धरती का दर्द: क्या हम केवल दर्शक बने रहेंगे?

विश्व पर्यावरण दिवस विशेष

धरती का दर्द: क्या हम केवल दर्शक बने रहेंगे?

डॉ. रीटा अरोड़ा

“पापा, गौरैया कैसी होती है?” बेटे के इस सवाल पर पिता कुछ पल के लिए चुप हो गए।
उन्होंने मोबाइल से एक तस्वीर खोजकर बच्चे को दिखाई।

बच्चा उत्साहित होकर बोला, “अच्छा… यह चिड़िया! मैंने इसे कभी असली में नहीं देखा।”
पिता के पास कोई जवाब नहीं था।उन्हें अपना बचपन याद आ गया, जब सुबह की शुरुआत गौरैया की चहचहाहट से होती थी। आँगन में दाना चुगती चिड़ियाँ, पेड़ों पर बने घोंसले और खुला आसमान जीवन का हिस्सा थे।

आज बच्चे पक्षियों को किताबों और मोबाइल स्क्रीन पर पहचानते हैं।

उसी क्षण उन्हें एहसास हुआ कि पर्यावरण संकट केवल पेड़ों, नदियों और मौसम का संकट नहीं है। यह उन यादों का संकट भी है जिन्हें हम अपनी अगली पीढ़ी तक पहुँचाना चाहते थे।

सच तो यह है कि आज हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ प्रकृति हमें हर दिन कोई न कोई संकेत दे रही है। कहीं बेमौसम बारिश हो रही है, कहीं भीषण सूखा पड़ रहा है। कहीं जंगल जल रहे हैं तो कहीं शहर पानी में डूब रहे हैं। कभी ग्लेशियर टूट रहे हैं तो कभी तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है।

लेकिन विडंबना देखिए, हम इन घटनाओं को खबरों की तरह पढ़ते हैं, चेतावनियों की तरह नहीं।

हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। बहुत से लोगों के लिए यह सिर्फ एक औपचारिक दिवस है, लेकिन वास्तव में यह हमारी धरती का स्वास्थ्य परीक्षण है।

यह दिन हमें याद दिलाता है कि हम प्रकृति के मालिक नहीं, बल्कि उसके सहयात्री हैं।

दुर्भाग्य से पिछले कुछ दशकों में इंसान ने विकास की ऐसी परिभाषा गढ़ ली, जिसमें प्रकृति के लिए बहुत कम जगह बची।

हमने जंगलों को काटकर इमारतें खड़ी कर दीं।

नदियों को नालों में बदल दिया।

झीलों को कंक्रीट से भर दिया।

और फिर आश्चर्य करते हैं कि मौसम इतना असंतुलित क्यों हो गया है।

सच तो यह है कि प्रकृति कभी बदला नहीं लेती। वह केवल संतुलन स्थापित करती है।

जब हम उसके नियमों को तोड़ते हैं, तब परिणाम आपदाओं के रूप में सामने आते हैं।

आज जलवायु परिवर्तन केवल वैज्ञानिकों की चर्चा का विषय नहीं रहा। यह आम आदमी की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है। किसान मौसम की अनिश्चितता से परेशान है। शहरों में रहने वाला व्यक्ति प्रदूषण से जूझ रहा है। बच्चे साफ हवा के लिए तरस रहे हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को कैसी पृथ्वी सौंपेंगे।

विश्व पर्यावरण दिवस 2026 का विषय है-

“प्रकृति से प्रेरित। जलवायु के लिए। हमारे भविष्य के लिए।”

यह विषय केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक दिशा है।

यह हमें बताता है कि जिन समस्याओं को इंसान ने पैदा किया है, उनके समाधान भी प्रकृति के भीतर मौजूद हैं।

एक जंगल हजारों मशीनों से ज्यादा प्रभावी ढंग से कार्बन को सोख सकता है।

एक स्वस्थ नदी लाखों लोगों की प्यास बुझा सकती है।

एक आर्द्रभूमि बाढ़ के प्रभाव को कम कर सकती है।

एक पेड़ केवल ऑक्सीजन नहीं देता, वह भविष्य देता है।

लेकिन समाधान तभी संभव है, जब हम अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करें। अक्सर लोग सोचते हैं कि पर्यावरण बचाना सरकारों या बड़ी संस्थाओं का काम है।

लेकिन बदलाव हमेशा व्यक्ति से शुरू होता है।

जब हम अनावश्यक बिजली बंद करते हैं, तब पर्यावरण बचता है।

जब हम प्लास्टिक की जगह कपड़े का थैला इस्तेमाल करते हैं, तब पर्यावरण बचता है।

जब हम एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करते हैं, तब पर्यावरण बचता है।

जब हम पानी की हर बूंद का सम्मान करते हैं, तब पर्यावरण बचता है।

दुनिया की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि लोग पर्यावरण के बारे में जानते नहीं हैं।

समस्या यह है कि लोग जानते सब हैं, लेकिन करते बहुत कम हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस पर लाखों पौधे लगाए जाते हैं। तस्वीरें खिंचती हैं। सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली जाती हैं। लेकिन कुछ महीनों बाद वही पौधे सूख जाते हैं।

असल सवाल पौधा लगाने का नहीं है।

असल सवाल उसे बचाने का है।

प्रकृति को भाषण नहीं चाहिए।

उसे व्यवहार चाहिए।

वह पोस्टर नहीं मांगती।

वह संरक्षण मांगती है।

मुझे हमेशा लगता है कि पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत पेड़ लगाने से नहीं, सोच बदलने से होती है।

जिस दिन हम नदी को सिर्फ पानी नहीं, जीवन समझेंगे…

जिस दिन हम जंगल को सिर्फ लकड़ी नहीं, सांस समझेंगे…

जिस दिन हम धरती को सिर्फ जमीन नहीं, अपनी विरासत समझेंगे…

उस दिन बदलाव अपने आप शुरू हो जाएगा।

याद रखिए, हमारे पूर्वजों ने हमें हरी-भरी धरती दी थी।

सवाल यह है कि हम अपने बच्चों को क्या देंगे?

कंक्रीट के जंगल?

प्रदूषित हवा?

या फिर एक ऐसी पृथ्वी जहाँ जीवन सम्मान के साथ साँस ले सके?

निर्णय आज हमें लेना है।

क्योंकि प्रकृति के पास दूसरा विकल्प नहीं है और इंसान के पास दूसरी पृथ्वी नहीं है।
फंडा यह है कि-

पर्यावरण संरक्षण कोई एक दिन का अभियान नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है।

यदि हम आज प्रकृति की रक्षा करेंगे, तो कल प्रकृति हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित रखेगी। क्योंकि धरती हमारी संपत्ति नहीं, आने वाली पीढ़ियों की अमानत है।

लेखिका – डॉ रीटा अरोड़ा