सांसों का हिसाब: पर्दा गिरने के बाद भी बजती रहें तालियाँ

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

सांसों का हिसाब: पर्दा गिरने के बाद भी बजती रहें तालियाँ

  • जीवन की सार्थकता, उद्देश्य और एक अमिट विरासत छोड़ने की कला

 

“दादाजी, आपकी सबसे बड़ी कमाई क्या है?” पोते ने मासूमियत से पूछा।
दादाजी मुस्कुराए। सामने अलमारी में रखी ट्रॉफियाँ, प्रमाण-पत्र और वर्षों की उपलब्धियाँ जैसे चुपचाप उन्हें देख रही थीं। उन्होंने पोते का हाथ अपने हाथ में लिया और धीमे स्वर में बोले-
“बेटा, बैंक में जमा धन तो मेरे जाने के बाद बाँट दिया जाएगा। लेकिन अगर मेरे जाने के बाद कोई यह कहे कि ‘काश, वे कुछ दिन और हमारे साथ रहते’, तो समझना वही मेरी सबसे बड़ी कमाई होगी।”
पोता शायद पूरी बात नहीं समझ पाया, लेकिन दादाजी की आँखों में एक ऐसी शांति थी, जो धन, पद या प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि सार्थक जीवन जीने से आती है।

शायद यही प्रश्न हम सभी को स्वयं से पूछना चाहिए-हम अपनी उम्र तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन क्या अपने जीवन का मूल्य भी बढ़ा रहे हैं?

जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हम वर्षों तक जीवनयापन (Living) की तैयारी करते रहते हैं, लेकिन जीवन जीना भूल जाते हैं। बचपन पढ़ाई में निकल जाता है, युवावस्था करियर बनाने में, मध्य आयु धन कमाने में और फिर एक दिन अचानक एहसास होता है कि जीवन तो प्रतीक्षा करते-करते ही बीत गया। हम यह मान लेते हैं कि “जब समय मिलेगा, तब खुश रहेंगे”, “जब सब कुछ हासिल हो जाएगा, तब परिवार के साथ बैठेंगे”, “जब रिटायर होंगे, तब अपने मन का काम करेंगे।” लेकिन सच यह है कि जीवन किसी भविष्य की तारीख़ में नहीं, केवल आज में घटित होता है।

आज सफलता का अर्थ प्रायः बैंक बैलेंस, बड़ी गाड़ी और ऊँचे पद से लगाया जाने लगा है। लेकिन मृत्यु के बाद किसी की अंतिम यात्रा में उसकी संपत्ति नहीं चलती, उसके साथ चलते हैं वे लोग जिनके जीवन को उसने छुआ होता है। लोग आपकी तनख्वाह नहीं याद रखते, वे आपका व्यवहार याद रखते हैं। उन्हें यह याद रहता है कि आपने कठिन समय में उनका हाथ थामा था या नहीं; आपने उन्हें सम्मान दिया था या नहीं; आपने उनके चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश की थी या नहीं। अंततः मनुष्य की वास्तविक संपत्ति उसके रिश्ते और उसका चरित्र होते हैं।

जीवन एक रंगमंच की तरह है। हम सभी अपनी-अपनी भूमिका निभाने आए हैं। प्रश्न यह नहीं है कि भूमिका कितनी बड़ी थी; प्रश्न यह है कि हमने उसे कितनी ईमानदारी से निभाया। एक शिक्षक हजारों विद्यार्थियों के जीवन में प्रकाश छोड़ सकता है, एक चिकित्सक असंख्य परिवारों को आशा दे सकता है, एक किसान करोड़ों लोगों का पेट भर सकता है, एक माँ अपने बच्चों में संस्कार बो सकती है। महान बनने के लिए प्रसिद्ध होना आवश्यक नहीं; उपयोगी होना आवश्यक है।

इसीलिए जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है-मेरा उद्देश्य क्या है?

बिना उद्देश्य का जीवन बिना पतवार की नाव की तरह होता है, जो लहरों के भरोसे बहती रहती है। उद्देश्य बहुत बड़ा होना आवश्यक नहीं। किसी बच्चे को अच्छी शिक्षा देना, किसी वृद्ध का सहारा बनना, ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाना, समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना-ये भी उतने ही महान उद्देश्य हैं। जिस दिन जीवन किसी बड़े अर्थ से जुड़ जाता है, उसी दिन साधारण दिनचर्या भी असाधारण लगने लगती है।

यदि जीवन की सबसे मूल्यवान संपत्ति का नाम पूछा जाए, तो वह धन नहीं, समय है। खोया हुआ पैसा वापस कमाया जा सकता है, लेकिन बीता हुआ एक क्षण कभी लौटकर नहीं आता। फिर भी हम सबसे अधिक समय उन्हीं चीज़ों पर खर्च कर देते हैं जिनका हमारे जीवन के उद्देश्य से कोई संबंध नहीं होता। घंटों मोबाइल स्क्रीन पर दूसरों का जीवन देखते हैं, लेकिन अपने ही घर में बैठे लोगों से कुछ मिनट बात करने का समय नहीं निकाल पाते। यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि हम दुनिया से जुड़े हुए हैं, लेकिन अपने लोगों से कटते जा रहे हैं?

रिश्ते जीवन का सबसे बड़ा निवेश हैं। लोग संपत्ति, शेयर और बीमा में निवेश करते हैं, लेकिन संबंधों में निवेश करना भूल जाते हैं। माता-पिता यह नहीं चाहते कि बच्चे उन्हें महँगे उपहार दें; वे चाहते हैं कि बच्चे उनके साथ बैठकर दो घड़ी बातें करें। जीवनसाथी को हमेशा बड़ी यात्राओं की आवश्यकता नहीं होती; कई बार एक कप चाय के साथ बिताए गए कुछ शांत क्षण ही सबसे बड़ी खुशी बन जाते हैं। बच्चों को सबसे महँगे खिलौनों की नहीं, माता-पिता की उपस्थिति की आवश्यकता होती है। सच तो यह है कि उपस्थिति (Presence) प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है।

सार्थक जीवन केवल दूसरों के लिए जीने से नहीं बनता; स्वयं को निरंतर बेहतर बनाना भी उतना ही आवश्यक है। प्रतिदिन कुछ समय आत्मचिंतन के लिए निकालना, अच्छी पुस्तकें पढ़ना, स्वास्थ्य का ध्यान रखना, ध्यान और योग के माध्यम से मन को संतुलित रखना—ये केवल व्यक्तिगत आदतें नहीं, बल्कि एक सार्थक जीवन की नींव हैं। जो व्यक्ति स्वयं भीतर से प्रकाशित होता है, वही दूसरों के जीवन में भी प्रकाश फैला सकता है।

हम अक्सर “लोग क्या कहेंगे” के डर में अपने सपनों को टाल देते हैं। लेकिन एक कड़वा सत्य यह भी है कि जब हम इस दुनिया से विदा होंगे, तो वही लोग कुछ समय बाद अपने जीवन में व्यस्त हो जाएँगे। इसलिए अपने निर्णय भय के आधार पर नहीं, अपने विवेक और मूल्यों के आधार पर लेने चाहिए। गलतियाँ करने से मत डरिए। गलतियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि आप प्रयास कर रहे हैं। स्थिर खड़े रहने से बेहतर है कि चलते हुए ठोकर खाई जाए।

अंततः प्रश्न यह नहीं कि हमने कितनी लंबी उम्र पाई; प्रश्न यह है कि हमने अपने हिस्से की साँसों का उपयोग किस प्रकार किया। क्या हमारे कारण किसी का जीवन थोड़ा आसान हुआ? क्या हमारे शब्दों ने किसी टूटे हुए मन को सहारा दिया? क्या हमारे जाने के बाद लोग केवल हमारी तस्वीर पर फूल चढ़ाएँगे, या हमारे जीवन से प्रेरणा भी लेंगे?

जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि हमारे नाम पर कितनी संपत्ति छोड़ी गई। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि हमने कितने संस्कार छोड़े, कितनी मुस्कानें छोड़ीं, कितनी प्रेरणाएँ छोड़ीं और कितने दिलों में अपनी जगह बनाई।

इसलिए जब भी जीवन की भागदौड़ आपको थका दे, एक क्षण रुककर स्वयं से केवल एक प्रश्न पूछिए-
यदि आज मेरे जीवन का पर्दा गिर जाए, तो क्या मेरे जाने के बाद भी मेरे कर्मों की तालियाँ गूँजती रहेंगी?

यदि इस प्रश्न का उत्तर “हाँ” नहीं है, तो अभी भी समय है। किसी अपने को गले लगाइए, किसी ज़रूरतमंद की सहायता कीजिए, किसी पुराने मित्र को फ़ोन कीजिए, अपने माता-पिता के साथ बैठिए, अपने बच्चों को समय दीजिए और अपने जीवन को केवल सफल नहीं, सार्थक बनाइए।
क्योंकि अंत में मनुष्य की साँसें नहीं गिनी जातीं-

गिना जाता है कि उन साँसों ने कितने जीवनों में उम्मीद, प्रेम और प्रकाश जगाया।
यही वह विरासत है, जिसके कारण पर्दा गिरने के बाद भी तालियाँ बजती रहती हैं।

~ डॉ. रीटा अरोड़ा,सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
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