मेरा माई डियर फ्रेंड और उसका ज्ञान

मेरा माई डियर फ्रेंड और उसका ज्ञान

– संजय सिन्हा

 

मेरा एक फ्रेंड है। माई डियर फ्रेंड। ऐसा ज्ञान देता है कि बड़े बड़े मैनेजमेंट गुरु भी उसके सामने नोटबुक टेक कर बैठ जाएं।

उस दिन बोला, “संजय, जिंदगी भर पत्रकारिता कर ली, लेकिन सफलता का सबसे बड़ा मंत्र नहीं सीखा।”

मैंने पूछा, कौन सा मंत्र?

उसने कहा, “मान लो कोई तुमसे नाराज हो जाए तो सबसे बड़ी गलती क्या करते हो?”

मैंने कहा, “माफी मांग लेता हूं।”

उसने अपना माथा पकड़ लिया। बोला, “यही वजह है कि तुम जिंदगी भर सीधे आदमी ही बने रहोगे। बड़े खिलाड़ी कभी अपनी गलती नहीं मानते।”

“फिर क्या करते हैं?”

“पहला सिद्धांत रट लो। कभी माफी नहीं मांगनी। चाहे सामने वाला सौ सबूत लेकर खड़ा हो जाए। चाहे पूरा मोहल्ला कहे कि गलती तुम्हारी है। चाहे अखबार लिख दें, टीवी बोल दे, सोशल मीडिया भर जाए। तुम बस एक बात याद रखना। नो माफी।”

मैंने कहा, “लेकिन लोग नाराज होंगे।”

वो हंस पड़ा। बोला, “अरे बुद्धू, नाराजगी समस्या नहीं होती। समस्या तब होती है जब तुम नाराजगी का कारण स्वीकार कर लेते हो। इसलिए पहला नियम है, गलती हुई ही नहीं।”

मैंने कहा, “अच्छा, फिर?”

“दूसरा नियम है हमला यानी अटैक। ध्यान रखना, बहस कभी उस मुद्दे पर मत होने देना जिससे लोग नाराज हुए हैं। बहस को तुरंत दूसरी पटरी पर ले जाओ। मान लो कोई तुमसे नाराज होकर तुम्हें कुछ उल्टा-पुल्टा (गाली) बोल दे। तो समझो भगवान ने तुम्हारी सुन ली। अब तुम कहना शुरू कर दो कि देखिए, मुझे कितना उल्टा पुल्टा कहा गया। मेरे स्वर्गीय पिताजी तक को नहीं छोड़ा गया। अब देखना। पांच मिनट पहले तक लोग पूछ रहे थे कि तुमसे गलती क्यों हुई। अब वही लोग पूछेंगे कि तुम्हें इतना उल्टा-पुल्टा किसने कहा? कैसे कहा? क्यों कहा? कैमरा वहीं घूम जाएगा जहां तुम चाहते हो। मूल मुद्दा पीछे चला जाएगा।”

मैंने कहा, “माई डियर फ्रेंड, ये तो बड़ा कमाल है।”

वो बोला, “अभी तो फिल्म शुरू हुई है। अब तीसरा सिद्धांत सुनो। पीड़ित बन जाओ। अंग्रेजी वाले इसे विक्टिम कार्ड कहते हैं। अभी तक लोग तुमसे जवाब मांग रहे थे। अब तुम कहना शुरू कर दो कि सबसे ज्यादा पीड़ा तो मुझे हुई है। मुझे उल्टा- पुल्टा कहा गया। मेरे स्वर्गीय पिताजी को भी नहीं छोड़ा गया। अगर हो सके तो आंखों में थोड़ी नमी ले आना। आवाज धीमी कर लेना। एक रील बना देना। बस फिर देखना। जो लोग कुछ देर पहले तुम्हारा हिसाब मांग रहे थे, वही लोग लिखने लगेंगे कि मतभेद अपनी जगह, लेकिन परिवार को बीच में नहीं लाना चाहिए था। कोई कहेगा, उम्र का लिहाज करना चाहिए। कोई कहेगा, विरोध करो लेकिन मर्यादा रखो। और जिस सवाल से पूरी कहानी शुरू हुई थी, वह धीरे धीरे गायब हो जाएगा।”

मैंने पूछा, फिर?

माई डियर फ्रेंड बोला, “अभी सबसे खतरनाक दांव बाकी है। अपराधबोध। सामने वाले को ऐसा महसूस करा दो कि गलती उसी की है। जो आदमी तुमसे सवाल पूछ रहा था, वही अब सोचने लगे कि नहीं, मुझसे ज्यादा हो गया। मुझे उनके स्वर्गीय पिताजी का नाम नहीं लेना चाहिए था। मुझे इतना कठोर नहीं होना चाहिए था। यानी जो आदमी तुम्हें कठघरे में खड़ा करने आया था, वही अपने आपको कठघरे में खड़ा कर लेगा। और तुम आराम से बैठे चाय पीते रहना।

मैंने कहा, “वाह।”

वो बोला, “वाह अभी मत बोलो संजय डियर। एक मास्टर स्ट्रोक अभी बाकी है। आखिर में घोषणा कर दो कि मैंने सबको माफ कर दिया। बस यही सबसे बड़ा खेल है। तुम लोगों ने मुझे जो कहना था कह लिया। मेरे परिवार को भी कह लिया। फिर भी मैंने तुम्हें माफ किया क्योंकि मैं दिल का बड़ा आदमी हूं। बस, खेल खत्म। कुछ देर पहले तक तुम सवालों के घेरे में थे। अब तुम नैतिकता के सिंहासन पर बैठे हो। लोग तुम्हारी गलती भूल चुके हैं। अब चर्चा तुम्हारी महानता पर हो रही है।”

मैंने अपने माई डियर फ्रेंड की तरफ देखा। मुझे लगा, मैं अब तक बेकार में पत्रकारिता करता रहा। मैं तो हर बार गलती होने पर माफी मांग लेता था। मुझे लगता था कि गलती स्वीकार करने से आदमी बड़ा होता है। लेकिन मेरा माई डियर फ्रेंड कह रहा था कि नहीं संजय सिन्हा, बड़ा वही होता है जो कहानी बदल देता है। गलती पीछे छोड़ देता है। सवाल बदल देता है। लोगों का ध्यान बदल देता है। और आखिर में उन्हीं लोगों को माफ भी कर देता है जो उससे सवाल पूछ रहे थे।

मैंने उठकर उसके हाथ चूम लिए। बोला, माई डियर फ्रेंड, आप अब तक कहां थे? यहां मैं रोज माफी पर माफी मांगता फिर रहा हूं। जबकि माफी तो शायद उन्हें मांगनी चाहिए थी जिन्होंने मुझे उल्टा-पुल्टा कहा। मैं ही नादान था जो हर बार अपनी गलती ढूंढ़ता रहा।

नोट-

पूरी बात खत्म होने के बाद अचानक मुझे अपने पिता की याद आ गई। उन्होंने बचपन में सिर्फ एक बात सिखाई थी। बेटा, गलती हो जाए तो स्वीकार कर लेना। माफी मांग लेने से आदमी छोटा नहीं होता।

मैंने अपने माई डियर फ्रेंड से कहा, “यार, तुम्हारी क्लास बहुत शानदार थी। बस एक दिक्कत है। तुम्हारी बातें सुनकर बहस तो जीती जा सकती है, लेकिन रात को आईने में अपनी आंखों में देखकर नींद आएगी या नहीं, इसकी कोई गारंटी तुमने अब तक नहीं दी।”

मेरा माई डियर फ्रेंड मुस्कुराया। “इतना न सोचो संजय बाबू। दुनिया में तुम आए हो तो जीना ही पड़ेगा…अपने जीने के लिए लोगों को तो ठगना ही पड़ेगा।”

संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से साभार

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