जसवीर त्यागी की पांच कविताएं
विदा
जब कोई अपना
विदा होता है संसार से
हमारा भी कुछ अंश
उसके साथ विदा हो जाता है।
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दस्तूर
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कैसा अजीब दस्तूर है दुनिया का
हमारा कोई आत्मीय
जब होता है संसार में
हम फँसे रहते हैं
दुनियादारी के माया-जाल में
सोचते हैं
कभी मिल लेंगे समय आने पर
फिर एक दिन
अंतिम सूचना बुलाती है
हम खामोशी से
खबर के पीछे-पीछे हो लेते हैं
हर हाल में
उस अजीज से मिलने के लिए जाते हैं
यह जानते हए भी
कि अब वह
वहाँ नहीं होगा।
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बोलना और सुनना
उन्होंने कहा-
कितना भी बोलो
कोई नहीं सुनता आजकल
सब मनमानी करते हैं
हर कोई फायदे की फिसलन की ओर
फिसल रहा है
जानता हूँ
कि कोई नहीं सुनता
फिर भी बोलूँगा
चाहे कोई सुने,चाहे न सुने
कोई पेड़ तो सुनेगा
कोई चिड़िया तो सुनेगी
कोई तितली
कोई ततैया
नदी-पहाड़
और धरती-आसमान तो सुनेंगे
फिर भी
अगर किसी ने नहीं सुना
आखिर में
समय तो सुनेगा ही।
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यूँ ही
सने फोन किया
व्यस्तता के कारण
मैं बात न कर सका
मैंने फोन करने का संदर्भ पूछा
वह बोली-
कोई ख़ास काम नहीं था
बस!यूँ ही किया
मैं देर तक
ध्यान की धूप में खड़ा
उसकी स्मृति की सरिता में नहाता रहा
कभी-कभी
कितना अच्छा लगता है
जब कोई कहता है-
बस!यूँ ही फोन किया।
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रिश्ते
रिश्तों को
समय-समय पर
परिचय के पानी से सींचते रहिये
ध्यान की धूप लगाते रहिये
यदा-कदा
खुशियों की खाद भी जरूरी है
उपेक्षाओं और अनदेखेपन की
आंधियों से बचाते रहिये
रिश्ते पौधों की मानिंद होते हैं
ध्यान न देने पर
मुरझाकर सूख जाते हैं।
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