दिमाग मुक्त भारत
शीतल पी सिंह
पहले नक्सल था। वह जंगल में मिलता था। फिर अर्बन नक्सल आया—वह विश्वविद्यालय, सेमिनार और किताबों के आसपास आइडेंटिफाई होता था। फिर टुकड़े-टुकड़े गैंग, खान मार्केट गैंग, आंदोलनजीवी जैसी राजनीतिक प्रजातियों की खोज हुईं।
आगे बढ़ते हुए यह खोज सीधे खोपड़ी के भीतर पहुंच गई है।
लालकिले से मारकिट में नया शब्द उछला है—“दिमागी नक्सल”।
इस आविष्कार के बाद सुरक्षा एजेंसियों का काम आसान हो जाना चाहिए। अब AK-47, बारूद, जंगल और ट्रेनिंग कैंप खोजने की क्या जरूरत? आदमी को कुर्सी पर बैठाइए और चार सवाल पूछिए—
“बेरोजगारी पर कुछ सोचते हो?”
“जी।”
“रुपये की गिरावट पर?”
“थोड़ा।”
“पेपर लीक पर?”
“काफी।”
“सरकार से सवाल भी पूछते हो?”
“जी।”
बस! केस लगभग तैयार है। दिमाग में संदिग्ध गतिविधि पाई गई हैं।
असल समस्या शायद “नक्सल” से ज्यादा “दिमागी” शब्द में है।
क्योंकि दिमाग बड़ी बदतमीज चीज है।
उसे GDP बताइए तो वह प्रति व्यक्ति आय पूछ देता है।
उसे एक्सप्रेसवे दिखाइए तो वह टूटी सड़क का हिसाब मांगता है।
उसे विश्वगुरु बताइए तो वह शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट खोल लेता है।
उसे पांच ट्रिलियन डॉलर का सपना दिखाइए तो वह नौकरी की वैकेंसी पूछ बैठता है।
उसे अमृतकाल कहिए तो वह पूछता है—अमृत किसके गिलास में है?
इतनी बदतमीजी कोई दिमाग ही कर सकता है।
बेचारा घुटना कभी ऐसे सवाल नहीं पूछता।
इसीलिए संभव है कि आने वाले दिनों में देश में नया सरकारी नारा सुनाई दे—
“दिमाग मुक्त भारत।”
स्कूलों में बच्चों को चेतावनी दी जाएगी—
“बेटा, पढ़ो जरूर, लेकिन इतना मत पढ़ लेना कि सवाल पूछने लगो।”
विश्वविद्यालयों में नया विषय खुलेगा—सहमति अध्ययन विभाग।
परीक्षा में प्रश्न होगा—
“सरकार का निर्णय सही क्यों है?”
उत्तर के विकल्प होंगे—
(A) बिल्कुल सही
(B) ऐतिहासिक रूप से सही
(C) विश्व में पहली बार इतना सही
(D) उपरोक्त सभी।
जो विद्यार्थी लिख देगा—“निर्भर करता है, आंकड़े देखिए”, उसकी कॉपी सीधे दिमागी नक्सल प्रकोष्ठ में भेजी जाएगी।
पत्रकारिता तो पहले से ही आसान की जा चुकी है अब और आसान हो जाएगी। पत्रकार का काम पूछना नहीं, पूछने से बच निकलना होगा।
“महंगाई क्यों बढ़ी?”
खतरनाक प्रश्न।
“प्रधानमंत्री आज कितने बजे उठे?”
राष्ट्रनिर्माण।
“बेरोजगारी का क्या हुआ?”
दिमागी नक्सलवाद।
“प्रधानमंत्री ने नाश्ता कैसे और कब किया ?”
सकारात्मक पत्रकारिता।
मतलब लड़ाई अब हथियार से नहीं, दिमाग से है।
और दिमाग का इलाज मुश्किल है।
उसे जेल में डालिए, विचार बाहर घूमता रहता है।
किताब हटाइए, PDF आ जाती है।
अखबार दबाइए, मोबाइल खुल जाता है।
पोस्ट हटाइए, स्क्रीनशॉट बच जाता है।
सवाल पूछने वाले को बदनाम कीजिए, अगला आदमी वही सवाल पूछ देता है।
यही दिमाग की खराबी है—यह संक्रामक होता है।
एक आदमी पूछता है—“क्यों?”
दूसरा पूछता है—“कितना?”
तीसरा पूछता है—“किसके पैसे से?”
चौथा पूछ देता है—“हिसाब कहां है?”
फिर मामला हाथ से निकलने लगता है।
इसलिए नागरिकों के लिए नई एडवाइजरी जारी होनी चाहिए—
सोचना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक, लेकिन सत्ता के लिए हानिकारक हो सकता है।
दिमाग का प्रयोग सीमित मात्रा में करें।
सरकारी दावे सुनते समय उसे बंद रखें।
चुनाव के समय केवल उंगली चलाएं, दिमाग नहीं।
और यदि गलती से कोई सवाल पैदा हो जाए तो तुरंत नजदीकी टीवी चैनल पर जाकर दो घंटे की बहस देख लें। संभव है दिमाग अपने आप सुन्न हो जाए।
फिर भी आराम न मिले तो राष्ट्रहित में नारे लगाइए।
क्योंकि लोकतंत्र के इस नए संस्करण में शायद नागरिकों की दो ही श्रेणियां बचेंगी—
जो हर बात पर हां में सिर हिलाता है, वह राष्ट्रवादी।
और जिसके सिर के अंदर कुछ हिलता है—वह “दिमागी नक्सल”!
