रणबीर सिंह दहिया की रागनी – किसे और की कहाणी कोण्या
कवि का वक्तव्य
किसान को अन्नदात्ता कहते हैं। परन्तु उसके परिवार की, उसके बाल बच्चों की हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है। फौज के दरवाजे भी कमोबेश बन्द हो चुके हैं। मेहनतकश की आवाज को सुनकर भी अनसुनी कर दिया जाता है। संस्कृति के नाम पर राजे रानियों के किस्से सुनाए जाते हैं। उसकी अपनी रानी, अपनी घरवाली के साथ क्या गुजरती है, यह बहुत कम गाया जाता है। औरत का चित्रण भी बड़े अजीब ढंग से किया जाता है। एक किसान की घरवाली चमेली व फौजी की पत्नी चम्पा, दो सहेलियों की रोजमर्रा की जिन्दगी पर लिखा गया है, यह महज चम्पा चमेली का किस्सा नहीं है बल्कि अपनी तमाम प्रतिबद्धता और ईमानदारी के बावजूद काफी महिलाएं इतने वर्षों बाद भी मुख्यधारा में नहीं आ पायी, इस सवाल का जवाब उन सभी को खोजना होगा जिन्हें महिलाओं की स्थिति का अंदाजा है। नारी हिमायतियों द्वारा शोषण का मुद्दा शोषण के विभिन्न उपायों से कन्नी काट कर प्रस्तुत किया है। और इस बात पर जोर दिया है कि समाज में शोषण के विभिन्न स्वरूपों के रहते नारी का पृथक रूप से शोषण मुक्त होना संभव नहीं है। यूं तो हमारे समाज में अनेक ऐसे महिला वर्ग है जो संख्या और प्रभाव में खासे बड़े हैं पर वे एक भूमिका के लिए संगठित हुए हों ऐसे उदाहरण नहीं मिलते। खैर मेरा तो यह पहला प्रयास है। सही-गलत का फैसला जनता के दरबार में होगा। आप सभी के सुझाव आमंत्रित हैं। मैं तो इतना ही कह सकता हूं कि :
किसे और की कहाणी कोण्या,
इसमें राजा राणी कोण्या
सै अपणी बात बिराणी कोण्या, थोड़ा दिल नै थाम लियो ॥
1
यारी घोड़े घास की भाई,
चलै ना दुनिया कहती आई
बाहूं और बोऊं खेत मैं,
बालक रूलते मेरे रेत मैं
भरतो मरती मेरी सेत मैं, मत अन्नदाता का नाम लियो ।।
2
हमनै मण्डी जमकै लूटै,
म्हंगाई म्हारे जिगर नै चूटै
लुटै मेहनत आज किसान की,
गई फूट आंख भगवान की
तिजौरी भरै शैतान की, देख सभी का काम लियो ।।
3
इतने साल की आजादी मैं,
कसर रही ना बरबादी मैं
म्हारे बालक सैं बिना पढ़ाई,
बचपन मैं मरैं पड़ेगीबिना दवाई
कड़ै गई म्हारी कष्ट कमाई, झूठी होतै लगाम दियो ।।
4
शेर बकरी का मेल नहीं
घणी चालै धक्का पेल नहीं
आप्पा मारें पार पड़ेगी धीरे,
मेहनतकश रूपी जितने हीरे
बजावैं मिलकै ढोल मंजीरे, रणबीर सिंह का सलाम लियो ।।
