पापा, कल मेरा जन्मदिन था…
डॉ. रीटा अरोड़ा
“पापा…” नन्ही आवाज़ आई।
रोहित ने सिर उठाया – बेटी हाथ में मुरझाया केक लिए खड़ी थी।
“कल रात बारह बजे तक इंतज़ार किया था… आप नहीं आए।” उसकी आँखों में आँसू थे, होंठों पर वही मासूम मुस्कान।
रोहित का गला रुँध गया। लैपटॉप की स्क्रीन पर चमकती “प्रमोशन” की मेल अचानक बेमानी लगने लगी।
कितनी अजीब बात है ना – हम पूरी ज़िन्दगी उन चीज़ों के लिए दौड़ते हैं जो हमारे पास पहले से हैं, और जिन्हें पाने के लिए दौड़ते हैं, वो कभी हमें पूरा नहीं भरतीं। माँ की झुर्रीदार हथेली, पिता की थकी आँखें, बीवी का बिन बोला इंतज़ार, बच्चों की अनकही शिकायतें – ये सब हमारे “कल” की भेंट चढ़ती जा रही हैं।
समय सबसे निर्दयी है। वह न रुकता है, न लौटता है। हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, ज़िन्दगी से लड़ना पड़ता है – पर याद रखिए, हम लड़ रहे हैं जीने के लिए, जीना छोड़ने के लिए नहीं।
रात के सन्नाटे में जब सफल आदमी अकेला बैठता है, तो उसकी ट्रॉफ़ियाँ चुप रहती हैं, बस दिल बोलता है – “क्या पाया, क्या खोया?” तब वह निराश होता है, आँख भर आती है। सच्चा कामयाब वह नहीं जिसका नाम अख़बार में छपे, बल्कि वह है जिसके जाने पर कोई रोए।
सबसे बड़ी सीख यही है – पैसे कमाइए, पर उन लोगों को मत खोइए जिनके लिए कमा रहे हैं।
दौड़िए ज़रूर, पर इतना ठहरिए कि ज़िन्दगी आपसे मिल सके।
