डॉ रीटा अरोड़ा की कविता- मैं पैसा हूं…

कविता

मैं पैसा हूँ…

डॉ रीटा अरोड़ा

मैं पैसा हूँ…
मेरी कीमत तो लिखी हुई है, लेकिन तुम्हारी अभी लिखी जानी है।

मैं पैसा हूँ…
छोटा-सा कागज़ कहलाता हूँ, ….इंसानों का चरित्र बताता हूँ।

मैं पैसा हूँ… वही,
जिसके पीछे इंसान भागता रहता है।
सुबह से शाम ही नहीं, …. कभी सारी उम्र दौड़ता रहता है।

कोई मुझे लक्ष्मी मानकर पूजता है, … कोई तिजोरी में छिपाता है।
कोई मुझे माथे से लगाता है, … कोई मेरे लिए अपना ईमान गिरवी रख आता है।

कभी रुपया, कभी डॉलर, … कभी दिरहम कहलाता हूँ।
सरहद चाहे जितनी बदलें, … हर देश में पहचाना जाता हूँ।

मैं मंदिर का दीप जलाऊँ, … मैं अस्पताल बनवाता हूँ।
सही हाथों में पड़ जाऊँ तो, …. इंसानियत बचाता हूँ।

लेकिन… जब इंसान मुझे

साधन नहीं, साध्य बना लेता है,
तब मेरा भी दम घुटने लगता है।

अक्सर लोग कहते हैं… “पैसा बहुत बुरा है…”

मैं मुस्कुरा देता हूँ।

क्योंकि…
मैंने कभी किसी से नहीं कहा… रिश्वत लो, …ईमान बेच दो,
मैंने कभी किसी से नहीं कहा…..या अपनों से रिश्ते तोड़ दो।

मैं तो…
जिस हाथ में जाता हूँ, …. उसी का चरित्र ओढ़ लेता हूँ।
संत के हाथ पड़ूँ, …. तो दान बन जाता हूँ।

मेहनतकश के हाथ पहुँचूँ, …. तो सम्मान बन जाता हूँ।
और चोर के हाथ पड़ूँ, ….तो अपराध कहलाता हूँ।

अब जाते-जाते…
बस एक बात कहूँगा-

मुझे कमाना … ईमान और …… मेहनत से कमाना।

लेकिन-
इतना मत कमाना कि बच्चे, ….. तुमसे नहीं-विरासत से प्यार करें।
तुम्हारे जीते-जी भी केवल, …. तुम्हारी संपत्ति का इंतज़ार करें।

इतना मत बचाना कि आखिर, … नोटों से सारा घर भर जाए।
और अर्थी को कंधा देने वाला, … कोई अपना ही न रह जाए।

याद रखना-
जिस दिन तुम्हारी अंतिम यात्रा निकलेगी,

मैं तुम्हारे संग… एक कदम भी नहीं चल पाऊँगा।
किसी वारिस के हाथ बदलकर, फिर किसी और का हो जाऊँगा।

मेरी कीमत तो लिखी हुई है, ….तुम्हारी कीमत चरित्र बताएगा।
मैं तो यहीं पड़ा रह जाऊँगा, …. तुम्हारा कर्म तुम्हारे साथ जाएगा।

मैं पैसा हूँ-
मुझे कमाना, …. मुझे सँभालना, …. मुझे सही जगह चलाना।

मगर याद रखना-
मुझे जेब में रखना… मुझे जेब में रखना … दिल में कभी मत बसाना।

डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल