लाजवन्ती कहां जाए !

वर्ण व्यवस्था और पितृ सत्ता के जाल़ में फंसे हमारे समाज में स्त्री दोगुना ज्यादा शोषण उत्पीड़न की शिकार होती है। एक तो स्त्री होने के नाते और दूसरे सामंती समाज की सोच के चलते ऐसा होता है। लेकिन क्या यह नैसर्गिक विधान है या हमारे समाज की मनुवादी सोच के द्वारा निर्मित अप्राकृतिक, अस्वाभाविक, मानव निर्मित, कृत्रिम-ढांचे के चलते ऐसा होता आया है? वरिष्ठ कहानीकार ओमसिंह अशफ़ाक की यहां प्रस्तुत ये कहानी हमारे समक्ष ऐसे ही कई गंभीर सवाल खड़े कर देती है। संपादक।

कहानी

लाजवन्ती कहां जाए !

ओमसिंह अशफ़ाक

 

लाजवन्ती का जन्म आज से करीब 85 साल पहले हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सीमा पर यमुना नदी के किनारे बसे एक गांव के छोटे किसान परिवार में हुआ था। यमुना की रेत में खेल-कूद कर वह बड़ी हुई। सोलह साल की उम्र में उसका विवाह हो गया था। इत्तफाक से उसकी ससुराल का गांव भी पन्द्रह कोस दूर यमुना किनारे ही बसा हुआ था।

शादी के कुछ समय बाद उसका पति फौज में भर्ती हो गया। लाजवन्ती ने ससुराल के संयुक्त परिवार में पांच-छह साल इसी उम्मीद के सहारे गुजारे थे कि कभी न कभी वह अपने पति के साथ परदेश जायेगी। लेकिन ऐसा वक्त कभी नहीं आया। साल-दो साल में उसका पति महीने डेढ़ महीने की छुट्टी आता और फिर अगली छु‌ट्टी आने की आस के सहारे लाजवंती को छोड़ चला जाता। इस आवाजाही में तीन बेटे भी जन्म गये थे।

एक बार वह छुट्टी आया तो परिवार वालों ने न जाने उसे क्या-क्या उल्टा सीधा सिखाया। लाजवंती के खिलाफ खूब भड़काया। उसने लाजवंती की बहुत बेरहमी से पिटाई की। यूं समझिए कि उसे अधमरा करके छोड़ा। यह सब भी लाजवंती बरदाश्त कर जाती लेकिन उसके लिए धरती तो तब फट पड़ी जब उसने अपने पति तथा देवर-जेठों की गुप्त योजना अपने कानों से सुन ली कि यहां घर में नहीं, इसे कल सवेरे खेत में ले जाकर खत्म करेंगे और लाश वहीं यमुना में बहा देंगे। किसी को न तो पता चलेगा और न ही कोई शिनाख्त़ का मुद्दा बचेगा।

लाजवंती गोद के बच्चे को लेकर रात में ही घर से निकल पड़ी। सांय-सांय करती काली रात के घटाटोप अंधकार में खेतों, नहरों और कच्चे रास्तों से पैदल अपनी मंजिल को जख्मी पैरों से किसी तरह तौलती-डौलती हुई गिरती-पड़‌ती पौ फटने तक वह अपने पैतृक गांव जा पहुंची।

गांव के बाहरी छोर पर आबाद अपने पिता के घर में जब दाख़िल हुई तो वहां उसकी बुड़िया माँ डंगर-ढोरों की रखवाली के लिए सोई हुई थी। परिवार के मर्द सदस्य रात में नहर का ओसरा बला़ने खेतों में गये हुए थे।

लाजवंती ने मां को जगाया और अपनी दुखभरी कहानी उसके समक्ष उड़ेल दी। बेटी को गोद में भरकर माँ भी बहुत देर तक रोई थी। माँ-बेटी का विवशतापूर्ण विलाप काफी देर तक चलता रहा। फटी रजाई में दोनों सिसकियाँ भरती रहीं लेकिन पड़ौस या गली में किसी को भनक तक नहीं लगने दी।

लेकिन यह मिलन चिरस्थायी नहीं बन सका। लाजवंती ने माँ को बताया कि वह वापिस नहीं जायेगी। यहीं रहकर दुख-सुख में अपने छोटे बच्चे को पाल़ लेगी। मां भी उसे मौत के मुँह में धकेलना नहीं चाहती थी लेकिन उसे इस बात का भय लगातार सता रहा था कि जब सुबह लाजवंती के बाप और भाईयों को पता चलेगा कि वह रात में बिना बताये पति का घर छोड़ आयी है तो उनके क्रोध की कोई सीमा न रहेगी। आख़िर लाजवंती ने परम्परागत मान्यताओं को तोड़ा है।

लड़की के लिए विधान है कि वह पति के घर जाते ही कामना करे कि हे भगवान जब मेरी अर्थी भी उठे तो उसी देहरी से उठे जहाँ उसकी डोली उतरी थी…मां ने कुछ सोच विचार किया और सामाजिक मान्यताओं के सामने हथियार डाल दिये। उसने घबराकर अपना विवशतापूर्ण निर्णय सुना दिया कि बेटी तेरे हाथों तो अनर्थ हो गया है।

तुझे ससुराल से निकलना नहीं चाहिए था। उसी घर में मर खप जाती। तेरे बाप को पता चल गया तो कहर टूट पड़ेगा। जा बेटी सूरज निकलने से पहले-पहले यहां से दूर निकल जा। नहीं तो मेरी जान पर भी आफ़त आ जायेगी।

लाजवंती ने फटती-पौ के नीम उजाले में माँ की आँखों की बेबसी को पढ़ लिया। बच्चे को छाती से चिपकाकर उल्टे कदम बाहर निकल गयी। मन में उठ रहे ज्वार-भाटे की लहरों में डूबती-तैरती वह वापिस वीरान जंगल की तरफ गई। दिन का उजाला लहुआ तो वह दूसरे गांव की सीमा में यमुना नदी के निकारे खड़ी थी। उसने जलधारा से कुछ दूर अपनी जूतियाँ उतार दीं। जीवन का आख़िरी फैसला लेने का क्षण आ पहुंचा था।

बेटे का चेहरा अपूर्व गौर से निहारा और आख़िरी बार उसका माथा चूमकर गहरी सिसकी भरी। वह बच्चे को पहले फेंककर उफनती नदी में छलांग लगाना चाहती थी। लेकिन बच्चे ने रुदन मचा दिया- नहीं मां, मुझे पानी में मत फैंक डूब जाऊंगा। तुम्हीं तो कहती थी नदी में डूब जाया करते हैं।

कुछ क्षण ममता में विचलित रहकर उसने फिर प्रयास किया। बच्चे ने फिर करुण-क्रंदन किया तो नजदीक के खेत में चारा काट रहे वृद्ध ने आहट भांप ली। वह दूर से ही चिल्लाया- ठहर जा बेटी, कौन है? ऐसा अनर्थ क्यों कर रही है? क्या तुझे अपनी औलाद का भी मोह नहीं रहा।

अब तक वृद्ध पास आ गया था। वह ठिठक गयी थी। बोला- जिन्दगी खोने की चीज नहीं होती बेटी, ऐसा विचार कभी मन में मत लाना। मैं जानता हूँ, तू किसी विकट दुख में घर से निकली होगी। नहीं तो इस बखत ऐसी सर्दी में दुधमुंहें बच्चे को क्यों लेकर आती। पर मेरी बात पल्ले बांध ले बेटी, कभी हिम्मत न हारना। जान गंवाने का विचार कभी मन में मत लाना।

तू जवान है, तेरे हाथ-पांव सलामत हैं। किसी इंट-भट्टे पर जाकर मजूरी कर लेगी, तब भी जिन्दगी गुजर जायेगी। तेरा बेटा जवान होकर तेरा सहारा बन जायेगा। तेरी जिन्दगी में फिर खुशियाँ लौट आयेगी। ये ले भाड़े वास्ते बारह रुपये मेरी जेब में पड़े हैं। कहीं भी चली जा और कमाकर खा। लाजवंती के मन में यह बात बैठ गयी। ईंट-भट्टा उसके डूबते जीवन की संजीवनी बन कर मन में सदृश्य उभर आया था।

उधर लाजवंती की मां से रहा नहीं गया। न चाहते हुए भी सवेरे उसके पिता को रात्रि की घटना विस्तार से कह डाली। गांव के लोग घास पर बिछी ओस की बूंदों से झड़ गये पानी से गन्तव्य की टोह लेते हुए नदी किनारे उस स्थान तक पहुंच गये। लेकिन वहां लाजवंती नहीं सिर्फ़ उसकी जूतियां पड़ी मिली। तेज बहती जलधारा में कई कोस दूर तक उसे तलाशा गया। पर सब प्रयत्न बेकार रहे। आखिर होनी बलवान है. इसी विचार से आश्वस्त होकर सबने मान लिया कि लाजवंती बच्चे समेत जलप्रवाह हो गयी है।

चालिसियों कोस दूर लाजवंती एक भट्‌ठे पर मोटर से उतर गयी। वहीं मेहनत मजदूरी करने लगी। दिन-रात बीतने लगे। भट्टा बंद करने का सीज़न आया तो सब मजदूर जाने लगे। लेकिन वह वहीं जम गयी। भट्‌टा मालिक ने पूछा तो कह दिया कि उसका इस दुनिया में कोई नहीं। वह कहाँ जाये? मालिक ने उसे वहीं झोपड़ी में रहने की इजाजत दे दी। बरस-पर-बरस बीतते गये। मजूरी के बचाये रुपयों से मालिक ने उसे एक भैंस खरीदवा दी। दूध बेचकर आमदनी बढ़ने लगी तो उसने दूसरी भैंस भी खरीद ली। बेटा सयाना होने लगा।

माँ-बेटा दोनों मजूरी और दूध बेचने का धंधा करते रहे। भैंसों की तादाद बढ़कर चार हो गई और उसके पास दसियों हजार रुपया जमा हो गया। बेटा जवान हो गया। लेकिन वह हमेशा घूंघट में ही रही। मालिक अथवा मज़दूर किसी को भी कभी उसने अपना चेहरा नहीं दिखने दिया।

मजदूरों की बिरादरियों से बेटे की सगाई के प्रस्ताव आने शुरू हो गये। अब जाति-गोत्र की पहचान की जरूरत पड़ी। लाजवंती ने विजातीय विवाह प्रस्ताव यह कह कर अस्वीकार कर दिये कि अमुक जातियों में उसके बेटे का विवाह नहीं हो सकता। लेकिन उसकी जाति उसने कभी नहीं बताई। एक दिन बेटे ने जिद ठान ली- माँ तुम मुझे बताती क्यों नहीं।

आखिर हम हैं कौन, किस जाति के हैं? वह चुप रही तो बेटे ने खुदकुशी की धमकी दे डाली। दिल में विद्यमान पुराने ज़ख्मों की पीड़ा को लाजवंती अब और अधिक समय तक छुपाये नहीं रख सकी। अन्ततः उसने रहस्योद्घाटन कर ही दिया कि उसका बेटा अनाथ नहीं है। उसके बाप भी है, ताऊ-चाचा, दादा-दादी और मामा-मामी, नाना-नानी सभी हैं। अमुक गांव में इसके पिता का पूरा परिवार है, जमीन और घरबार है।

भट्टा मालिक लाजवंती की व्यथा कथा सुनकर सकते में आ गया। उसने तुरन्त अपना आदमो भेजकर लाजवंती की ससुराल में खबर करवायी और उसकी कुशलता व वर्तमान स्थिति का सारा विवरण कहला भेजा। उसकी ससुराल वाले लाजवंती के जीवित होने और उसकी खुशहाल हालत का समाचार पाकर हतप्रभ रह गये।

इस अप्रत्याशित समाचार पर एक तरफ उन्हें आश्चर्य हुआ तो दूसरी तरफ खुशी भी हुई। वे बड़ी उत्सुकता से तुरत-फुरत भट्ठे पर पहुँचे और लाजवंती की भैंसे, माल-असबाब और नकदी समेत सारा सामान ट्रक में भरकर उसे तथा उसके बेटे को अपने गांव ले आये। लाजवंती के पैतृक गांव समेत आसपास के गांवों और पूरे देहात में दूर-दराज तक यह खबर लोककथा की तरह फैल गई कि जो लाजवंती 28 बरस पहले यमुना में डूब गई थी वह मरी नहीं बल्कि जिंदा है और सही सलामत वापिस लौट आई है। महीनों तक चर्चा चलती रही और लोग-महिलाएँ, पुरुष व बच्चे सभी आश्चर्यमिश्रित खुशी प्रकट करते रहे।

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लेकिन लाजवंती का दुर्भाग्य तो फिर लौट आना था क्योंकि वह सामंती जड़ों वाले भारतीय ग्रामीण समाज की महिला थी। उसी समाज की जिसमें स्वार्थ, काईयांपन और छल कपट तो प्रेमचंद के उपन्यासों की रचना के वक्त भी मौजूद था। लेकिन आज अपराधीकरण और उपभोक्तावाद भी वहां अपनी जड़ें फैला चुका है। सो लाजवंती का दुर्भाग्य बुढ़ापे में लौटना शुरू हुआ।

गांव आकर उसे सबसे पहले तो यही ख़बर मिली कि सारे ज़ुल्म सहने के बावजूद जिस पति से तीन दशक बाद मिलने की आरजू उसके मन में थी और जिसे अपनी कर्मठता तथा अदम्य साहस व शौर्य से चकित करके वह प्रायश्चित के सिर्फ दो शब्द सुनकर स्वतः ही माफ कर देना चाहती थी, वह कई बरस पहले मर चुका है।

लाजवंती को इस खबर से काफी दुख पहुंचा। फिर भी वह बिछड़े हुए दो बेटों, उनकी बहुओं-बच्चों और भरे-पूरे परिवार के बीच लौट आने पर संतोष अनुभव करना चाहती थी। परन्तु शीघ्र ही उसके छोटे बेटे के साथ बड़े भाईयों व चाचाओं-ताऊ ने मारपीट करना शुरू कर दिया। उनका पशुधन भी बेच बाच दिया। उनको यह कष्ट सालने लगा कि जिसे वे अब तक मर-खप गया समझ बैठे थे, अब वही उनकी जमीन-जायदाद में तीसरे हिस्से का कानूनी हकदार बन गया है।

जर-जमीन की हवस के चलते लड़के को उसके माँ जाये भाईयों ने मार-पीट कर घर से भगा दिया। लाजवंती के साथ भी बड़े बेटे और बहुएं भी दुर्व्यवहार करने लगीं। लाजवंती को यह बर्ताव असहनीय हो गया था। जिस बेटे को साथ लेकर उसने 28 साल का बनवास काटा था, उसके साथ अत्याचार वह सहन नहीं कर सकी। उसने प्रतिरोध किया तो उसे भी घर से अपमानित करके निकाल दिया गया।

उम्र के इस मुकाम पर एक बार फिर लाजवंती अपने पिता के घर आई हुई है। लेकिन अब बाप भी जीवित नहीं था। जब था, तभी कौन-सा लाजवंती को कोई सहारा मिल सका था? अब तो उसके पैतृक घर में भतीजों-भतीज बहुओं का शासन है और उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि वे उसके जीवन का भार नहीं उठा सकते, लाजवंती लौट जाए। लेकिन कहाँ ? वह कौन सी जगह है, जहां वह रह सकती है? इस सवाल का जवाब उसे नहीं सूझ रहा है। लेकिन हताश होना वह अब काफी पीछे छोड़ आई है। इतना तो निश्चित है कि वह अब नदी में डूब मरने की बात नहीं सोचेगी।

(मई,1991 में मासिक पत्रिका ‘हरियाणा अध्यापक समाज’ में पहली बार प्रकाशित और लेखक के प्रथम कहानी संग्रह ‘आज का सच’ में संकलित)

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नोट: लाजवंती के जन्म का आंकड़ा लेखक ने अपडेट कर दिया है। क्योंकि कहानी को लिखे 35से ज्यादा साल बीत गए हैं। शेष विवरण में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।

3 thoughts on “लाजवन्ती कहां जाए !

  1. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    कहानीकार के व्हाट्सएप पर वरिष्ट लेखक एवं आलोचक डॉक्टर एनके नागपाल यह टिप्पणी प्राप्त हुई है:
    “The writer has very beautifully portrayed the life of women in the male dominated society esp.in the illiterate people.Even today many are forced to lead such type of life.
    “Male members must be educated how to behave with women.Even the worthless males who don’t contribute anything towards their family or the society also want to control their wives and are full of false male ego”
    -Dr NK Nagpal, professor & principal retired from IGN college, Ladwa, kurukshetra (Haryana) India.

  2. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    कहानीकार के व्हाट्सएप पर ‘प्रतिबिंब मीडिया’ के नियमित और संजीदा पाठक सुरेन्द्र पाल तोमर की निम्नलिखित टिप्पणी प्राप्त हुई है:
    “लाजवंती कहाँ जाये? यह स्थिति सदियों समय से चली आरही है तब भी यह आज का सच थी व अभी भी आज का सच है. अब तो घर-सम्पत्ति मे लड़कियो का बराबर का कानूनी हक है.परन्तु जिन लड़कियो ने मायके आकर अपना हक माँगा और उन्हें मिल भी गया, उनका हस्र आज भी लाजवंती से मिलता जुलता हो जाता है. आखिर लाजवंती कहां जाये?? ऐसा लगता है कि भविष्य मे भी यही, आजका सच रहेगा. यह पुरुष-प्रधान व्यवस्था है, क्या पुरुष इस को बदलने देगा? क्या स्त्री को जीवन का हक स्वतंत्र रूप से मिल सकेगा?वरना तो लाजवंती की कहानी (आज का सच ) ही रह जाएगी. दर्द भरी है कहानी. धन्यवाद.”
    -सुरेंद्र पाल तोमर,
    भारतीय सेना का पूर्व सैनिक,
    बरेली (उत्तर प्रदेश) भारत।

  3. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    सुरेंद्र पाल तोमर, फौजी भाई साहब की आज भी एक टिप्पणी प्राप्त हुई है। कल प्राप्त हुई उनकी टिप्पणी ऊपर कमेंट बॉक्स में छपी है। आज की टिप्पणी यह है:
    “लाजवंती कहाँ जाये? कहानी को आपने समाज के सामने खड़ा कर दिया है? जो अमानवीयता उसके साथ हुई है, बीती है- वर्तमान युग मे विस्तार पा चुकी है. यह मूल्यों के क्षरण का युग है. जिससे स्वार्थ नहीं सधता है- ऐसे लोगों का जीवन आज खतरे मे है, विशेषकर जीवन के अंतिम काल मे. यह पूरे ही समाज की बात है. ‘रेमण्ड मिल’ के मालिक की कहानी आपको याद होगी ही. घर के बाहर गली मे बैठा रो रहा था कि लड़कों-बहुओं ने घर से निकाल दिया है, कहाँ जाये??? (आखिर होटल मे गया क्योंकि इतना तो समर्थ था ही) असमर्थ के साथ आज के युग मे कुछ भी हो सकता है?? प्रश्न अनुतरित है??”
    -सुरेन्दर पाल तोमर,
    भारतीय सेना का पूर्व सैनिक, बरेली (उत्तर प्रदेश) भारत।

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