राजनीति
नए सामाजिक समीकरणों को तलाशती पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति
ओमप्रकाश तिवारी
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय नए सामाजिक समीकरणों के गुणाभाग में लगी है। सपा पीडीए के नाए के साथ चुनावी मैदान में तो उतरेगी ही लेकिन उसे सभी जातियों को साधना भी है। भाजपा के सामने भी यही चुनाैती है। भाजपा के साथ रालोद तो है लेकिन रालोद के कोर वोट बैंक को अखिलेश ने चवन्नी का मुद्दा उछाल कर चुनाैती दी है। सपा के एक आंतरिक सर्वे में बताया जा रहा है कि पश्चिम की करीब साै विधानसभा सीटों पर गुर्जर समाज का अहम भूमिका हो सकती है। सपा की निगाह इसी समाज पर है। भाजपा और रालोद की निगाह भी इसी समाज पर है।
चूंकि विधानसभा चुनाव 2027 नजदीक है तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों की सक्रियता भी बढ़ गई है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन 21 सितंबर को मेरठ और 22 सितंबर को सहारनपुर पहुंचकर संगठन की तैयारियों की समीक्षा करेंगे। भाजपा के पश्चिमी संगठनात्मक क्षेत्र में 71 विधानसभा सीटें हैं। पार्टी का फोकस बूथ, शक्ति केंद्र और मंडल स्तर की तैयारियों पर है। वहीं सपा, रालोद, कांग्रेस, बसपा और आजाद समाज पार्टी भी अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश में हैं। पश्चिमी यूपी की राजनीति में इसका सबसे बड़ा कारण है साल 2022 का सामाजिक समीकरण अब उसी रूप में मौजूद नहीं है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में एक अलग भी संकेत उभर कर सामने आया है।
आमताैर पर राजनीतिक आकलन के लिए उत्तर प्रदेश के 24 जिलों को पश्चिम में माना जाता है। इन जिलों की 126 विधानसभा सीटों वाले प्रचलित राजनीतिक वर्गीकरण में 2022 में भाजपा ने 85 सीटें जीती थीं, जबकि सपा और रालोद ने मिलकर 41 सीटें हासिल की थीं। साल 2017 में भाजपा को इस क्षेत्र में 100 सीटें मिली थीं। साल 2022 में किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि और जाट-मुस्लिम राजनीतिक नजदीकी का असर पश्चिमी यूपी की कुछ प्रमुख सीटों पर दिखाई दिया था। शामली की तीनों सीटें सपा-रालोद गठबंधन ने जीतीं। मेरठ की सात में चार और मुजफ्फरनगर की छह में चार सीटें भी गठबंधन के खाते में गईं। वहीं आगरा, मथुरा, अलीगढ़, बुलंदशहर, गाजियाबाद और गौतमबुद्धनगर जैसे क्षेत्रों में भाजपा का प्रदर्शन मजबूत रहा। इससे यह तो संकेत मिलता ही है कि पश्चिमी यूपी में जाटों की नाराजगी भाजपा के लिए नुकसानदेह थी लेकिन भाजपा का चुनावी आधार केवल जाट वोट पर निर्भर नहीं था।
साल 2022 में सपा और रालोद साथ थे। अब रालोद भाजपा के साथ है। जयंत चौधरी के एनडीए में जाने के बाद पश्चिमी यूपी में सपा के सामने 2022 के जाट-मुस्लिम समीकरण को उसी रूप में दोहराने की चुनौती है। यहीं से पश्चिमी यूपी में सामाजिक समीकरण बदल जाते हैं। राजनीतिक दलों को जीतने के लिए नए साजिक समीकरण बनाने और पुराने को बचाए रखने की जरूर महसूस हो रही है।
रालोद की राजनीतिक पहचान लंबे समय से जाट समाज और चौधरी चरण सिंह की विरासत से रही है। भाजपा के साथ गठबंधन ने इस सामाजिक आधार को एनडीए के साथ जोड़ने का रास्ता बनाया है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पूरा जाट समाज किसी एक दल या गठबंधन का तय मतदाता है। किसी भी समाज का चुनावी व्यवहार सीट और उम्मीदवार के स्तर पर बदल सकता है।
इसी बदले समीकरण में अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के बीच ‘चवन्नी’ को लेकर हुई बयानबाजी महत्वपूर्ण हो जाती है। अखिलेश यादव ने जयंत पर तंज कसते हुए कहा था कि “हमने चवन्नी का रुपया बना दिया।” यह बयान उस पुराने विवाद की पृष्ठभूमि में आया जिसमें जयंत चौधरी ने सपा से अलग होने से पहले खुद को ‘चवन्नी’ न होने की बात कही थी। कुछ राजनीतिक विश्लेषणों में अखिलेश के इस बयान को गुर्जर समाज तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने की कोशिश के रूप में देखा गया। यह सच भी हो सकता है नहीं भी हो सकता है। लेकिन समीकरण इस रूप में इंगित करते हैं।
इसकी वजह भी है। गुर्जर समाज सपा की रणनीति में महत्वपूर्ण दिखाई दे रहा है। सपा के एक आंतरिक आकलन में पश्चिमी यूपी की करीब 100 सीटों पर गुर्जर प्रभाव को महत्वपूर्ण माना गया है। यही वजह है कि पार्टी गुर्जर सम्मेलन आदि आयोजित कर रही है। उसकी इस रणनीति का असर रालोद और भाजपा पर भी दिखाई दे रहा है। ये दोनों दल भी गुर्जर समाज को अपने पाले में करने में लगे हैं। भाजपा ने तो अपना क्षेत्रीय अध्यक्ष ही इसी समाज के व्यक्ति को बना दिया है।
अखिलेश यादव की राजनीतिक रणनीति का आधार पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक रहा है। पश्चिमी यूपी में इस सामाजिक फार्मूले को स्थानीय जातीय संरचना के अनुरूप विस्तार देने की कोशिश दिखाई देती है। मुस्लिम और यादव आधार के साथ गुर्जर, पाल, बघेल तथा अन्य गैर-यादव पिछड़े समुदायों तक पहुंच बनाने की चर्चा इसी रणनीति से जुड़ी है। इस रणनीति का मूल राजनीतिक गणित यह है कि यदि जाटों का बड़ा हिस्सा भाजपा-रालोद के साथ रहता है, तो सपा को उसकी भरपाई दूसरे प्रभावशाली सामाजिक समूहों से करनी होगी।
भाजपा के लिए पश्चिमी यूपी में रणनीति का दूसरा हिस्सा अपने मौजूदा सामाजिक आधार को बनाए रखना है। साल 2022 में भाजपा ने पश्चिमी यूपी की 126 में 85 सीटें जीती थीं। इसका मतलब है कि किसान आंदोलन और जाट असंतोष के बावजूद भाजपा ने गैर-जाट सामाजिक समूहों में पर्याप्त समर्थन बनाए रखा था। साल 2027 में भाजपा के सामने इसी व्यापक आधार को बनाए रखने की चुनौती है। उसकी नई पश्चिमी क्षेत्रीय कार्यकारिणी में जाट, गुर्जर, दलित, ब्राह्मण, ठाकुर, त्यागी, सैनी, लोधी और कश्यप सहित विभिन्न सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। इसे 2027 के लिए सामाजिक संतुलन साधने की संगठनात्मक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। इसलिए भाजपा के लिए पश्चिमी यूपी का संभावित सामाजिक आधार केवल जाट और पार्टी के पारंपरिक समर्थक तक सीमित नहीं है। गैर-यादव ओबीसी, दलित और अन्य हिंदू सामाजिक समूहों में अपनी पकड़ बनाए रखना भी जरूरी है।
पश्चिमी यूपी में मुस्लिम मतदाता कई विधानसभा क्षेत्रों में महत्वपूर्ण संख्या में हैं। साल 2022 में जिन इलाकों में जाट और मुस्लिम मतदाताओं के बीच राजनीतिक नजदीकी बनी, वहां सपा-रालोद गठबंधन को लाभ मिला।साल 2027 में रालोद के भाजपा के साथ होने के कारण सपा के लिए मुस्लिम समर्थन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। मगर केवल मुस्लिम समर्थन के आधार पर वह 2022 का प्रदर्शन दोहरा सकेगी, यह मानना उचित नहीं होगा। उसे गैर-यादव पिछड़े और दलित मतदाताओं में भी पर्याप्त समर्थन जुटाना होगा। यहीं पीडीए रणनीति की वास्तविक परीक्षा होगी।
गुर्जर समाज पश्चिमी यूपी के कई हिस्सों में प्रभावशाली है। इसी कारण भाजपा, रालोद और सपा तीनों की राजनीतिक गतिविधियों में यह समुदाय दिखाई दे रहा है। सपा गुर्जरों को अपने पीडीए विस्तार का हिस्सा बनाना चाहती है। भाजपा संगठन में गुर्जर प्रतिनिधित्व और संपर्क बनाए रखने पर जोर दे रही है। रालोद भी जाट के साथ गुर्जर सामाजिक संपर्क बढ़ा रहा है। हाल में रालोद की ओर से सहारनपुर में जाट-गुर्जर एकजुटता को लेकर कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसलिए गुर्जर समाज को किसी एक दल का तय वोट बैंक मानना संभव नहीं है। असल चुनावी सवाल यह होगा कि गुर्जर मतदाताओं का कितना हिस्सा किस गठबंधन के साथ जाता है।
पश्चिमी यूपी में सामाजिक समीकरण का तीसरा महत्वपूर्ण हिस्सा दलित मतदाता हैं। यह समाज बसपा का पारंपरिक वोट माना जाता है। लेकिन चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी ने दलित राजनीति को एक नया राजनीतिक केंद्र दिया है। साल 2024 में नगीना लोकसभा सीट पर चंद्रशेखर आजाद की जीत इसका उदाहरण है। इसका असर 2027 में यह हो सकता है कि दलित मतदाताओं के सामने एक से अधिक राजनीतिक विकल्प माैजूद हैं। सपा के लिए इसका अर्थ है कि पीडीए में दलित हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश उसे बसपा और आजाद समाज पार्टी दोनों से प्रतिस्पर्धा में ले जाती है।
साल 2024 में पश्चिमी यूपी की 29 लोकसभा सीटों में भाजपा ने 14, सपा ने 12, रालोद ने 2 और आजाद समाज पार्टी ने 1 सीट जीती। 2019 में भाजपा ने इन्हीं 29 सीटों में 21 सीटें जीती थीं। इस परिणाम ने यह दिखाया कि पश्चिमी यूपी में भाजपा का आधार मजबूत होने के बावजूद उसमें बदलाव की गुंजाइश है। साथ ही रालोद का भाजपा के साथ होना 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए एक अलग सामाजिक समीकरण बनाता है।
इसलिए 2024 को 2027 का सीधा संकेत मानना भी सही नहीं होगा। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार, मुद्दे और मतदान व्यवहार अलग हो सकते हैं।
नितिन नवीन का मेरठ और सहारनपुर का दौरा इस बात का संकेत है कि भाजपा अब संगठनात्मक स्तर पर 2027 की तैयारी तेज कर रही है। इसी दौरान पश्चिमी यूपी में सपा का पीडीए सम्मेलन और रालोद के जनसंपर्क कार्यक्रम भी होने जा रहे हैं। इसका मतलब है कि चुनावी मैदान में उतरने से पहले दल सामाजिक आधार और संगठन दोनों को मजबूत करने में लगे हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2027 की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि 2022 का जाट-मुस्लिम समीकरण अब 2027 में उसी रूप में उपलब्ध नहीं है। रालोद के भाजपा के साथ आने से जाट राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा एनडीए के साथ है। इसके जवाब में सपा गुर्जर, दलित और अन्य गैर-यादव पिछड़ी जातियों को अपने पीडीए ढांचे में जोड़ने की कोशिश कर रही है। भाजपा की चुनौती अपने 2022 के व्यापक सामाजिक आधार को बनाए रखने की है। उसके लिए जाटों के साथ गुर्जर, गैर-यादव ओबीसी, दलित और दूसरे हिंदू सामाजिक समूहों में समर्थन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा। इसलिए पश्चिमी यूपी की 2027 की राजनीति को केवल जाट बनाम मुस्लिम के पुराने फ्रेम में देखना पर्याप्त नहीं होगा। असली राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब इस बात की है कि जाटों के अलावा गुर्जर, दलित और गैर-यादव पिछड़ी जातियों का कितना हिस्सा कौन अपने साथ जोड़ पाता है। अभी किसी सामाजिक समूह को किसी एक दल का निश्चित वोट बैंक मानना जल्दबाजी होगी। चुनाव के करीब आते-आते गठबंधन, उम्मीदवार और स्थानीय मुद्दे इन समीकरणों को बदल सकते हैं। लेकिन सितंबर 2026 की स्थिति में इतना स्पष्ट है कि पश्चिमी यूपी में 2027 की लड़ाई से पहले सामाजिक गठजोड़ों को फिर से गढ़ने का काम शुरू हो चुका है।
