कागजां म्हं दौड़ रह्या सै म्हारा गणतंत्र

कागजां म्हं दौड़ रह्या सै म्हारा गणतंत्र

रणबीर सिंह दहिया

सन् 1947 मैं हाम आजाद हुये। सन् 1950 मैं छब्बीस जनवरी नै हमनै अपणा संविधान बणा कै ओ लागू करया। देश नै आजाद करावण मैं लाखां महिलां पुरुषां नै अपनी ज्यान की बाजी लाई। जिब म्हारा देश गुलाम था तो अंग्रेजों के चमचे हमनै न्यों कहया करदे अक क्यों बावले होरे सों? इन अंग्रेजों के राज मैं तो सूरज छिपता ए कोण्या। इननै ताहवणा थारे बस मैं कोन्या। फेर भगत सिंह, सुभाष बोस, गांधी अर जनता की कुर्बानी रंग ल्याई अर अंग्रेजां नै जाणा पड़या पर जान्ता-जान्ता बी ओ म्हारे देश के टुकड़े करग्या अर हमनै बी टुकड़े करण ताहिं जाड़ भींच कै जोर ला दिया। जो उन बख्तां मैं अंग्रेजां की चमची मारया करते वेहे आज फेर सन 2002 मैं एक बात कैहन्ते हान्डैं सैं अक यो देश तो न्यों ए चालैगा अमीर अमीर रहवैगा अर गरीब गरीब रहवैगा।

म्हारे शहीदां नै तो दूसरे भारत का सपना देख्या था। उनका सपना था अक म्हारे देश मैं कोए बी माणस अनपढ़ ना रहवै, कोए माणस बेरोजगार ना हो, कोए माणस भूखा ना सोवै, दवाई की अर इलाज की कमी कै कारण कोई बेमौत ना मारया जा, महिलावां नै बरोबर के हक मिलज्यां, जात के नाम पै अत्याचार ना होवैं, सब काम करैं अर सबनै सुख शांति तै रहवण का मौका थ्यावै। ये जो सपने म्हारे शहीदां नै देखे थे ये झूठे सपने कोण्या थे। ये सपने पूरे होवण के सपने थे। फेर उन बख्तां मैं जो अंग्रेजां के हिम्माती थे, उनके मुखबर थे, भगत सिंह हर कै खिलाफ मुकदमे मैं गवाही देवणिया थे देश आजाद हुयां पाछै सपन्यां नै पूरे करण का झांसा दे कै हम पै पाछले चौवन साल तै राज करण लागरे सैं।

एक बात याद आगी, एक परिवार मैं बालकां का बाबू रोज सांझ नै जिकरा करता अक एक बीस किलो दूध देवण आली भैंस ल्यावांगे। वा काली होगी, अक भूरी होगी, रूंढी होगी अक खूंडी होगी। जड़ बालक रोज दूध का बखौरा सा पीकै सो जान्दे। म्हीना होग्या बाबू नै बात करदे पर ओ भैंस कोण्या ल्याया। एक सांझ नै बालक बाबू नै बोले अक बाबू जिब भैंस ल्यावणी ए कोन्या तै इसका जिकरा बी क्यूं करया करै? बाबू बोल्या अक ले हम तो टाला कर देंगे जिकरा करण का। दस पन्दरा दिन मैं बालक फेर दुखी होन्ते बोले – बाबू भैंस ना भी ल्यावै अर दूध ना भी प्यावै तो कम तै कम जिकरा तो कर लिया कर।

तो भाई म्हारे नेतावां नै पहलम तो ये सपने पूरे करण की बहोत बात करी फेर ईब तो शेर बात बी कोण करदे। 1950 मैं म्हारे संविधान मैं लिख्या गया अक सन् 1960 ताहिं सबनै पांचमी तांहि की शिक्षा दे द्यांगे। साठ मैं बोले अक सत्तर ताहिं दे द्यांगे। सत्तर मैं बोले अक अस्सी ताहिं दे द्यांगे। अस्सी मैं दड़ मारगे। ईब 2001 मैं आकै बोले अक सब बालकां का पढ़ना कानूनन जरूरी सै अर जो मां-बाप अपने बालकां नै नहीं पढ़ावैगा उसपै कानूनी कार्रवाई करी जागी।

न्योंए सन् 1978 मैं आल्मा अटा में कसम खाई थी इननै अक सबनै 2000 ताहिं स्वास्थ्य दे द्यांगे। सन् 2001 ताहिं कागजां मैं सेहत बणाणी बी छोड़ दी। उन ताहिं अपोलो अस्पताल आगे अर म्हारे ताहिं बणे सरकारी अस्पतालां का भी फूस सा बिठान्ते जावण लागरे सैं। इनके बालक एयर कन्डीशन्ड मकान मैं रहवैं, एयर कन्डीशन्ड कार मैं चालैं अर एयर कन्डीशंड स्कूल मैं पढ़ण जावैं अर म्हारे बालकां के स्कूलां मां तै मास्टरां की नौकरी खतम करण लागरे। देखणा पड़ैगा आज 2002 की छब्बीस जनवरी पै हमनै जो 1950 की छब्बीस जनवरी नै संविधान मैं वायदे करे थे वे कितने पूरे हुए?

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