व्यंग्य
विज्ञान का मतलब
रणबीर सिंह दहिया
सते, फते, नफे, कविता, सविता, सरिता, ताई भरपाई शनिवार को जन चेतना केन्द्र आई और दुख-सुख की बतलाई। कविता ने बात चलाई – यो विज्ञान का मतलब कोनी समझ मैं आया, इसपै चरचा करण की जरूरत सै। सरिता बोली – थोड़ा घणा तो मैं बता सकूं सूं। नफे बोल्या – अपने घर बिध की बात करल्यो नै, विज्ञान पै चरचा करकै क्यों बोर करो सो।
सरिता बोली – एक कहानी सुनाऊं सूं। हो सकै सै कुछ बात बणज्या। कहानी शुरु करी – एक राजा था। कोए कमी नहीं थी। एक नान्हा सा राजकुमार भी था। इतना सब कुछ था राजा पै पर वो कुछ दिन तै खोया-खोया सा रहवण लाग्या। असल बात या थी अक छोटा राजकुमार इसे सवाल पूछ लेन्ता जिनके जवाबां का राजा नै बेरा कोनी होन्ता ज्यूकर – पिताजी चिड़िया क्यूकर उड़ै सै? कदे बूझता – ये सारी चीज हमेशा तलै नै ए क्यों पड़ैं सैं, ये ऊपर नै क्यों नहीं चली जान्ती?
राजकुमार नै एक डला ऊपर नै फैंक कै दिखाया फेर वो तले नै आग्या। इन सब बातां के जवाब राजा पै थे कोनी अर राजा झुंझला पड़ता अर राजकुमार पै डांट मार देन्ता। छोटा राजकुमार कट्या-कट्या सा रहवण लाग्या राजा तै। राजा के दिमाग में ये सारे सवाल घूमते रहते।
आखिर एक दिन अपने सबतै काबिल मन्त्री को बुलाया अर बोल्या – मंत्री जी, राजकुमार मेरे तै सवाल बूझै सै पर मैं उनके जवाब कोनी दे पान्ता। मेरे मन मैं भी कुछ सवाल उठैं सैं सुन्या सै इसे सवालां का जवाब विज्ञान के जरिये दिया जा सकै सै। थाम विद्वान सो, बुद्धिमान सो, बताओ नै कुछ इस विज्ञान के बारे मैं।
राजा की बात सुणकै मंत्री सोच मैं पड़ग्या। एक तो विज्ञान के बारे मैं जानकारी थोड़ी, दूजै राजा बरगे अनाड़ी नै विज्ञान के बारे मैं समझावै क्यूकर? दस दिन बीतगे विचार करतें फेर राजा तै कह्या – महाराज! आपनै बहोत बड़ा सवाल कर दिया अक विज्ञान के सै? इसका जवाब देवण तै पहलम यो जानना जरूरी सै अक राजकुमार के अर थारे सवालां मैं समानता के सै? समानता या सै अक इन सारे सवालां का सम्बंध सारी दुनिया तै सै जो कि दुनिया नै समझण की जिज्ञासा करकै पैदा होवै सैं।
महाराज, विज्ञान की शुरूआत इसे जिज्ञासा तै होवै सै। याहे वा जिज्ञासा सै जो किसे चीज नै देख कै, छूकै, सूंघकै, चाखकै अर सुणकै पैदा होवै सै। या जिज्ञासा एक सवाल ठावै सै अर विज्ञान उस सवाल का जवाब देवण की कोशिश करै सै। इस ढालां विज्ञान म्हारे चारों कान्ही फैली दुनिया नै समझण मैं म्हारी मदद करै सै।
राजा नै सुणकै कह्या – मंत्री जी, यातो ठीक बात सै फेर यू विज्ञान इन सवालां का जवाब क्यूकर देवै सै? मंत्री बोल्या या बात समझण की खातर हमनै वैज्ञानिक के काम काज पै गौर करना पड़ैगा। पहली बात – वो समस्या के बारे मैं अवलोकन करे गये सारे तथ्य कट्ठे करै सै। फेर उन तथ्यां नै मिलाकै उस अज्ञात की एक दिमागी तसवीर बनावै सै।
कई बार इसा होवै सै अक कठ्ठे करे गये तथ्य उस दिमागी तसवीर के लिए काफी नहीं होन्ते। फेर वो प्रयोग की खातर आगै कदम बढ़ावै सै अर उस मामले मैं फालतू तथ्यां की खोज करै सै। यह क्रम तब तक चलता है जब तक कि एक इसी तर्कपूर्ण अर सम्भावित दिमागी तसवीर नहीं बन जान्ती जो समस्या का ठीक जवाब हो। राजा नै कह्या – मंत्री जी, थारी बात मेरी तो समझ मैं कोनी आई। क्या आप किसे सीधे-सादे उदाहरण से अपनी बात साफ नहीं कर सकते के?
मंत्री बोल्या – जी महाराज! क्यों नहीं कर सकदा, …….. के ही एक सवाल नै लेल्यो। उसने बूझया था अक चीज तले नै ए हमेश्या क्यो गिरैं सैं? इस सवाल की जड़ याहे सै अक हम रोजाना देखां सां अक जब भी कोए चीज हवा मैं छोड़ दी जावै सै तो वा नीचै ए गिरै सै। फेर सोचै सैं अक क्या यो अवलोकन सभी चीजां अर सारी जगहां की खातर सही सै?
इस बात का बेरा पाड़ण की खातर हमनै न्यारी-न्यारी चीजां पै अर न्यारी-न्यारी जागां पै प्रयोग करना पड़ैगा। जै हम इसा करांगे तो बेरा लागैगा अक सारी चीज ज्यूकर – पत्थर, सिक्के, सूई, कपड़े, कागज चाहे भारी हों चाहे हल्के, नीचे ए नै गिरैंगे जागां चाहे कोए हो। कई साल पहलम एक वैज्ञानिक नै इसा ए प्रयोग कर्या था अर म्हारे ताहिं इस सवाल का जवाब दिया था। राजा की दिलचस्पी काफी बधगी थी। उसनै बूझाया – वो जवाब के था? मंत्री बोल्या – जवाब तो सीधा-सा सै चीजें इस करकै नीचे नै गिरैं सैं अक धरती इन चीजां नै अपनी कानहीं खींचै सै। राजा उछल कै पड़या – इतनी सीधी-सी बात! मेरा ध्यान बेरा ना क्यों नहीं गया इस कान्हीं।
मंत्री बोल्या – महाराज कई जवाब साधारण होसैं फेर उनकी तलाश इतनी साधारण बात नहीं होन्ती। पक्के नतीजे तै पहलम काफी अवलोकन, प्रयोग, विश्लेषण वगैरह की जरूरत होवै सै। कई कई बै वैज्ञानिक किसे जवाब की तलाश मैं सारी उमर गुजार देसैं फेर बी उन सवालां का जवाब उसकी मौत के कई सालां बाद मिलै सै।
आगले दिन राजा नै मंत्री ते कह्या – प्रयोग करकै सिखाओ तो मैं प्रयोग करण नै तैयार सूं। आगले दिन मंत्री तीन आन्धे आदमी अर एक हाथी महल मैं लियाया। राजा, राजकुमार अर महल के निवासी कठ्ठे होगे।
मंत्री नै तीनूं आन्ध्यां तै एक-एक करकै हाथी को छूने अर उसका वर्णन करण का आदेश दिया। पहले नै पूंछ टिटौली अर बोल्या या तो रस्सी बरगी चीज सै। दूसरे नै सूंड कै हाथ लाया अर बोल्या या तो सांप बरगी कोए चीज सै। तीसरे ताहीं उसकी टांग पकड़ा दी। उसनै कह्या या तो पेड़ के मोटे तने बरगी चीज सै। सारे लोग हंस पड़े। आन्धे सकपका से गये। फेर हटकै मिलकै कोशिश करण की बात करी। खूब बतलाये। किसे नतीजे पर नहीं पहोंच पाये।
फेर टटोल्या मिलकै अर सूंड तै सिर पै गये, आंख टटोली, कान टटोले। पाह्यां ते पेट पर गये। कुल मिलाकै अपने अनुभवां पै चर्चा करी अर बोले – जिस चीज की हमनै खोज करी सै वो बहोत बड्डा जानवर सै, जिसकी नाक इतनी लाम्बी, पूंछ इतनी लाम्बी, बहोती मौटे पां सैं। अन्दाजा सै अक यू हाथी हो सकै सै अर कै उसे बरगा कोए और जानवर हो सकै सै। मंत्री नै राजा को बताया अक हर एक आन्धे नै उपलब्ध प्रमाण कठ्ठे करे अर उनके आधार पर उस अज्ञात जानवर की दिमागी तसवीर बनाने की कोशिश करी।
चूंकि वे आन्धे थे इसलिए उनके प्रमाण भी सिमित थे इसलिए उनकी जो पहली दिमागी तस्वीर बनी वा सही नहीं थी। फेर उननै अपने अनुभवों को खोज अर प्रयोग तै बधावण की कोशिश करी। सारी सूचनाएं कठ्ठी करी। किसे एक हिस्से का व्यवस्थित तरीके तै अवलोकन कर्या अर जांच पड़ताल करी। खोजबीन के हर कदम पर अपने अवलोकन एक दूसरे ताहिं बताये अर उनपै चर्चा करी तब कितै जाकै उनके दिमाग मैं उस जानवर की ज्यादा सही तसवीर उभरी। लोगां की बात सुणकै जो हाथी का अन्दाज उनके मन मैं पहलम तै था वोह ईब साबित होग्या। प्रयोग तै अन्दाज को सही साबित करना विज्ञान का तरीका सै। योहे तो सै विज्ञान। सरिता चुप होगी। आई किमे समझ मैं?
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