नरसिंह कुमार ‘मयूर’ की एक ग़ज़ल
माफी मांगेंगे भला वो, यह बगावत छोड़िए,
दौरे-हाकिम में वफ़ा की अब रवायत छोड़िए।
दो महीने धूप-बारिश में भले तुम जल मरो,
तख्त वालों से किसी रहम-ओ-सखावत छोड़िए।
सामने हुजूम हो या भूख से बेहाल हों,
ये शहंशाह-ए-ज़मां हैं, यूँ शिकायत छोड़िए।
था जो फरमां कि ‘इस्तीफ़े यहाँ होते नहीं’,
उस पुराने कौल से अब यूँ रक़ाबत छोड़िए।
जो खुदा हैं, उनसे कैसी गलतियों का मुहासिबा,
हम हैं इंसान, सो हमसे ये हिमाकत छोड़िए।
पेपरों के लीक होने पर न यूँ शोरिश करो,
विश्वगुरु की राह में ऐसी रुकावट छोड़िए।
हाँ, मगर मर्यादा में ही रह के जीना होगा अब,
बेटियों पर तंज़ की ऐसी लिखावट छोड़िए।
जेन ज़ी को दी माफी ‘मयूर’, तो नया परचम उठा,
जेन अल्फा के नारों की, घबराहट छोड़िए!
