जलेस-प्रलेस अंंबाला ने संगोष्ठी कर प्रेमचंद, उधम सिंह और मोहम्मद रफी को किया याद
तीनों महान विभूतियों के योगदान पर साहित्य प्रेमियों ने की चर्चा
महापंडित ‘राहुल सांकृत्यायन’ और कवि ‘धूमिल’ की मूर्तियां तोड़ने के विरोध में प्रस्ताव पारित


अंबाला। स्थानीय रेलवे कालोनी अंबाला छावनी में जनवादी लेखक संघ और प्रगतिशील लेखक संघ अंबाला इकाई द्वारा अमर कथाकार प्रेमचन्द, अमर शहीद उधम सिंह और अमर गायक मोहम्मद रफ़ी के अतुलनीय योगदान को याद करते हुए एक साहित्यिक/ सामाजिक विचार-चर्चा का आयोजन किया गया । यह कार्यक्रम प्रेमचन्द जयंती, शहीद उधम सिंह के शहीदी दिवस और मोहम्मद रफ़ी के स्मृति दिवस(31 जुलाई ) के उपलक्ष्य में किया गया था।
कार्यक्रम की अध्यक्षता जलेस- अंबाला इकाई की अध्यक्षा अनुपम शर्मा ने की।संचालन जलेस के प्रांतीय अध्यक्ष श्री जयपाल ने किया। मुख्य वक्ता रहे जलेस सचिव ओम बनमाली, तर्कशील हरियाणा के संपादक गुरमीत सिंह व प्रलेस प्रदेश वित्तसचिव प्रो गु्रदेव सिंह देव।
कार्यक्रम का आगाज पंकज शर्मा ने मोहम्मद रफी के गीत ‘कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो’ को तरुन्नम में गाकर किया, जिसे खूब सराहना मिली। मुख्य वक्ता ओम बनमाली ने प्रेमचन्द के जीवन और साहित्य पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रेम चंद ने मानवीय जीवन को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ अपनी रचनाओं में चित्रित किया। मजदूर, किसान ,दलित, जातिवाद, महिला ,शिक्षा, स्वास्थ्य, साम्प्रदायिकता, शोषण आदि सामाजिक/राजनीतिक विषयों को अपनी कहानियों और उपन्यासों में प्रमुखता के साथ उठाया। ये ऐसे मुददे हैं जिनसे आज भी हमारा देश संघर्ष कर रहा है।
प्रगतिशील लेखक संघ के प्रांतीय वित्त सचिव प्रोफेसर गुरुदेव सिंह देव ने शहीद उधम सिंह के जीवन और शहादत पर शोधपरक वक्तव्य देते हुए बताया कि किस प्रकार उन्होंने अदालत में अपना नाम ‘राम मुहम्मद सिंह आजाद’ बताया था। उन्होंने उनके पारिवारिक जीवन, छात्र जीवन और विदेश के संघर्ष को बहुत ही संघर्षशील,त्याग पूर्ण और देशभक्ति से ओतप्रोत बताया। उधम सिंह भगत सिंह को अपना गुरु और आदर्श मानते थे। प्रोफेसर देव ने मोहम्मद रफ़ी का गीत– ‘मुझको मेरे बाद ज़माना ढूँढ़ेगा’- तरुन्नम में गाकर अपना वक्तव्य समाप्त किया।
तर्कशील पत्रिका के संपादक गुरमीत सिंह ने मोहम्मद रफ़ी को नेक, शरीफ और मानवीय गुणों से भरपूर धर्म-निरपेक्ष व्यक्ति बताया जिसने देश प्रेम, भक्ति गीत, मानवताबोध और सिनेमा के गीत गाए। उनकी आवाज में एक चमत्कारिक कशिश थी।
मूल रूप से राजस्थान से और रेलवे कर्मचारी केसर सिंह मीणा का विचार था कि अगर प्रेमचन्द ने अंग्रेजी में लिखा होता तो उन्हें साहित्य का नोबल पुरस्कार मिलता। उन्होंने ‘अफवाह’ शीर्षक अपनी कविता सुनाकर वर्तमान सत्ता के चरित्र को उजागर कर दिया। उन्होंने राजस्थानी बोली में एक लोकगीत भी सुनाया।
प्राध्यापक जसवंत सिंह ने शहीद उद्धम सिंह के बचपन से फांसी तक की कहानी को साहित्यिक अंदाज में उनके महत्वपूर्ण जीवन प्रसंगों को याद किया। पंजाब के महान नाटककार सरदार गुरशरण सिंह के नाटकों में अभिनय करने वाले कवि यादविंदर सिंह कलोली ने अपनी कविता के द्वारा आज देश बेचने वाले नेताओं पर करारा व्यंग्य किया–
तूं आलणा किवें बचाएगा
जदों रुख उन्हां कटवा देणे ।
तूं फिरदा चंद सियाड़ा लई
उन्हां देश बेच के खा जाणा ।
रेलवे कर्मचारियों के हकों की आवाज उठाने वाले जुझारू कवि नरसिंह मयूर ने तीनों महान विभूतियों को अपनी कविता समर्पित करते हुए कहा कि महापुरुषों और क्रान्तिकारियों के कारण आज हम आजाद हैं। क्रांतिकारी साहित्य के विशेष अध्येता श्री संदीप कुमार ने बताया कि अगर उधम सिंह चाहते तो फांसी से बच सकते थे।
लेकिन उसने यह स्वीकार नहीं किया। शहीद उधम की शहादत पर गांधी जी की प्रतिक्रिया को संदीप कुमार ने आपत्तिजनक और शहीदों का अपमान बताया। क्योंकि गांधी जी ने उधम सिंह द्वारा जनरल माइकल ओ डायर की हत्या को हिंसात्मक कारवाई माना था।
उपन्यासकार/कथाकार/कवि और पत्रकार बलराम सैनी ने आतंकवाद के दौर के अपने अनुभव साँझा करते हुए कहा कि महान पुरुषों की कोई जाति नहीं होती। अपनी जाति पर हमें न गर्व करना चाहिए और न शर्म क्योंकि अपने जन्म की न हमारी कोई च्यवाईस है और न इसमें हमारा कोई योगदान। अंत में उन्होंने अपनी एक लघु कविता सुनाई..हमें तो सत्ता चाहिए बस!
कार्यक्रम के अंत में अध्यक्षा अनुपम शर्मा ने कहा कि हमारे साहित्यिक/सामाजिक संघर्षों में महिलाओं की सहभागिता बहुत कम होती है। बिना महिला की सहभागिता के हम कोई भी सामाजिक/राजनीतिक परिवर्तन नहीं कर सकते । कर्मचारी नेता नदीम खान,सामाजिक चिंतक हरदीप सिंह और तर्कशील साथी आत्मा सिंह ने भी इस विचार विमर्श में सक्रिय हिस्सेदारी की। आज का प्रबंधन श्री नरसिंह मयूर ने किया।
चर्चा का सार यही रहा कि भारत एक साँझी संस्कृति वाला बहुलतावादी देश है। यही इसकी प्रकृति है । इसे बचाया जाना बहुत जरूरी है । यह किसी एक धर्म, जाति, भाषा,आदि का देश नहीं है।


बनारस में खंडित कवि धूमिल की प्रतिमा।
कार्यक्रम के अंत में जलेस/ प्रलेस द्वारा सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया गया जिसमें महापण्डित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमाओं के तोड़े जाने को बेहद कायरतापूर्ण कारवाई कहा गया। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में काकोरी कांड के क्रान्तिकारी शहीदों और क्रांतिकारी कवि सुदामा पांडे ‘धूमिल ‘ की मूर्तियां तोड़कर अपमानित करने के प्रति भी तीखा विरोध दर्ज किया गया। इससे पूर्व भी ईश्वर चन्द्र विद्या सागर, भीमराव अंबेडकर,गांधी जी आदि की प्रतिमाओं को तोड़ने की दुखद घटनाएं देखी गई । प्रस्ताव में कहा गया कि क्रांतिकारियों, शहीदों, साहित्यकारों और अन्य महान पुरुषों की प्रतिमाओं को तोड़ने और अपमान करने वाले दोषियों को कानून के अनुसार सख्त से सख्त सजा दी जाए।
