ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: नतीजा सिफ़र,मूल सवालों से बचते हुए इधर-उधर की बातें!

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: नतीजा सिफ़र,मूल सवालों से बचते हुए इधर-उधर की बातें!

 

            पी. जे. जेम्स

 

भारत की अध्यक्षता में आयोजित दो दिवसीय 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद जारी 140 पैराग्राफ वाले नई दिल्ली घोषणा-पत्र ने “ग्लोबल साउथ” को भले ही “सकारात्मक बदलाव का चालक” बताया हो, लेकिन आज मानवता के सामने खड़ी सबसे गंभीर और बुनियादी समस्याओं को वस्तुनिष्ठ तथा स्पष्ट राजनीतिक दृष्टिकोण से संबोधित करने में यह पूरी तरह विफल रहा है।

वास्तव में, ब्रिक्स के 11 सदस्य देशों और 10 साझेदार देशों के बीच मौजूद परस्पर विरोधी राजनीतिक-आर्थिक हितों और भू – रणनीतिक जोड़तोड़ का ही यह परिणाम है कि घोषणा-पत्र को भले ही “सर्वसम्मति का बयान” कहा गया हो, लेकिन आज दुनिया के सामने मौजूद सबसे खतरनाक संकट—ईरान के खिलाफ आक्रमण और उससे पैदा हो रहे व्यापक वैश्विक खतरे—के लिए जिम्मेदार ताकतों का नाम लेने तक से यह बचता है।

घोषणा-पत्र में “बहुध्रुवीयता”, “वैश्विक शासन”, “उभरते बाजारों और विकासशील देशों की एकता”, “जलवायु वित्त”, “कृत्रिम बुद्धिमत्ता का वैश्विक नियमन”, “डिजिटल स्वास्थ्य नेटवर्क”, “शांति और स्थिरता”, “परमाणु निरस्त्रीकरण और हथियार नियंत्रण”, “महत्वपूर्ण खनिजों की टिकाऊ आपूर्ति श्रृंखलाओं” तथा “आतंकवाद से मुकाबला” जैसे अनेक मुद्दों को जगह दी गई है। लेकिन जब दुनिया के सामने मौजूद वास्तविक युद्ध, साम्राज्यवादी आक्रमण और नव-औपनिवेशिक वर्चस्व की ठोस राजनीति का सवाल उठता है, तो यही घोषणा-पत्र मूल सवालों से बचने और इधर-उधर की बातें करने का आवरण बन जाता है।

ईरान पर अमेरिकी-इजरायली आक्रमण पर चुप्पी क्यों?

ईरान के खिलाफ जारी एकतरफा अमेरिकी-इजरायली आक्रमण के मामले में ब्रिक्स की भूमिका विशेष रूप से निराशाजनक है। मोदी सरकार की अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ती रणनीतिक घनिष्ठता से पैदा हुई तथाकथित “नाजुक कूटनीति” के चलते घोषणा-पत्र इस भयावह मानवता-विरोधी अपराध के जिम्मेदार अमेरिकी-ज़ायोनी इसराइली गठजोड़ का नाम लेने से भी बचता है।

नागरिक बुनियादी ढांचे और पश्चिम एशिया में परमाणु प्रतिष्ठानों पर हुए हमलों को लेकर घोषणा-पत्र में “गहरी चिंता” व्यक्त की गई है, लेकिन आक्रमण के वास्तविक जिम्मेदारों की पहचान करने से बचना उस चिंता को महज कूटनीतिक औपचारिकता में बदल देता है।

जब साम्राज्यवादी ताकतें एक संप्रभु देश पर हमला कर रही हों, तब केवल “गहरी चिंता” व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है। आक्रमण के खिलाफ स्पष्ट राजनीतिक रुख, आक्रामक ताकतों की पहचान और उनके विरुद्ध ठोस सामूहिक कार्रवाई ही किसी स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय मंच की प्रासंगिकता साबित कर सकती है।

डी-डॉलराइजेशन और ब्रिक्स मुद्रा पर चुप्पी

18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का दूसरा बड़ा झटका “डी-डॉलराइजेशन” (डॉलर का अवमूल्यन) यानी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने के सवाल पर इसकी पूरी चुप्पी है। इसी तरह, लंबे समय से चर्चा में रही ब्रिक्स की साझा मुद्रा अथवा डॉलर से स्वतंत्र वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ने का सवाल भी घोषणा-पत्र से लगभग गायब है।

यदि ब्रिक्स वास्तव में डॉलर-केन्द्रित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का विकल्प विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो यह पश्चिमी साम्राज्यवाद के आर्थिक वर्चस्व को चुनौती देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। इससे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित उस नव-औपनिवेशिक वैश्विक व्यवस्था को भी गहरा धक्का लग सकता है, जिसमें अमेरिका ने आर्थिक, वित्तीय और सैन्य शक्ति के बल पर स्वयं को सर्वोच्च निर्णायक के रूप में स्थापित किया है।

लेकिन जहां चीन और रूस डॉलर-वर्चस्व से मुक्त एक वैकल्पिक वैश्विक मौद्रिक ढांचे की दिशा में पहल कर रहे हैं, वहीं मोदी सरकार अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों के कारण ऐसे किसी निर्णायक कदम से पीछे हटती दिखाई देती है।

ब्रिक्स की अंतर्निहित सीमाएं

ब्रिक्स की वर्तमान स्थिति उसके भीतर मौजूद गहरे राजनीतिक, आर्थिक और भू-रणनीतिक अंतर्विरोधों को उजागर करती है। एक ओर यह स्वयं को “ग्लोबल साउथ” की आवाज और एक उभरती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के वाहक के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन दूसरी ओर उसके प्रमुख सदस्य देश साम्राज्यवाद, वैश्विक पूंजी, युद्ध, वित्तीय वर्चस्व और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रश्नों पर एक समान दृष्टिकोण नहीं रखते।

इसी अंतर्विरोध के कारण ब्रिक्स बार-बार उन निर्णायक अंतरराष्ट्रीय सवालों पर स्वतंत्र और रणनीतिक रुख अपनाने में विफल हो जाता है, जो आज पूरी मानवता के भविष्य को प्रभावित कर रहे हैं।

इसलिए केवल “बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था”, “वैश्विक दक्षिण की एकता” और “वैश्विक शासन में सुधार” जैसे नारों से काम नहीं चलेगा। साम्राज्यवादी वर्चस्व, युद्ध और आक्रमण, डॉलर के वित्तीय प्रभुत्व तथा नव-औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ ठोस राजनीतिक और आर्थिक कदम उठाए बिना ऐसी घोषणाएं महज कूटनीतिक शब्दाडंबर बनकर रह जाएंगी।

सटीक रूप से कहा जाए तो, ब्रिक्स अभी तक एक बाध्यकारी समझौते या संधि पर आधारित प्रभावी अंतरराष्ट्रीय संगठन नहीं बन पाया है। यह मुख्यतः एक अनौपचारिक परामर्श मंच और विभिन्न उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच संवाद के प्लेटफॉर्म के रूप में ही कार्य कर रहा है।

जब तक ब्रिक्स अपने भीतर मौजूद अंतर्विरोधों से ऊपर उठकर साम्राज्यवादी वर्चस्व, युद्ध और नव-औपनिवेशिक वैश्विक व्यवस्था के खिलाफ स्वतंत्र तथा ठोस सामूहिक राजनीतिक-आर्थिक कदम उठाने की क्षमता विकसित नहीं करता, तब तक “ग्लोबल साउथ के नेतृत्व” का उसका दावा वास्तविकता की कसौटी पर अधूरा ही रहेगा।

प्रस्तुति: तुहिन देव

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