आजादी का उत्सव और गुलामी के बचे हुए चेहरे
रत्ना भदौरिया
दो दिन पहले हमने आज़ादी का उत्सव मनाया था।
तिरंगा लहराया गया, राष्ट्रगान गाया गया, भाषण हुए, मिठाइयाँ बँटीं और देश ने अपने इतिहास के एक गौरवपूर्ण अध्याय को याद किया।
लेकिन उत्सव की रोशनी बुझते ही एक दूसरा भारत हमारे सामने खड़ा हो जाता है—वह भारत जो पूछता है:
क्या हम सचमुच आज़ाद हैं?
क्या आज़ादी केवल विदेशी शासन से मुक्ति का नाम है?
क्या आज़ादी का अर्थ इतना भर है कि सत्ता की चाबी अपने हाथों में आ गई?
या आज़ादी का अर्थ उस आखिरी आदमी तक पहुँचना भी है, जिसके घर में आज भी भूख दरवाजे पर बैठी है?
अगर एक परिवार दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है, तो उसकी आज़ादी कहाँ है?
अगर एक गरीब आदमी बीमारी से कम और अस्पताल के भारी-भरकम बिल से ज्यादा डरता है, तो वह किस आज़ादी का नागरिक है?
अगर मानसिक बीमारी से जूझते व्यक्ति और उसके परिवार को इलाज के लिए आर्थिक तबाही का सामना करना पड़े, तो आयुष्मान कार्ड की चमकती हुई भाषा उसके दर्द का इलाज कैसे करेगी?
कागज पर योजनाएँ बहुत हैं, लेकिन बीमारी कागज पर नहीं होती।
वह शरीर में होती है, मन में होती है, घर की रसोई में होती है और कभी-कभी पूरे परिवार की बची हुई जमा-पूँजी में अपना अंतिम हिसाब लिख जाती है।
एक तरफ स्वास्थ्य के अधिकार के दावे हैं, दूसरी तरफ अस्पतालों के काउंटर पर खड़े लोग हैं, जिनकी आँखों में बीमारी से ज्यादा बिल का भय दिखाई देता है।
क्या यही स्वस्थ राष्ट्र की तस्वीर है?
आजादी का दूसरा नाम शिक्षा भी होना चाहिए था। मगर शिक्षा धीरे-धीरे अधिकार से अधिक बाजार की वस्तु बनती जा रही है। महंगे स्कूल, महंगी फीस, महंगी कोचिंग और प्रतियोगिता का ऐसा जंगल जिसमें गरीब बच्चे प्रवेश करने से पहले ही बाहर कर दिए जाते हैं।
जिस देश में प्रतिभा पैदा होने से पहले फीस की रसीद से मापी जाने लगे, वहाँ शिक्षा कितनी स्वतंत्र है?
एक बच्चे के सपनों के सामने जब स्कूल की फीस खड़ी हो जाए, तो दोष किसका है—उस बच्चे का, उसके माता-पिता का या उस व्यवस्था का जिसने शिक्षा को बाजार की भाषा में लिख दिया?
फिर आती है महँगाई।
रसोई का बजट सिकुड़ता जाता है और आवश्यकताओं की सूची लंबी होती जाती है। मजदूर अपनी मेहनत बेचता है, किसान अपनी फसल और मध्यवर्ग अपना समय—फिर भी जीवन सस्ता नहीं होता।
सबसे विडंबनापूर्ण दृश्य यह है कि देश की अर्थव्यवस्था के बढ़ते हुए आँकड़ों के बीच आम आदमी अपनी छोटी-सी जिंदगी का हिसाब लगाता रहता है—
आटा कितना महँगा हुआ, दवा कितनी महँगी हुई, स्कूल की फीस कितनी बढ़ी और महीने के अंत तक जेब में क्या बचा?
यहीं पूँजीवाद का वह चेहरा दिखाई देता है जहाँ मुनाफा बढ़ता है, लेकिन आदमी छोटा होता जाता है।
बाजार कहता है—जिसके पास पैसा है, उसके लिए सब उपलब्ध है।
गरीब पूछता है—
जिसके पास पैसा नहीं, उसके लिए नागरिक होने का अर्थ क्या है?
और जब आर्थिक असमानता के साथ सत्ता का केंद्रीकरण जुड़ता है, तब लोकतंत्र की साँस और भी कठिन हो जाती है।
तानाशाही हमेशा बंदूक लेकर नहीं आती।
कभी वह सवाल पूछने वालों को संदिग्ध बना देती है।
कभी असहमति को अपराध की तरह प्रस्तुत करती है।
कभी आलोचना को राष्ट्र-विरोध का तमगा देती है।
कभी जनता को मुद्दों से हटाकर आपस में बाँट देती है।
फासीवाद का सबसे खतरनाक चेहरा यही है कि वह समाज को पहले मनुष्य से नागरिक, फिर नागरिक से भीड़ और अंततः भीड़ से अनुयायी में बदल देता है।
जहाँ प्रश्न पूछना अपराध हो जाए, वहाँ लोकतंत्र केवल संविधान की किताब में बचता है।
और फिर भ्रष्टाचार है—वह दीमक जो व्यवस्था की लकड़ी को भीतर से खोखला करती रहती है।
गरीब को अधिकार पाने के लिए सिफारिश चाहिए, युवा को अवसर पाने के लिए पहचान चाहिए, व्यापारी को व्यवस्था चलाने के लिए रास्ते चाहिए और आम आदमी को अपने ही अधिकार के लिए किसी दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ती है।
जब व्यवस्था पारदर्शी नहीं रहती, तब नागरिक का विश्वास धीरे-धीरे मरता है।
लेकिन शायद इस देश की सबसे गहरी चोट स्त्रियों के हिस्से में आती है।
बलात्कार की खबरें केवल अखबार की सुर्खियाँ नहीं हैं। वे उस सभ्यता के चेहरे पर पड़े हुए प्रश्न हैं जो स्वयं को आधुनिक और विकसित कहती है।
जिस समाज में लड़की के कपड़ों पर बहस होती है लेकिन अपराधी की मानसिकता पर नहीं, वहाँ समस्या लड़की नहीं, समाज की दृष्टि है।
जिस स्त्री को घर, सड़क, कार्यस्थल और सार्वजनिक जीवन—हर जगह अपने अस्तित्व की कीमत चुकानी पड़े, वह किस स्वतंत्रता का अनुभव कर रही है?
15 अगस्त को मिली आजादी क्या उसकी देह तक पहुँच पाई है?
शोषण के रूप बदल गए हैं, लेकिन शोषण समाप्त नहीं हुआ।
कहीं मजदूर अपनी मजदूरी के लिए संघर्ष कर रहा है।
कहीं किसान अपनी उपज के उचित मूल्य के लिए।
कहीं महिला अपने सम्मान के लिए।
कहीं युवा रोजगार के लिए।
कहीं गरीब इलाज के लिए।
कहीं बच्चा अच्छी शिक्षा के लिए।
और सत्ता हर वर्ष हमें बताती है कि देश आगे बढ़ रहा है।
निश्चित ही देश आगे बढ़ना चाहिए।
लेकिन सवाल यह है कि कौन आगे बढ़ रहा है और कौन पीछे छूट रहा है?
किसी राष्ट्र की प्रगति केवल ऊँची इमारतों, चमकती सड़कों, आर्थिक आँकड़ों और बड़े-बड़े आयोजनों से नहीं मापी जा सकती।
राष्ट्र की असली ऊँचाई उस आदमी की जिंदगी में दिखाई देती है जो सबसे नीचे खड़ा है।
जिस दिन गरीब बिना भय के अस्पताल जा सकेगा,
जिस दिन बच्चा फीस के कारण शिक्षा से वंचित नहीं होगा,
जिस दिन महिला बिना डर के सड़क पर चल सकेगी,
जिस दिन मजदूर को उसकी मेहनत का सम्मान मिलेगा,
जिस दिन किसान आत्मसम्मान के साथ जी सकेगा,
जिस दिन युवा नौकरी के लिए दर-दर नहीं भटकेगा,
जिस दिन सवाल पूछना राष्ट्रद्रोह नहीं माना जाएगा,
और जिस दिन सत्ता जनता से डरने लगेगी—क्योंकि जनता उसके सामने जवाब मांगने के लिए खड़ी होगी—
शायद उस दिन हम आजादी का अर्थ थोड़ा और समझ पाएँगे।
आजादी केवल सीमा पर दुश्मन से बचाने का नाम नहीं है।
आजादी भूख से भी चाहिए।
बीमारी से भी चाहिए।
अशिक्षा से भी चाहिए।
भ्रष्टाचार से भी चाहिए।
शोषण से भी चाहिए।
स्त्री के भय से भी चाहिए।
तानाशाही प्रवृत्तियों से भी चाहिए।
और उस व्यवस्था से भी चाहिए जो नागरिक को अधिकार देने से पहले उसकी जेब देखती है।
हमने विदेशी सत्ता की जंजीरें तोड़ दीं—यह इतिहास की महान उपलब्धि है।
लेकिन इतिहास का अगला प्रश्न हमारे सामने खड़ा है:
क्या हम उन अदृश्य जंजीरों को भी तोड़ पाए हैं, जो भूख, बीमारी, महँगाई, बेरोजगारी, असमानता, शोषण, भ्रष्टाचार और भय के रूप में आज भी हमारे पैरों में बँधी हुई हैं?
तिरंगा हर वर्ष ऊँचा लहराता है।
लेकिन उसके नीचे खड़ा अंतिम मनुष्य कब इतना ऊँचा उठेगा कि वह भी कह सके—
हाँ, मैं आज़ाद हूँ।
