डॉ रीटा अरोड़ा की लघुकथा नज़र का सच

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

लघुकथा

नज़र का सच

डॉ रीटा अरोड़ा

 

 

“रीमा, लोग मुझे गलत क्यों समझते हैं?”

 

“शायद वे तुम्हें देखते कम हैं… समझते ज्यादा हैं।”

 

“मतलब?”

 

“अपने हिसाब से।”

 

“पर मेरी सच्चाई?”

 

“वह जानने की कोशिश कौन करता है?”

 

सुधा कुछ पल चुप रही।

 

“किसी ने मुझे घमंडी कहा, किसी ने स्वार्थी।”

 

“तुमने सफाई दी?”

 

“दी थी।”

 

“मानी?”

 

सुधा हल्का-सा मुस्कुराई, “नहीं।”

 

“फिर?”

 

“फिर मैंने चुप रहना सीख लिया।”

 

रीमा ने पूछा, “दुख नहीं होता?”

 

“होता है… जब अपने ही ऐसा समझें।”

 

“तो उन्हें सच क्यों नहीं बताती?”

 

सुधा खिड़की से बाहर देखते हुए बोली,

“सच बताने के लिए सामने वाले का जानना चाहना भी तो जरूरी है…”

 

रीमा चुप हो गई।

 

सुधा ने धीरे से कहा-

 

“कभी-कभी लगता है… लोग मुझे नहीं, अपने मन में बनी मेरी तस्वीर को ही देखते हैं।”

 

रीमा ने उसकी ओर देखा।

 

सुधा की आँखें खिड़की के बाहर थीं…

और शायद पहली बार उसे लगा कि हर गलत समझे जाने पर सफाई देना भी जरूरी नहीं होता।

 

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