कुछ निजी प्रसंग-6
आज का समय और कविता की ताकत-6
ओमसिंह अशफ़ाक
इस लेख की यह अंतिम किस्त है। पाठकों से आग्रह है कि इसे पढ़कर इससे पहले की पांच किस्तें भी जरूर पढ़ें ताकि समग्रता में पूरी स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो सके) इस मैटर को तिरछे अक्षरों में कर सकते हैं। – संपादक
अब वह घटना जिसका मैंने लेख के शुरू में वायदा किया था।
कविता की ताकत से मेरा परिचय बीसेक साल पहले (शायद 1987 में ?) हुआ था।
कानपुर से लोक-ख्यात जनकवि शील जी (मूल नाम मन्नू लाल द्विवेदी) कुरुक्षेत्र आए हुए थे।
और हम सब नौसिखिए युवा-कवि, लेखक चंडीगढ़ में एक बड़े साहित्यिक आयोजन में शामिल होने जा रहे थे।
रास्ते के सफ़र में डॉ० ओ.पी. ग्रेवाल ने शील जी की कविता से जुड़ा एक किस्सा छेड़ थाः
वो किस्सा यह था कि शील जी उत्तर प्रदेश के किसी कस्बे में कवि सम्मेलन में कविता पाठ करने गए थे;
उस कस्बे के आसपास कोई डाकू गिरोह सक्रिय था। इस बात की चर्चा जनकवि शील ने भी सुन रखी थी।
उस डाकू गिरोह का पूरे इलाके में बहुत आतंक था। यह जिक्र शील जी पहले भी सुन चुके थे।
लेकिन जब तक कवि सम्मेलन समाप्त हुआ और आयोजकों ने कवियों को मानदेय राशि देकर व शाल आदि से सम्मानित करके रेलवे स्टेशन के लिए विदा किया, तब सूर्यास्त हो चुका था। और स्टेशन कस्बे से कुछ किलीमीटर की दूरी पर था।
लिहाजा रास्ते में पड़ने वाले जंगल में डाकुओं ने वह घोड़ा-तांगा घेर लिया, जिसमें शील जी और दूसरे कवि साथी सवार थे? शायद यद कुछ अन्य यात्री भी रहे होंगे?
आसन्न खतरे के समक्ष सब सन्न रह गए थे। अब जागे क्या होगा? यही सोच कर सब भयभीत थे। तभी एक डाकू ने कड़कती आवाज़ में कहा कि ‘तुम में कवि शील कौन है ?’ शील जी को बताना पड़ा कि ‘मैं शील हूं?”… तुम्हें हमारे सरदार के पास चालना होगा।’
शील जी के पास और विकल्प भी क्या हो सकता था ?
कवि शील तांगे से नीचे उतरकर डाकुओं के साथ चल पड़े।
कुछ देर बाद किसी कुएं के पास पहुंचे, जहां उनका सरदार और शेष डाकू-दल मौजूद था।
यह जानकर कि ये छोटे कद का दुबला-पतला आदमी ही कवि शील है, डाकू सरदार ने उन्हें सम्मानपूर्वक बैठाया। और अपनी पसंद की कविता की फरमाइश की। शील जी को कई कविताएं सुनानी पड़ीं।
अंत में डाकू सरदार ने कवि शील को कुछ धनराशि भेंट देकर आदर सहित बिदा किया और असुविधा के लिए खेद भी जताया।
इस तरह कवि शील का डाकुओं के बीच “कविता-पाठ” सम्पन्न हुआ था।
कविता ने ही शील जी को उस खतरे में पहुंचाया था और कविता ही वहां से उन्हें सकुशल बाहर निकाल लाई थी।
शील जी की जुबानी ये “कविता और डाकू” के मेल-मिलाप का किस्सा सुनकर रहस्य और रोमांच से हमारे भी रोंगटे खड़े हो गए थे।
वैश्वीकरण, नवउदारीकरण और बाजारीकरण के इस दौर में भी कविता की ऐसी ताकत अविश्वसनीय लगती है? लेकिन वह है। इसलिए आश्चर्यचकित करती है !
इस अविश्वसनीयता का कारण क्या हो सकता है?
एक कारण तो शायद यह हो सकता है कि बाजारीकरण की प्रक्रिया ने मुख्खाधारा की कविता (बुर्जुआ कविता) को बिकाऊ और नखदन्तविहीन बना दिया है। जो चीज बिकाऊ बन जाती है, उसका पालतू बन जाना लगभग तय होता है।
मंचों पर और मीडिया में कविता के नाम पर प्रायः जो कुछ परोसा जाता है; वह या तो अश्लील चुटकुलाबाजी है या फिर कविता के लिबास में साम्प्रदायिक सोच की विकृत एवं नकली ‘राष्ट्रभक्ति’ होती है।
जिससे राष्ट्र का तो कुछ भला होना नही है, उल्टा पड़ौसी देशों के प्रति नफ़रत और तनाव जरूर बढ़ सकता है।
यह स्थिति हथियारों की सौदागर देशी-विदेशी पूंजी के हित में बेशक हो, जनता के हित में बिल्कुल नहीं होती है।
दूसरा कारण- कवि का कमेरी जनता से ‘अलगाव’ बढ़ा है, जिसके चलते कवि को आम जनता की ‘वास्तविक स्थितियों’ का ज्ञान नहीं हो पाता है।
इसका प्रमाण इस रूप में दिखता है कि आज की बुर्जुआ कविता से ‘किसान और श्रमिक जनता’ एकदम नदारद है।
इसलिए उस कविता में जन-जीवन का ‘यथार्थ गायब’ मिलता है।
ज़ाहिर है ऐसी कविता जनता को निरर्थक ही लगेगी? इससे कविता और जनता के ‘बीच की दूरी’ बढ़ जाती है और दोनों के बीच ‘अपरिचय के संबंध’ बन जाते हैं।
ऐसा कवि जनता को ‘अज्ञानी’ समझने लगता है और ज़ाहिर है कि जनता भी ऐसे कवि को ‘फालतू आदमी’ ही समझेगी?
ऐसा वातावरण अपसंस्कृति के उभार का बायस बनता है।
क्योंकि कोई भी समाज संस्कृति-शून्यता की स्थिति में नहीं रह सकता है। या तो वहां स्वस्थ संस्कृति मौजूद होगी या फिर अपसंस्कृति फैल रही होगी।
स्पष्ट है कि इसी परिवेश में साहित्यकार को अपनी भूमिका खुद तय करनी होगी कि वह किसके ‘पक्ष’ और किसके ‘विरोध’ में खड़ा होता है।
इस मुकाम पर साहित्य और राजनीति आपस में आकर जुड़ जाते हैं। या कहें कि यही ‘साहित्य की राजनीति’ है।
इसी खातिर मुक्तिबोध ने कहा होगा-‘पार्टनर तुम्हारी राजनीति क्या है?’
जहां कविता जनता से जुड़कर खुद ‘ताकत’ पाती है, वहीं पर जनता को ‘ऊर्जा’ देकर शक्तिवान बनाती है।
जिस तरह से बिजली बैटरी को चार्ज़ कर देती है, तो बैटरी भी करंट प्रसारित करने लगती है।
कुछ इसी तरह की ‘परस्परता का संबंध’ जनता और साहित्य के बीच दिखाई पड़ता है।
इसी परस्परता में “कविता की ताकत का रहस्य” छिपा हो सकता है। (2007 में)
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जनकवि शील जी की एक कविता:
उठाओ कलम
उठाओ क़लम, सर क़लम हो रहे हैं।
धुआँधार ज़ुल्मो-सितम हो रहे हैं।
लिखो राष्ट्र क्षमता की आँखें भरीं क्यों?
कलुक्ष की कथज्ञा, क़त्ल-ग़ारतगरी क्यों?
मज़हबी दरिंदों को हथियार देकर,
गुनहगार पूँजी की बाज़ीगरी क्यों?
समय खो न जाए, गला भर न आए,
जगाओ जो दिन में पड़े सो रहे हैं।
उठाओ क़लम सर क़लम हो रहे हैं।
ज़रा देखिए इनके आधार क्या हैं,
मुजरिम सियायत के व्यापार क्या हैं?
बदलनी है धरती से धन की प्रणाली,
हमारे-तुम्हारे सरोकार क्या हैं?
बोते हैं हम-तुम फ़सल ज़िंदगी की,
ये रोटी के दुश्मन धरम बो रहे हैं।
उठाओ क़लम सर क़लम हो रहे हैं।
क़लम के लिए देश-परदेश क्या है,
क़लम का हमेशा से संदेश क्या है?
गिरों को उठाओ, ज़माने को बदलो,
अदब की हक़ीक़त, पशोपेश क्या है?
क़लम के लिए भ्रम की ज़ंजीर तोड़ो।
ज़माने के आखर गरम हो रहे हैं।
उठाओ क़लम सर क़लम हो रहे हैं।
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