मंजुल भारद्वाज की दो कविताएं

मंजुल भारद्वाज की दो कविताएं

1-

क्या भावनात्मक शिगूफ़ा भर है रिश्ता?

बारिश की पहली बूंद को छू कर
जब धरती सौंदी सौंदी महकती थी
तब मां गुलगुले बनाती थी
बारिश का मां ऐसे
जश्न मनाती थी !

गुलगुले मुझे बहुत पसंद हैं
कहीं भी रहूं
जब बारिश होती थी
मां का फ़ोन आता था
बेटा आजा
गुलगुले बनाए हैं !

आज मां नहीं है
पर उसकी याद
हर बूंद सी
सांसों में महकती है !

तो क्या मां मेरे लिए
बरसात की बूंदों में नहाई
सौंदी सौंदी महकती धरती
और तलते गुलगुलों की छमक भर है ?

क्या रिश्ता व्यवहार के
भाव प्रधान लम्हों की
स्मृति भर है?

या रिश्ते व्यवहार भर नहीं हैं
व्यवहार सिर्फ़ रोज़मर्रा के जीवन का स्थूल स्वरूप है
रिश्तों का मूल है
सूक्ष्म जीवन मूल्य!

क्या व्यवहार जीवन मूल्यों से संचालित होता है ?
या रोज़मर्रा का भाव
उसे मूल्यों तक पहुंचने ही नहीं देता !

जैसे मां
मेरे लिए गुलगुलों की याद भर नहीं
मेरा पूरा अस्तित्व है!

हर मां का ख़्वाब होता है
उसकी संतान उसकी आख़िरी सांस तक
उसके सामने हंसती खेलती
फलती फूलती रहे !

क्या जीवन इतना भर है?
क्या इतना भर ही है रिश्ता ?

इतना ही जीवन
और रिश्ता होता तो
भगत सिंह क्यों कहता ?
मेरा रंग दे बसंती चोला
मां ऐ रंग दे बसंती चोला
अपनी मां से किस मां के लिए
बसंती चोला रंगने के लिए
कहा भगत सिंह ने ?

वो मां थी
भारत मां
भारत मां मतलब भारत की जनता
जो सदियों से ग़ुलाम थी
ग़ुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ने के लिए
भारत मां को आज़ाद कराने के लिए
अपनी आहुति देने के लिए
भगत सिंह ने अपनी मां से कहा
मेरा रंग दे बसंती चोला
मां ऐ रंग दे बसंती चोला !

क्या भगत सिंह
भाव शून्य था
उसे अपनी मां से प्यार नहीं था?
क्या भगत सिंह की मां को
अपने बेटे से प्यार नहीं था ?

था बेहद प्यार था दोनों में
पर दोनों ने अपनी भावनाओं को
विचार,दर्शन,तत्व और मानवीय मूल्यों को
अर्पित कर दिया
इतिहास में सदा सदा के लिए !

क्या यह रिश्तों की सही
सार्थक और सटीक परिभाषा नहीं रचते ?

क्या तत्व विहीन
जीवन मूल्यों से रिक्त
केवल भावनात्मक शिगूफ़ा
होता है रिश्ता?

2

कुम्हार

 

अपने आप को
हर पल मथता हुआ
हर पल बनाकर
हर पल विखंडित करता हुआ !

रचना प्रकिया की सहजता से
विचार,भावना,
शरीर और अध्यात्म के सिरों को
काल की कसौटी पर परखता हुआ !

इंसानियत की वेदना
संवेदना को
देह की माटी में
आत्मबोध के साक्षात्कार से
हर घड़ी
घट घड़ता हुआ
कुम्हार !

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