समय समाज
गल्ले से ग्लोबल तक: व्यापार को बड़ा करने का असली मंत्र
डॉ. रीटा अरोड़ा
भारत में व्यापार करने के तरीके और मानसिकता में समय के साथ कई बदलाव आए हैं, लेकिन आज भी कई व्यवसाय अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाते हैं। अक्सर यह देखा जाता है कि एक किराने की दुकान या साड़ी की दुकान जिस स्थिति में दादाजी के समय थी, उसी स्थिति में पिताजी के समय रही और आज पोता भी उसी दुकान के गल्ले पर बैठ रहा है। केवल फर्नीचर या दुकान के बोर्ड का रंग बदलता है, लेकिन व्यापार का दायरा नहीं बढ़ता। इसके विपरीत, अमेज़न (Amazon), फ्लिपकार्ट (Flipkart), गूगल (Google) और फेसबुक (Facebook) जैसी कंपनियाँ पूरी दुनिया में फैल चुकी हैं। सवाल यह है कि फर्क कहाँ है? जो कुछ व्यवसायों को एक ही जगह सीमित रखता है और कुछ को ग्लोबल बना देता है? क्या पूंजी में? क्या किस्मत में? या फिर बाजार में? सच यह है कि सबसे बड़ा फर्क व्यापारी के माइंडसेट में है। जो व्यापारी गल्ले से चिपका रह जाता है, वह गली तक सीमित रह जाता है। जो सिस्टम बनाता है, वह ग्लोबल सोच सकता है।
हमारे पारंपरिक व्यापार की सबसे बड़ी समस्या है-हर चीज़ खुद करने की आदत। पैसे का हिसाब खुद देखेंगे, ग्राहक से खुद बात करेंगे, माल खुद खरीदेंगे, कर्मचारी पर भरोसा नहीं करेंगे और गल्ले को छोड़ना तो जैसे जीवन-मरण का प्रश्न हो गया। बहुत-से व्यापारी मानते हैं कि यदि वे दुकान पर नहीं बैठेंगे तो धंधा बिगड़ जाएगा। यही सोच व्यापार को छोटा बनाए रखती है।
व्यापार का बड़ा नियम है-व्यक्ति पर नहीं, सिस्टम पर भरोसा कीजिए। बेटा भी गलती कर सकता है, कर्मचारी भी चूक सकता है, लेकिन सही डेटा और मजबूत सिस्टम रोज़ सच्चाई बता देते हैं। आज जिस युग में देश का छोटा दुकानदार भी UPI से भुगतान ले रहा है, उस युग में व्यापार को केवल भरोसे और अंदाज़ से चलाना भविष्य के साथ अन्याय है।
व्यापार को बड़ा करने के लिए पहला कदम है- व्यापार का सिस्टम बनाना (Setting System)। कौन-सा माल कितना बिकता है, कौन-सा ग्राहक बार-बार आता है, किस कर्मचारी की बिक्री बेहतर है, कहाँ चोरी या लीकेज है, कौन-सा खर्च अनावश्यक है-इन सबका साफ डेटा होना चाहिए। जब तक व्यापारी को अपनी दुकान की नब्ज़ कागज या स्क्रीन पर साफ दिखाई नहीं देगी, तब तक वह विस्तार का सही निर्णय नहीं ले पाएगा।
दूसरा कदम है-डेलिगेशन। हर सफल व्यापारी को एक दिन यह समझना पड़ता है कि दुकान पर बैठना और व्यापार बनाना दो अलग बातें हैं। गल्ले पर बैठना काम है, सिस्टम बनाना नेतृत्व है। यदि मालिक हर छोटी चीज़ में उलझा रहेगा तो वह नई शाखा, नया शहर, नई श्रेणी या नया अवसर कैसे देखेगा? मालिक का काम केवल बिक्री करना नहीं, व्यापार को बढ़ाने की दिशा तय करना है।
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम है-पारदर्शिता। भारत में अनेक व्यापार इसलिए नहीं बढ़ पाते क्योंकि वे “कच्चे” और “पक्के” के भ्रम में फंसे रहते हैं। टैक्स बचाने की छोटी सोच कई बार विस्तार की बड़ी संभावना को मार देती है। जो व्यापार नकद और छिपे हुए हिसाब पर चलता है, उसमें मालिक हमेशा डर में रहता है। उसे कर्मचारी पर भरोसा नहीं होता, बैंक से मदद नहीं मिलती, निवेशक नहीं आता और ब्रांड कभी मजबूत नहीं बनता। इसके विपरीत, पक्का काम व्यापार को साफ चेहरा देता है। बैंक, ग्राहक, सप्लायर और पार्टनर सभी उस पर भरोसा करते हैं।
“आप जितना ज्यादा कच्चे में धंधा करोगे उतना ज्यादा आप अपने धंधे को कच्चा करोगे।
जितना ज्यादा आप पक्के में धंधा करोगे उतनी ज्यादा पक्की इमारतें आप अपनी बनाओगे”।
आज के समय में व्यापार की असली ताकत केवल उत्पाद में नहीं, प्रक्रिया में है। वही मिठाई, वही चाय, वही कपड़ा, वही किराना-लेकिन यदि पैकेजिंग, अनुभव, हिसाब, ट्रेनिंग और सप्लाई चेन मजबूत है तो वही छोटी दुकान ब्रांड बन सकती है। हल्दीराम जैसे उदाहरण हमें बताते हैं कि स्वाद पुराना हो सकता है, लेकिन सोच आधुनिक होनी चाहिए।
व्यापारियों की एक और बड़ी कमजोरी है-सीखने से दूरी। कई लोग 20-25 साल का अनुभव तो रखते हैं, लेकिन नई तकनीक, डिजिटल मार्केटिंग, ग्राहक व्यवहार, वित्तीय अनुशासन और टीम मैनेजमेंट सीखने में संकोच करते हैं।
अनुभव जरूरी है, लेकिन यदि अनुभव अपडेट नहीं होता तो वह धीरे-धीरे अहंकार बन जाता है। समय बदल रहा है। आज ग्राहक केवल माल नहीं खरीदता, वह भरोसा, सुविधा, अनुभव और सेवा भी खरीदता है।
नए व्यवसाय में उतरते समय भी लालच से अधिक समझ की जरूरत है। किसी और को सफल देखकर उसी धंधे में कूद जाना व्यापार नहीं, जुआ है। हर उद्योग का अपना गणित, ग्राहक, पूंजी-चक्र और धैर्य होता है। यदि कोई कपड़े का व्यापारी अचानक सोलर, रेस्टोरेंट या रियल एस्टेट में उतरता है तो उसे पहले उस क्षेत्र की समझ, विशेषज्ञ व्यक्ति और लंबी तैयारी चाहिए।
व्यापार का भविष्य उन लोगों का है जो तीन बातों को समझेंगे-डेटा से निर्णय, सिस्टम से संचालन और ईमानदारी से विस्तार। भारत में अवसरों की कमी नहीं है। डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, लॉजिस्टिक्स, सोशल मीडिया और सरकारी योजनाओं ने छोटे व्यापारियों को भी बड़े सपने देखने का मौका दिया है। लेकिन मौका उसी को मिलेगा जो पुराने डर से बाहर आएगा।
व्यापार को गल्ले से ग्लोबल बनाने के लिए करोड़ों रुपये से पहले करोड़ों वाली सोच चाहिए।
गल्ला संभालना अच्छी बात है, लेकिन जीवन भर उसी से चिपके रहना विकास को रोक देता है। जिस दिन व्यापारी अपने धंधे को व्यक्ति-निर्भरता से सिस्टम-निर्भरता की ओर ले जाएगा, उसी दिन उसका व्यापार दुकान नहीं, संस्था बनना शुरू होगा।
अंत में व्यापार का मंत्र बहुत सरल है-अहंकार छोड़िए, सीखना शुरू कीजिए, हिसाब साफ रखिए, जिम्मेदारी बाँटिए और सिस्टम बनाइए।
