फिल्म रिव्यू
दायराः अपराध और उसके बाद पैदा होने वाले सवालों की पड़ताल
अजीत अंजुम
आज मुझे मेघना गुलज़ार की नई फिल्म ‘दायरा’ का स्पेशल प्रिव्यू देखने का मौका मिला. ये फिल्म 18 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज़ होने जा रही है . फिल्म देखने के बाद पहला एहसास यही होता है कि यह सिर्फ एक जघन्य अपराध की कहानी नहीं है बल्कि उस अपराध के बाद पैदा होने वाले उन सवालों की पड़ताल भी है, जिनका जवाब समाज और सिस्टम दोनों के लिए आसान नहीं है . दायरा में इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश है कि इंसाफ आखिर है क्या? और कानून की हद कहां तक है ?

फिल्म की कहानी देखते हुए बार-बार हैदराबाद के उस चर्चित गैंगरेप और हत्या के मामले की याद आती है, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था . 26 वर्षीय युवती के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी और शव को जला दिया गया था . घटना के बाद देश भर में आक्रोश था . पुलिस ने चार आरोपियों को गिरफ्तार किया और बाद में उन्हें उसी जगह ले जाकर मुठभेड़ में मार दिया गया, जहां उस लड़की की हत्या की गई थी.

उस एनकाउंटर ने देश में एक अलग तरह की बहस को जन्म दिया . एक तरफ बड़ी संख्या में लोगों ने इसे त्वरित इंसाफ़ के तौर पर देखा तो दूसरी तरफ यह बुनियादी सवाल उठा कि क्या किसी आरोपी को अदालत में मुकदमा चलाए बिना पुलिस हिरासत में मार दिया जाना कानून के राज के अनुरूप हो सकता है ? सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित सिरपुरकर आयोग की जांच ने बाद में एनकाउंटर को लेकर गंभीर सवाल उठाए और 10 पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा चलाने की सिफारिश की . हालांकि इस मामले में पुलिसकर्मियों को अब तक सजा नहीं हुई है .

मेघना गुलज़ार ने आधिकारिक तौर पर भले यह न कहा हो कि ‘दायरा’ उसी घटना पर आधारित है लेकिन फिल्म देखते हुए उस घटना की छाया से बच पाना मुश्किल है. शायद मेघना की दिलचस्पी भी इसी में है कि वो किसी वास्तविक घटना की हूबहू पुनर्रचना कहने की बजाय उसके बहाने एक बड़े नैतिक और कानूनी सवाल को सामने रखना चाहती हैं .
‘दायरा’ की कहानी एक जघन्य अपराध की जांच से शुरू होती है और धीरे-धीरे पुलिस, आरोपी, पीड़ित और पूरी न्याय व्यवस्था के बीच मौजूद उन परतों को खोलती है, जहां सच हमेशा उतना सीधा नहीं होता, जितना पहली नजर में दिखाई देता है. गैंगरेप और जघन्य हत्या को लेकर स्वाभाविक गुस्सा है, पीड़ित के लिए न्याय की बेचैनी है लेकिन उसके साथ ही पुलिस की कार्रवाई और तथाकथित त्वरित न्याय पर गंभीर सवाल भी हैं .
फिल्म की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मेघना गुलज़ार दर्शक को कोई आसान नैतिक फैसला नहीं देतीं. वह न तो अपराध की भयावहता को कम करती हैं और न ही ‘तुरंत न्याय’ की लोकप्रिय धारणा को बिना सवाल स्वीकार करती हैं. इसके बजाय वह दर्शक को उस असहज जगह पर खड़ा कर देती हैं, जहां भावनाओं और कानून के बीच टकराव शुरू होता है. यहां मेघना का निर्देशन खास तौर पर ध्यान खींचता है . ‘दायरा’ कोर्टरूम ड्रामा कम और जांच, संस्थागत सोच और कानून बनाम त्वरित न्याय के तनाव पर बनी फिल्म ज्यादा है . कहानी को जिस तरह धीरे-धीरे खोला गया है, उसमें निर्देशक का संयम दिखाई देता है . फिल्म कई जगह आपको जवाब देने के बजाय सवालों के साथ छोड़ती है और यही उसकी ताकत भी है .
करीना कपूर और पृथ्वीराज सुकुमारन अपने-अपने किरदारों में पर्याप्त गहराई लेकर आते हैं . खासकर दोनों के बीच मौजूद वैचारिक और पेशेवर टकराव फिल्म को बांधता भी और सोचने को मजबूर भी करता है. अभिनय यहां सिर्फ संवाद बोलने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि किरदारों की सोच और उनके भीतर चल रहे द्वंद्व को सामने लाने का माध्यम बनता है.
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी शायद यही है कि इसका असर आखिरी दृश्य के साथ खत्म नहीं होता . पर्दे से निकलने के बाद भी एक सवाल आपके साथ चलता रहता है कि अगर कानून पर भरोसा कम होने लगे, तो क्या इंसाफ के नाम पर कानून को ही किनारे किया जा सकता है? और उससे भी बड़ा सवाल कि क्या किसी भयावह अपराध के जवाब में मिली तत्काल सजा को न्याय कहा जा सकता है , अगर उसके लिए न्याय की स्थापित प्रक्रिया को ही दरकिनार कर दिया गया हो?
मेघना गुलज़ार की ये फिल्म आपको रोमांचित करने से ज्यादा असहज करती है और शायद इस विषय पर बनी फिल्म के लिए यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है . ‘दायरा’ खत्म होती है लेकिन उसके सवाल खत्म नहीं होते हैं . यही इस फिल्म की असली ताकत है .
अजीत अंजुम के फेसबुक वॉल से साभार
यह भी पढ़ें…
ऋत्विक घटक की फिल्म कोमल गांधारः विभाजन की घटनाओं का पुनरावर्तन भर नहीं
