यह आलेख मशहूर शायर बशीर बद्र की शायरी और उनकी राजनीति को समझते समझाते हुए धीरेश सैनी ने लिखा है। धीरेश सैनी वरिष्ठ पत्रकार और सजग-सुहृद साहित्यसेवी हैं। हिन्दी साहित्य संसार में तथाकथित जनवादी और दक्षिणपंथी शक्तियों के भीतरी दुरभिसंधियों को समझने का जैसा उपक्रम धीरेश सैनी ने किया है वह विरल है। इस एक गतिविधि ने उन्हें हिन्दी साहित्य संसार में सबसे कम प्यार किया जाने वाला शख्स बना दिया है जबकि होना उल्टा चाहिए था। उन्होंने यह तीक्ष्णता अर्जित की है। उन्होंने यह आलेख बशीर बद्र के निधन पर लिखा था जो समयांतर में प्रकाशित हुआ। यहाँ उस आलेख की पुनर्प्रस्तुति:
बशीर बद्र : शोहरत पर सियासत का दाग़
धीरेश सैनी
बेशुमार शोहरत और रुतबे भरा लम्बा जीवन जी चुके शायर बशीर बद्र (15 फरवरी 1935-28 मई 2026) का 28 मई को भोपाल में निधन हो गया। देश-विदेश के मुशायरों की चहल-पहल में रहने वाले इस शायर के बाद के साल डिमेंशिया जैसी जटिल बीमारी के कारण घर में क़ैद थे। शोहरत की बुलंदी, फ़िरकेवाराना फ़साद में घर और अशआर जला दिए जाने के बाद मेरठ से भोपाल विस्थापन और फिर भारतीय जनता पार्टी की सरकार के पहलू में संरक्षण; इस शायर की ज़िन्दगी के अहम पहलू थे। ग़ज़ल को नया मक़ाम बख़्शने, जाती ज़ख़्मों के बावजूद लब पर तल्ख़ी व नफ़रत न आने देने और ख़ास-ओ-आम के बीच मुहब्बत का पैग़ाम देने के लिए उनकी ख़ूब पज़ीराई हो रही है। सवाल यह है कि उनकी `यादों के उजाले` में क्या अँधरे पहलुओं को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।
हिन्दी के मशहूर कवि-विचारक असद ज़ैदी इस माँग से नाइत्तिफ़ाक़ी रखते हैं कि शायरी में तल्ख़ी न होना ज़रूरी गुण है। वे कहते हैं, यह टिपिकल मध्यवर्गीय अप्रोच है क्योंकि तल्ख़ी से रेज़िस्टेंस पैदा होता है। प्रतिबद्ध शायर, वैज्ञानिक और संस्कृतिकर्मी गौहर रज़ा इस बात की क़द्र करते हैं कि फ़सादात में बशीर बद्र का घर जला लेकिन उनके लिखने में इस बात की तल्ख़ी कभी नहीं आई। उन्होंने इस सिलिसिले में लिखा भी तो बहुत बेलेन्सेड लिखा – “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में\तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।” जिस तरह के हालात से वे गुज़रे, तल्ख़ हो सकते थे, उनके अशआर में नफ़रत आ सकती थी या जैसा उनमें राजनीतिक बदलाव आया, उसका असर उनकी शायरी में आ सकता था। लेकिन, उन्होंने शायरी में कोई समझौता नहीं किया। बहुत से दूसरे शायरों की तरह उन्होंने अच्छा गुलूकार होते हुए भी गाकर असर पैदा करने के लिए ख़्याल से समझौता नहीं किया। उन्होंने आम ज़रूरतें पूरी करने वाले शेर कहे लेकिन ख़ास बात यह कि उनमें कभी घटियापन नहीं आने दिया। किसी पॉलिटिकल ज़रूरत के लिहाज़ से शेर कहा तो भी ज़बान साफ़ रखी। मसलन, इमरेजेंसी के दौर में कहा गया यह शेर देखिए –
चराग़ों को आँखों में महफ़ूज़ रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी
या इस शेर को ही देखिए-
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।
असद ज़ैदी कहते हैं कि उर्दू में आज़ादी के बाद यह फिनोमिना की तरह है कि जनता की अभिरुचि का ख़्याल रखने वाले लोकप्रिय-मक़बूल शायर हों, चाहे वे स्तरीय भी हों, सीधे टक्कर लेने के बजाए शासक वर्ग से संरक्षण खोजते रहते हैं। राहत इंदौरी के अलावा अमूमन समझौता-परस्त नाम ही सामने आते हैं। अगर कोई शायर नफ़रत के सौदागरों के सपोर्ट में खड़ा हो जाता है तो यह तर्क नाकाफ़ी है कि वह नफ़रत के ख़िलाफ़ था। बशीर बद्र क्या, नफ़रत के ख़िलाफ़ तो जावेद अख़्तर भी हैं, मुनव्वर राणा भी थे। लेकिन होता क्या है, कभी मातूश्री, कभी भाजपा के किसी ताक़तवर केंद्र के पीछे दौड़ लगती रहती है। यह सिलसिला अली सरदार जाफ़री तक जाता है जो शांति-दूत बनकर पाकिस्तान यात्रा पर अटल बिहारी वाजपेयी के साथ हो लिए थे। कोई नज़्म भी लिख दी थी। निदा फ़ाज़ली भी जो इनमें सबसे स्तरीय थे, ऐसा कुछ न कुछ कहते-करते पाए जाते थे। डोसाइल इंटेलिजेंसया (आज्ञाकारी बौद्धिकता) के फ़ायदे हैं तो हॉस्टेलिटी (मुखर विरोध) से बचने के रास्ते तलाश लिए जाते हैं। शासक वर्ग के प्रति चुम्बकीय आकर्षण की यह लत एकेडमिक क्लास में भी रही है। असद ज़ैदी मानते हैं कि बशीर बद्र इसी परम्परा के नमूने थे। वे खुलकर भाजपा और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ खड़े थे। उर्दू अकादमी के चेयरमैन जैसी भूमिका में वे बिचौलिये नहीं, उस सियासत के आक्रामक समर्थक की भूमिका में थे। बाबरी मस्जिद गिरा दिए जाने से लेकर तमाम कारनामे उनके होश में रहते हो चुके थे।
गौहर रज़ा कहते है कि वे बेशक, बशीर बद्र को साहिर, फ़ैज़ आदि की तरह प्रग्रेसिव शायर नहीं कहेंगे लेकिन उन्होंने इंसानियत की तरफ़दारी की शायरी की, उर्द़ू ज़बान को नीचे नहीं आने दिया और गड़बड़ राजनीतिक पक्ष के दौर में भी अशआर में विद्वेष या हल्कापन नहीं आने दिया। गो, उन्होंने माना कि शायर की ज़िन्दगी और शायरी में फ़र्क़ नहीं होना चाहिए।
मौजूदा दौर के गहरी सूझ-बूझ वाले अहम शायर अजमल सिद्दीक़ी स्वीकार करते हैं कि सामाजिक सरोकार के मैदान में बशीर बद्र हल्के नज़र आएंगे और बहुत से लोगों की तरह कई बार सेल्फिश भी दिखाई देंगे। लेकिन, उन्होंने नफ़रत के बरअक्स मुहब्बत व ज़िन्दगी की ख़ूबसूरती को ही रखा। पॉपुलरिटी के लिए नफ़रत के बीज नहीं बोए। ज़हर से ज़हर नहीं काटा। कह सकते हैं कि वे ज़हर के मुक़ाबले शहद बेचते रहे।
असद ज़ैदी कहते हैं कि शायरी में कम्पोजिट कल्चर, सहजीवन, सांस्कृतिक बहुलतावाद का गुणगान आदि करना और इस पर हमला करने वालों पर ख़ामोश रहना तो उर्दू वालों की यूएसपी बन चुकी है। हिन्दी वालों को अलग से यह करके दिखाने की ज़रूरत नहीं होती। मुनव्वर राणा, जावेद अख़्तर, गुलज़ार वग़ैरा भी यह सब करते ही रहते हैं लेकिन कोई साफ़ रेजिस्टेंस या नफ़रत के सौदागरों से साफ़ अलगाव किसी ने किया हो तो बताइए। मुशायरों के शायरों के लिए तो सेकुलरिज़म इस ख़राबी की तरह बरतना ज़रूरी होता है कि वे राइट विंग को अपीज करते दिखाई दें। राइट विंग का समर्थन धीरे-धीरे उनकी नेचर ही बन जाता है।
असद मानते हैं कि प्रतिरोध के दो तरीक़े होते हैं। एक तो यह कि व्यवस्था की आलोचना करते हुए उसके आतंक को इस तरह बयान किया जाए कि भय से कोई बोले ही नहीं। दूसरा यह कि व्यवस्था को लगातार एक्सपॉज किया जाए। बशीर बद्र क्या करते हैं? वे “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में” जैसा कोई शेर कहते भी हैं तो इस तरह कि अत्याचारी का चेहरा छुपा लेते हैं।
मुशायरों के मक़बूल-ओ-मारूफ़ शायर इक़बाल अशहर की राय में बशीर बद्र शायरी का एक मज़बूत युग थे और रहेंगे। ऐसे शायर जिनकी रचनात्मकता का ग्राफ घटता-बढ़ता नहीं है बल्कि एक मक़ाम पर बरक़रार रहता है। उनकी पहली किताब `इकाई` (1969) ग़ज़ल की परम्परा को समृद्ध करती है। दूसरी किताब `इमेज` (1973) पुराने फ्रेम को तोड़कर नया फ्रेम बनाती है। फिर वे नये-पुराने के झगड़े से बहुत आगे निकल जाते हैं। उनके `आमद` संग्रह को इक़बाल अशहर एक मार्गदर्शक की तरह देखते हैं। उनके मुताबिक, बशीर बद्र दिल से दिल के शायर थे, सादा ज़बान में ऊंचे ख़यालों के, अदबी मेयार के शायर।
गौहर रज़ा हों या अजमल सिद्दीक़ी या आशु मिश्र, बतौर शायर बशीर बद्र को एक अलग मक़ाम का शायर मानते हैं। बक़ौल गौहर, बशीर बद्र शो’अरा की उस नस्ल जिसने अदब की ख़िदमत में ज़िन्दगी गुज़ारी, के आख़िरी शायर थे। मंच का शायर होते हुए भी उन्होंने कभी उर्दू की रूह और अदब से कम्प्रोमाइज नहीं किया।
वे उस सिलसिले की आख़िरी कड़ी थे जहाँ मंच और अदब दोनों मौजूद थे। उनकी शायरी ने ग़लीज़ ज़बान का सहारा नहीं लिया। उनकी इश्क़िया शायरी में भी घटियापन नहीं है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में बशीर बद्र के स्टूडेंट रहे गौहर ने कहा कि वे टीचर के तौर पर भी बेहतरीन थे।
अजमल सिद्दीक़ी ने कहा कि बशीर बद्र का लहज़ा चुभने वाले अल्फ़ाज़ से इम्कान का था। वे लफ़्ज़ को इतना नरम करके इस्तेमाल करते थे कि उसकी कोई नोंक न निकली रह जाए और कानों को चुभ न जाए। उनके यहाँ अंग्रेजी अल्फ़ाज़ भी उर्दू के साथ रच-बस गए हैं। जैसे –
ये ज़ाफ़रानी पुलओवर उसी का हिस्सा है
कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे।
अजमल सिद्दीक़ी ने किसी शायर के हवाले से कहा कि शायरी का मतलब है, वह समझ में आए, से पहले अच्छी लग जाए। मतलब शायरी में अल्फ़ाज़ के साथ इस तरह व्यवहार किया जाता है कि उससे पहले अहसास पैदा होता है, अर्थ बाद में आता है। अहसास पैदा करने का यह काम बशीर बद्र के यहाँ इतनी हुनरमंदी के साथ हुआ है कि भले किसी शेर में गहरे मानी नहीं हैं लेकिन उसका असर गहरा होता है। उन्होंने बताया कि वे बशीर बद्र को उस उम्र से सुन रहे हैं, जिस उम्र में चीज़ें दिल को छूती हैं। उम्र के साथ ज़ेहन छंटनी करता है। जो शेर एक उम्र में अच्छा लगता है, बौद्धिक विकास होने पर बुरा लगने लगता है। लेकिन, बशीर बद्र कभी बुरे नहीं लगे। यह बात है कि मीर को पढ़ने के बाद मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा लेकिन बशीर बद्र की जगह न बशीर बद्र से पहले कोई था, न बशीर बद्र के बाद कोई होगा। उन्होंने अपना मक़ाम ख़ुद बनाया। एक अजब मंज़रकशी और कैफ़ियत उनकी शायरी में है। वे मोती जैसे अल्फ़ाज़ों से सीधी-सादी बात को दिलकश बना देते हैं।
हिन्दी में एक सजग गीतकार की पहचान के बाद उर्दू शायरी के मैदान में भी जल्द ही जगह बनाने में कामयाब रहे आशु मिश्र के मुताबिक, बशीर बद्र ज़दीद ग़ज़ल के बड़े शायर थे; स्टेज पर होते हुए भी अच्छा कहने वाले दुर्लभ शायर। नये विद्यार्थियों के लिए वे ज़बान सीखने के लिहाज़ से स्कूल की तरह थे। मुशायरे पढ़ने वालों को आलोचना अपने दायरे से बाहर रखती है तो बशीर साहब पर भी बड़े आलोचकों ने नहीं लिखा। लेकिन, सामईन और शो’अरा दोनों पर उनका गहरा प्रभाव है। नया कहने वाला उनसे ही सीखता है और उनके ही ज़रिये क्लासिक की तरफ़ बढ़ता है।
जाने-माने फ़िल्म निर्माता और आलोचक-सम्पादक अनवर जमाल का मानना है कि लिटरेरी मेयार के लिहाज़ से बशीर बद्र को बड़ा शायर नहीं कहा जा सकता। हाँ, वे जिस मुहावरे में बात कर रहे थे या जिस फिलोसफिकल नोट पर काम कर रहे थे, इलीट और आम अवाम दोनों को आकर्षित करते थे। उनकी शायरी में फ़ासिज़्म का समर्थन नहीं है, जातीय द्वेष नहीं है, नस्लीय घृणा नहीं है। `कोई हाथ भी न मिलाएगा…` जैसे शेर वे मानवीय आधार पर ही कहते हैं। जहाँ तक भाजपा के समर्थन में जाने या भाजपा सरकार से पद आदि हासिल करने की बात है तो उस असुरक्षा बोध को समझना होगा जो माइनोरिटी की चेतना में शामिल हो गया है। मेरठ के दंगों में उनका घर जला, वे भोपाल गए। सुरक्षा-बोध स्थापित करना राज्य की ज़िम्मेदारी है। राज्य या समाज जिस तरह का है, एक अल्पसंख्यक तबके के आर्टिस्ट की ऐसा पैथेटिक संरक्षण हासिल करने की कोशिश हैरत की बात नहीं है।
असद ज़ैदी भी शायर के तौर पर बशीर बद्र को साधारण ही मानते हैं। वे कहते हैं, `उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो` जैसा ठीक-ठाक शेर भी उन्होंने कहा लेकिन जिगर या ग़ालिब या फ़ैज़ तो इसे नहीं कहेंगे। बशीर बद्र के कम्प्रोमाइज के लिए असुरक्षा बोध के तर्क से भी वे सहमत नहीं होते। वे कहते हैं कि इस असुरक्षा बोध में ग़रीब मुसलमान भाजपा जॉइन नहीं करता, इलीट कर लेता है। उन्होंने कहा कि बुद्धिजीवी अगर ग़रीब अवाम के हक़ में खड़ा होने के बजाय उसे ही झोंक कर फ़ायदा हासिल करे तो यह असुरक्षा का नहीं, स्वार्थ साधने की बात है। एक आर्टिस्ट प्रतिरोध के समर्थन में भी तो खड़ा हो सकता है।
असद ज़ैदी की साफ़गोई को छोड़ दें तो हैरानी की बात यह है कि हिन्दी और उर्दू के कई नामचीन प्रगतिशील लेखकों के लेखों या प्रतिक्रियाओं में बशीर बद्र की ग़ज़लों की नफ़ासत-मुहब्बत के लिए तारीफ़ें ही तारीफ़ें हैं। सामाजिक मसायल से फ़रार की उनकी शायरी का एहतिराम है, उन्हें भ्रष्ट राजनीतिक हिमायत से हासिल मेहरबानियों पर चुप्पी है और साम्प्रदायिक ताक़त से उनकी रज़ामंदी पर बोलने से परहेज़ है। ऐसे में बशीर बद्र का ही यह शेर –
जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौंसला नहीं होता।
