कलम और दरबार

कलम और दरबार

रत्ना भदौरिया

 

साहित्य का संकट शायद पुरस्कार नहीं, बल्कि वह प्रतीक्षा है जो पुरस्कार से पहले ही लेखक के भीतर जगह बना लेती है। जब रचना भीतर की बेचैनी से कम और बाहर की स्वीकृति से अधिक संचालित होने लगे, तब शब्दों की स्वतंत्रता धीरे-धीरे कम होने लगती है। लेखक लिखता तो वही है जो उसके भीतर उठता है, लेकिन कहीं न कहीं यह भी देखने लगता है कि उसके लिखे से कौन प्रसन्न होगा, कौन असहमत होगा और कौन-सा दरवाजा उसके लिए खुला या बंद हो सकता है। यहीं से साहित्य और दरबार के बीच की दूरी कम होने लगती है।
विरोध साहित्य की पहली साँस रहा है, लेकिन विरोध का अर्थ केवल असहमति लिख देना नहीं; उसके परिणाम के साथ खड़े रहना भी है। कठिनाई तब शुरू होती है जब लेखक पहले किसी व्यवस्था, विचार या व्यक्ति के विरुद्ध अपनी आवाज उठाता है और फिर उसी आवाज को थोड़ा धीमा करके उसी संसार में अपनी जगह तलाशने लगता है। कल जिस हाथ पर प्रश्न था, आज उसी हाथ से मिला सम्मान असहज नहीं करता—क्योंकि शायद अब प्रश्न से अधिक महत्वपूर्ण वह पहचान हो गई है जो उस हाथ से मिल सकती है। विचार बदलना स्वाभाविक है, लेकिन हर परिवर्तन विचार का नहीं होता; कुछ परिवर्तन सुविधा की दिशा में भी होते हैं।
दरबार का स्वरूप भी बदल गया है। अब उसके लिए सिंहासन आवश्यक नहीं। वह किसी सम्मान की प्रतीक्षा में हो सकता है, किसी मंच की चमक में, किसी निकटता की गर्माहट में या उस मौन में, जहाँ लेखक अपने ही शब्दों की धार थोड़ी कम कर देता है। वह किसी के सामने झुकता नहीं, केवल इतना करता है कि अपनी रीढ़ को उस दिशा में मोड़ लेता है जहाँ से स्वीकृति आने की संभावना हो। शायद आधुनिक दरबारीपन का सबसे सूक्ष्म रूप यही है—विरोध बचा रहता है, लेकिन उसकी कीमत चुकाने की इच्छा समाप्त हो जाती है।
तब साहित्य में एक अजीब-सी सुविधा जन्म लेती है। लेखक व्यवस्था से नाराज़ भी रहता है और उससे संबंध भी बनाए रखता है; प्रश्न भी करता है और लौटने का रास्ता भी खुला रखता है; हाथ भी उठाता है और अवसर आने पर वही हाथ मिला भी देता है। बाहर से सब कुछ वैसा ही दिखाई देता है—भाषा तीखी, विचार प्रखर, मंच पर असहमति—लेकिन भीतर कहीं एक गणना चलती रहती है कि कितना कहना है और कहाँ रुक जाना है।
शायद इसी गणना से साहित्य की सबसे बड़ी क्षति होती है।
क्योंकि साहित्य की शक्ति इस बात में नहीं कि वह कितनी ऊँची आवाज में विरोध करता है, बल्कि इस बात में है कि वह अपने सच से कितनी देर तक बेईमानी नहीं करता। लेखक को सम्मान मिले, इसमें कोई विडंबना नहीं; विडंबना तब है जब सम्मान की संभावना ही उसकी भाषा का अदृश्य संपादक बन जाए और वह लिखने से पहले ही अपने शब्दों को छाँटने लगे।
आखिर लेखक की असली परीक्षा पुरस्कार मिलने के बाद नहीं होती, पुरस्कार की संभावना के सामने होती है। जब उसे मालूम हो कि एक वाक्य किसी दरवाजे को बंद कर सकता है और दूसरा वाक्य उसे खोल सकता है, तब उसकी कलम किसे चुनती है—यहीं उसकी साहित्यिक स्वतंत्रता का पता चलता है।
क्योंकि पुरस्कार रचना के बाहर मिलता है, लेकिन साहित्य भीतर जन्म लेता है। बाहर की चमक समय के साथ फीकी पड़ सकती है, भीतर का सच यदि बचा रहे तो शब्द लंबे समय तक जीवित रहते हैं।
इसलिए शायद आज साहित्य को पुरस्कारों से नहीं, पुरस्कार की आकांक्षा से सावधान होने की जरूरत है। सम्मान आए तो स्वीकार हो, हाथ बढ़े तो मिलाया जाए, संबंध बनें तो निभाए जाएँ—लेकिन इतना सब करते हुए लेखक अपने भीतर वह जगह बचाए रखे जहाँ किसी पुरस्कार, किसी मंच और किसी दरबार की पहुँच न हो।
वहीं उसकी कलम स्वतंत्र रहेगी।
और शायद वहीं से साहित्य फिर जन्म लेगा।

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