कविता
राष्ट्रवाद
डा. लाभ सिंह खीवा
बड़े शातिर होते हैं कुछ चरवाहे।
किसी उजाड़ बियाबान के
या हरे भरे मैदान के
पुराण – इतिहास में से
रख देते हैं बाड़े का नाम।
छोटी बड़ी चारदीवारी,
पुरानी हवेलियां बन जाती हैं
– विशाल बाड़े का हिस्सा।
तामीर हो जाता है एक मजबूत
– राष्ट्र, भेड़ चराते
चालाक चरवाहों का।
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वे प्रण करते
बाड़े की रखवाली का।
दरवाजे पर गाड़ देते
अपनी प्रभुसत्ता का झंडा।
साथ ही गढ़े कानूनों का
एक अनगढ़ डंडा।
घोषित कर देते बाड़े का
एक राष्ट्रीय गीत।
जो हर जानवर के लिए
लाज़िम है सुनना/गाना
मुंदी बंद आंखों से सावधान होकर
रेवड़ को एक ही रंग में रंग कर,
लिख देते हैं बाड़े के द्वार पर
रेवड़ की नस्ल का नाम।
एक ही बाड़ा, एक ही नस्ल,
– एक ही बैं बैं।
बाड़े के भीतर भूरे स्वान
बाहर हरी वर्दी वाले घोड़े।
रखते निगाह बाड़े की हद पर
दिन रात हथियारबंद चौकस
– होकर।
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कुछ सींगों वाले भेड़े,सींग मारने
– के अभ्यस्त।
चेतन दिमाग,देह के तगड़े
बाड़े के वासियों की साझी मुक्ति
– के आकांक्षी, कोई
इन्कलाबी युक्ति इकट्ठे होकर
– सोचते।
ज़ोरावर चरवाहे, धाकड़ पश्चगामी
– उनको बाड़े का
अलगाववादी कहते।
हमले से डर कर आतंकवादी
– कहते,
यह भी बताते कि हमारे बाड़े में
कुछ दिमाग़ी नक्सली रहते।
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मूल पंजाबी से हिंदी अनुवाद डॉ राजेन्द्र तिवारी

पंजाबी से हिंदी अनुवाद – डॉ राजेन्द्र तिवारी
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डॉ. लाभ सिंह खीवा की लिखी और राजेन्द्र तिवारी द्वारा पंजाबी से हिंदी में अनूदित बहुत ज़रूरी और पठनीय कविता।
बेहतरीन अनुवाद।
प्रतिबिंब मीडिया का दिली शुक्रिया।