समाज और प्रकृति दोनों से कवियों को प्रेरणा मिलती है

आज 2 जुलाई को हिंदी के बड़े और लोकप्रिय कवि आलोक धन्वा का जन्मदिन है। इस मौके पर राघवेंद्र दुबे भाऊ ने अपने फेसबुक वॉल पर उनके बारे में लिखा है। उनसे आभार सहित यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। इसका शीर्षक मैंने दिया है बाकी राघवेंद्र जी का लिखा है- सादर

 

समाज और प्रकृति दोनों से कवियों को प्रेरणा मिलती है

आलोक धन्वा

 

जन्मदिन : 2 जुलाई 1948

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अपने प्रिय कवि और मित्र आलोक धन्वा को जन्मदिन की अशेष शुभकामनाएं । 

कहते हैं –

‘ ….. मैं इत्तफाकन एक कवि हूं । मैं मुंगेर के एक गांव बेलबिहमा में पैदा हुआ, जो चारों तरफ छोटे पहाड़ों से उतरनेवाली छोटी-छोटी नदियों से घिरा है । जब मुंगेर के जिला स्कूल में मुझे दाखिला मिला, तो यहां भी गंगा से नजदीकी बनी रही । ऐसे प्राकृतिक वातावरण में कविताओं की रचना करना तो सहज स्वाभाविक बात है । यहां एक पुस्तकालय है श्रीकृष्ण सेवा सदन, जहां बहुत छोटी उम्र से ही मैं बैठने लगा और भिन्न-भिन्न साहित्यकारों की पुस्तकें पढ़ने लगा । मूलत: विज्ञान का छात्र होने के बावजूद साहित्य से लगाव हो गया । दरअसल समाज और प्रकृति दोनों से कवियों को प्रेरणा मिलती है ।…’

‘ नागार्जुन सम्मान ‘ , ‘ फिराक गोरखपुरी सम्मान ‘ , ‘ गिरिजा कुमार माथुर सम्मान ‘ , ‘ भवानी प्रसाद मिश्र सम्मान ‘ से नवाज़े गए आलोक धन्वा की ‘ भागी हुई लड़कियां ‘ , ‘ जनता का आदमी ‘ , ‘ गोली दागो पोस्टर ‘ , ‘ कपड़े के जूते ‘ , ‘ ब्रूनो की बेटियां ‘ आदि कविताएं आज भी कहीं गहरे धंसी , जब तब झनझना ही जाती हैं ।

जब अपनी पत्रकारीय यात्रा में घाट – घाट का पानी पीते , बिहार एक अहम मुकाम था , आलोक धन्वा जी से अक्सर मुलाकात हो जाती थी । वह मेरे अच्छे मित्र हैं । पटना तकरीबन 10 – 12 साल रहा । 2015 के बाद पटना छूटा तबसे आलोक जी से मुलाकात नहीं है । पहली मुलाकात जाने – माने रंगकर्मी , पत्रकार , कॉमरेड अनीश अंकुर के जरिये हुई। यह मुलाकात आमने – सामने की गोली दगने जैसी ही थी ।

जानता तो मैं उन्हें पहले से था लेकिन उनकी कविताओं में झांक कर । दैनिक – जागरण की ओर से ‘ गंगा संसद ‘ का आयोजन था। संचालन मैं ही कर रहा था। आलोक धन्वा जी को अपने वक्तव्य के लिए मंच पर बुलाते मैंने कहा था — ‘ धन्वा जी क्रमश: , रोज – रोज , कुछ और युवा होते जाते व्यक्तित्व हैं । ‘ उनकी जवानी और जवान रचनात्मकता बनी रहे , मोहब्बत और बगावत की आग जलती रहे , यही कामना है । जन्मदिन पर पुनः अशेष शुभकामनाएं । आइये उनकी ‘ भागी हुई लड़कियां ‘ पढ़ें –

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घर की ज़ंजीरें

कितना ज़्यादा दिखाई पड़ती हैं

जब घर से कोई लड़की भागती है

क्या उस रात की याद आ रही है

जो पुरानी फिल्मों में बार-बार आती थी

जब भी कोई लड़की घर से भागती थी?

बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट

सिर्फ़ आँखों की बेचैनी दिखाने-भर उनकी रोशनी?

और वे तमाम गाने रजतपर्दों पर दीवानगी के

आज अपने ही घर में सच निकले !

क्या तुम यह सोचते थे कि

वे गाने सिर्फ़ अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए

रचे गये थे ?

और वह खतरनाक अभिनय

लैला के ध्वंस का

जो मंच से अटूट उठता हुआ

दर्शकों की निजी ज़िदगियों में फैल जाता था ?

तुम तो पढ कर सुनाओगे नहीं

कभी वह खत

जिसे भागने से पहले

वह अपनी मेज पर रख गई

तुम तो छुपाओगे पूरे जमाने से

उसका संवाद

चुराओगे उसका शीशा उसका पारा

उसका आबनूस

उसकी सात पालों वाली नाव

लेकिन कैसे चुराओगे

एक भागी हुई लड़की की उम्र

जो अभी काफी बची हो सकती है

उसके दुपट्टे के झुटपुटे में ?

उसकी बची-खुची चीजों को

जला डालोगे ?

उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे ?

जो गूंज रही है उसकी उपस्थिति से

बहुत अधिक

सन्तूर की तरह

केश में

उसे मिटाओगे

एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे

उसके ही घर की हवा से

उसे वहां से भी मिटाओगे

उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर

वहां से भी

मैं जानता हूं

कुलीनता की हिंसा !

लेकिन उसके भागने की बात

याद से नहीं जाएगी

पुरानी पवनचिक्कयों की तरह

वह कोई पहली लड़की नहीं है

जो भागी है

और न वह अन्तिम लड़की होगी

अभी और भी लड़के होंगे

और भी लड़कियां होंगी

जो भागेंगे मार्च के महीने में

लड़की भागती है

जैसे फूलों गुम होती हुई

तारों में गुम होती हुई

तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई

खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में

अगर एक लड़की भागती है

तो यह हमेशा जरूरी नहीं है

कि कोई लड़का भी भागा होगा

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं

जिनके साथ वह जा सकती है

कुछ भी कर सकती है

महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है

तुम्हारे उस टैंक जैसे बंद और मजबूत

घर से बाहर

लड़कियां काफी बदल चुकी हैं

मैं तुम्हें यह इजाजत नहीं दूंगा

कि तुम उसकी सम्भावना की भी तस्करी करो

वह कहीं भी हो सकती है

गिर सकती है

बिखर सकती है

लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में

गलतियां भी खुद ही करेगी

सब कुछ देखेगी शुरू से अंत तक

अपना अंत भी देखती हुई जाएगी

किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी

लड़की भागती है

जैसे सफेद घोड़े पर सवार

लालच और जुए के आरपार

जर्जर दूल्हों से

कितनी धूल उठती है

तुम जो

पत्नियों को अलग रखते हो

वेश्याओं से

और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो

पत्नियों से

कितना आतंकित होते हो

जब स्त्री बेखौफ भटकती है

ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व

एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों

और प्रमिकाओं में !

अब तो वह कहीं भी हो सकती है

उन आगामी देशों में

जहां प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा

कितनी-कितनी लड़कियां

भागती हैं मन ही मन

अपने रतजगे अपनी डायरी में

सचमुच की भागी लड़कियों से

उनकी आबादी बहुत बड़ी है

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी?

क्या तुम्हारी रातों में

एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं?

क्या तुम्हें दाम्पत्य दे दिया गया?

क्या तुम उसे उठा लाए

अपनी हैसियत अपनी ताकत से?

तुम उठा लाए एक ही बार में

एक स्त्री की तमाम रातें

उसके निधन के बाद की भी रातें !

तुम नहीं रोए पृथ्वी पर एक बार भी

किसी स्त्री के सीने से लगकर

सिर्फ आज की रात रुक जाओ

तुमसे नहीं कहा किसी स्त्री ने

सिर्फ आज की रात रुक जाओ

कितनी-कितनी बार कहा कितनी स्त्रियों ने दुनिया भर में

समुद्र के तमाम दरवाजों तक दौड़ती हुई आयीं वे

सिर्फ आज की रात रुक जाओ

और दुनिया जब तक रहेगी

सिर्फ आज की रात भी रहेगी

सलाम कॉमरेड । जीयो जी भर ।

* राघवेंद्र दुबे भाऊ

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