असफलता से सफलता तक: बच्चों को ‘बाउंस-बैक’ करना सिखाएं
हर ठोकर को सीख, हर हार को अवसर और हर असफलता को नई शुरुआत में बदलने की पेरेंटिंग कला
डॉ. रीटा अरोड़ा
बचपन में जब हम साइकिल चलाना सीख रहे थे, तब किसी ने हमें गिरने से नहीं बचाया। घुटने छिलते थे, आँखों में आँसू आते थे, लेकिन पाँच मिनट बाद फिर उसी साइकिल को उठाकर दौड़ पड़ते थे। शायद इसलिए उस पीढ़ी ने केवल साइकिल ही नहीं, जीवन भी चलाना सीख लिया।
आज तस्वीर बदल गई है।
बच्चा दौड़ते-दौड़ते गिर जाए, तो पहले ज़मीन को दोष दिया जाता है।
परीक्षा में कम अंक आ जाएँ, तो शिक्षक कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
खेल हार जाए, तो रेफरी गलत हो जाता है।
और अगर किसी प्रतियोगिता में चयन न हो, तो पूरी व्यवस्था दोषी घोषित कर दी जाती है।
धीरे-धीरे हमने बच्चों से एक बहुत बड़ी क्षमता छीन ली है-फिर से उठ खड़े होने की क्षमता।
यही क्षमता मनोविज्ञान की भाषा में Resilience या Bounce-Back Capability कहलाती है। यानी जीवन जब आपको गिराए, तब टूटना नहीं, बल्कि कुछ नया सीखकर फिर खड़े हो जाना।
सोचिए…
पेड़ पर लगे आम को अगर हर समय किसी सहारे से बाँध दिया जाए, तो क्या वह कभी तेज़ हवा का सामना करना सीख पाएगा?
शायद नहीं।
बच्चे भी ऐसे ही होते हैं।
अगर माता-पिता हर छोटी असफलता से पहले ही उन्हें बचा लेंगे, तो जीवन की पहली बड़ी ठोकर उन्हें अंदर तक तोड़ देगी। आज की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि बच्चे असफल हो रहे हैं। चिंता इस बात की है कि वे असफलता सहना भूल रहे हैं।
नौकरी न मिली तो अवसाद।
दोस्त ने बात नहीं की तो अकेलापन।
सोशल मीडिया पर कम लाइक्स आए तो आत्मविश्वास खत्म।
एक छोटी-सी हार पूरी पहचान पर प्रश्नचिह्न बन जाती है।
ऐसा इसलिए क्योंकि हमने बच्चों को जीत का महत्व तो सिखाया, लेकिन हार का अर्थ नहीं समझाया। बच्चों को यह समझाना होगा कि असफलता कोई अंतिम स्टेशन नहीं, बल्कि अगली ट्रेन पकड़ने का प्लेटफॉर्म है। दुनिया के अधिकांश सफल लोगों की जीवनी पढ़िए।
थॉमस एडिसन हजारों प्रयोगों में असफल हुए।
अब्राहम लिंकन कई चुनाव हारे।
जे. के. रोलिंग की पांडुलिपि कई प्रकाशकों ने ठुकराई।
अगर वे पहली असफलता के बाद बैठ जाते तो दुनिया शायद उन्हें कभी जान ही नहीं पाती। फिर हम अपने बच्चों से यह अपेक्षा क्यों रखते हैं कि वे पहली बार में ही हर परीक्षा जीत लें?
असल समस्या बच्चों में नहीं, हमारी सोच में है।
हम अंक देखकर खुश हो जाते हैं, लेकिन प्रयास नहीं देखते।
हम परिणाम पर तालियाँ बजाते हैं, लेकिन मेहनत की सराहना करना भूल जाते हैं।
जब कोई बच्चा केवल इसलिए पढ़ता है कि उसे सौ में सौ अंक लाने हैं, तब वह सफलता का गुलाम बनता है।
लेकिन जब वही बच्चा सीखने के आनंद के लिए पढ़ता है, तब वह जीवन भर आगे बढ़ता है।
इसीलिए विशेषज्ञ कहते हैं कि बच्चे की बुद्धिमत्ता की नहीं, उसके प्रयास की प्रशंसा कीजिए। “तुम बहुत होशियार हो” कहने के बजाय यह कहिए—”मुझे तुम्हारी मेहनत अच्छी लगी।” यह छोटा-सा परिवर्तन बच्चे में Growth Mindset विकसित करता है।
एक और गलती हम अक्सर कर बैठते हैं। बच्चे की हर समस्या का समाधान हम खुद बन जाते हैं।
स्कूल में झगड़ा हुआ?….माता-पिता पहुँच गए।
होमवर्क भूल गया?….माता-पिता स्कूल पहुँचा आए।
दोस्त ने खिलौना नहीं दिया?…माता-पिता ने नया खिलौना खरीद दिया।
धीरे-धीरे बच्चा यह मान लेता है कि हर संकट में कोई न कोई उसे बचाने आ जाएगा।
लेकिन वास्तविक जीवन में ऐसा नहीं होता।
वहाँ इंटरव्यू में माँ साथ नहीं बैठती।
ऑफिस में बॉस की डाँट से पिता नहीं बचाते।
व्यापार में नुकसान होने पर कोई रिश्तेदार नुकसान वापस नहीं करता।
इसलिए बच्चों को छोटी-छोटी असफलताओं से गुजरने दीजिए। खेल हारने दीजिए। कभी कम अंक भी आने दीजिए। दुख महसूस करने दीजिए। फिर उनके साथ बैठकर पूछिए-“अगली बार क्या अलग कर सकते हैं?” यही प्रश्न बच्चे को हार से सीखना सिखाता है।
लेकिन केवल लचीलापन काफी नहीं है।
जीवन में आगे वही बढ़ता है जो लोगों के साथ जुड़ना भी जानता है। आज का युग केवल IQ का नहीं, बल्कि Social Intelligence का है। दूसरों की भावनाओं को समझना, संवाद करना, सहयोग करना और संबंध निभाना-यही वे गुण हैं जो किसी व्यक्ति को समाज में स्वीकार्यता दिलाते हैं।
आख़िर सोचिए…
कितने लोग केवल इसलिए सफल हुए क्योंकि वे सबसे अधिक बुद्धिमान थे?
और कितने इसलिए सफल हुए क्योंकि लोग उनके साथ काम करना पसंद करते थे?
अंतर यहीं छिपा है।
घर में बच्चे को केवल पढ़ने के लिए मत कहिए।
उसे दादी को पानी देना भी सिखाइए।
मेहमान आएँ तो मुस्कुराकर नमस्ते करना भी सिखाइए।
हारने वाले दोस्त का मज़ाक उड़ाने के बजाय उसका हाथ पकड़ना भी सिखाइए।
यही छोटी-छोटी बातें भविष्य में उसके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकत बनेंगी।
आखिरकार जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा बोर्ड की परीक्षा नहीं होती। सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है जब जीवन आपको गिरा देता है और कोई तालियाँ बजाने वाला नहीं होता। उस समय जो बच्चा अपने आँसू पोंछकर फिर से चल पड़ता है, वही असली विजेता बनता है।
इसलिए यदि हम सचमुच अपने बच्चों को सफल बनाना चाहते हैं, तो उन्हें केवल जीतना मत सिखाइए।
उन्हें हारकर मुस्कुराना भी सिखाइए।
क्योंकि जीवन में सबसे ऊँची छलांग वही लगाता है, जिसने पहले गिरकर उठना सीखा हो।
