ओमसिंह अशफ़ाक की दो कविताएं

ओमसिंह अशफ़ाक की दो कविताएं

बाकी सब तो ‘चंगा’ है

 

बाकी सब तो ‘चंगा’ है !

बस राजा उनका नंगा है!

 

गंगा में उसे मिले शांति,

पर मन में उसके दंगा है!

 

अच्छे दिन तो हुए हवाई,

बस आगे अब तो ‘पंगा’ है!*

 

मन के भीतर मैल ना हो तो,

कठौती में समझो गंगा है!

 

कैसे पहुंचेगा बोधगया तू,

जब मन में तेरे ‘दरभंगा’ है!

 

मन से छल़-बल़ गया नहीं,

तो सूट-बूट में भी नंगा है!

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*चंगा माने अच्छा-बढ़िया ।

*पंगा माने झगड़ा-टंटा ।

 

कितनी बार लुटे हैं हम

 

कितनी बार गिरे हैं हम और कितनी बार उठे हैं हम!

फितरत ऐसी रही हमारी ना कभी हौसले हुए हैं कम!

 

कितनी नदियां पार करी और कितने ऊंचे पहाड़ चढ़े,

कितने सुंदर नगर बसाए रहे बनकर उनके हमदम!

 

कितनी विपदा झेली हमने भूख बाढ़ और महामारी,

विपदा से हम कभी डरे ना सदा रहे हैं ताजा दम!

 

कितनी बार लुटे हैं हम और कितनी बार गए उजाड़े,

उजड़-उजड़ कर फिर बस जाते याद ना रखते पिछले गम!

 

मूलमंत्र रहा एक हमारा संघर्ष एकता भाईचारा,

देखा जिसने बद-नियत से कर छोड़ा उसको बेदम!

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