ पाता. यहाँ वहां कुछ प्रदर्शन क्षेत्र खड़े हो जाते हैं और मुख्य धारा में जस का तस सिलसिला चला रहता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि देश और हिमाचल के स्तर पर स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरों से बचने के लिए रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग को नियंत्रित करने की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जाएंगे.
