समाज की चिंता को व्यक्त करती गुल्लर के फूल

पुस्तक समीक्षा

समाज की चिंता को व्यक्त करती गुल्लर के फूल

मनजीत सिंह

 

गुल्लर के फूल यह कविता संग्रह जब मिला तो इसके बारे में लिखने की उत्सुकता बढ़ने लगी । यह हरियाणवी लोकभाषा में रची गई एक संवेदनशील और सामाजिक चेतना से भरपूर रचना है। कवि ने अपने अनुभवों के माध्यम से बदलते समाज, टूटते रिश्तों, घटते मानवीय मूल्यों और ग्रामीण जीवन की पुरानी स्मृतियों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। कविता में प्रेम, मेहनतकश किसान, पिता का त्याग, गरीबी, भ्रष्टाचार, स्वार्थ, पर्यावरण, रिश्तों की दूरी और पूर्वजों की विरासत जैसे अनेक विषय उभरकर सामने आते हैं।

कवि को सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि मनुष्य ने सच्चे प्रेम और इंसानियत को जीवन की सबसे बड़ी पूँजी नहीं बनाया। वह जाति, धर्म, स्वार्थ और भेदभाव में उलझ गया है। जबकि प्रेम में इतनी शक्ति है कि वह गूँगे को भी अपनी भावनाएँ व्यक्त करने की प्रेरणा दे सकता है और बड़े-बड़े बुजुर्गों को भी प्रभावित कर सकता है। इसी प्रकार पिता अपने बच्चों के सुख और भविष्य के लिए स्वयं अनेक कठिनाइयाँ सहन करता है। यह पितृ-प्रेम और त्याग कविता को अत्यंत मार्मिक बनाता है।

कवि ने किसान और मेहनतकश व्यक्ति की कठिन परिस्थितियों को भी देखा है। अन्नदाता स्वयं संघर्ष करता है, फिर भी जीवन की अनेक परेशानियों और अभावों से जूझता रहता है। गरीबी की स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि लोगों को घर के बर्तन, पशु, मकान और खेत तक बेचने पड़ते हैं। कर्ज का बोझ मनुष्य के जीवन को दबा देता है।

कविता में सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य भी है। ठेकेदारों की बेईमानी, अधिकारियों और नेताओं की चापलूसी, बिकते हुए ईमान और बदलते हुए वादों के माध्यम से कवि भ्रष्टाचार की वास्तविकता सामने रखता है। व्यापार में भी ईमानदारी के स्थान पर अधिक लाभ की प्रवृत्ति दिखाई देती है। कवि को दुख है कि धन के पीछे भागते-भागते मनुष्य अपना जमीर और इंसानियत तक बेचने को तैयार हो गया है।

कवि पर्यावरण के बदलते स्वरूप पर भी चिंता व्यक्त करता है। पहले गाँवों में तोते, चील, तीतर जैसे अनेक पक्षी दिखाई देते थे और बड़-पीपल जैसे पेड़ों की छाया में चौपालें सजती थीं। आज पक्षियों की आवाजें कम हो गई हैं और प्रकृति से मनुष्य का संबंध कमजोर पड़ गया है।

कविता का एक महत्वपूर्ण पक्ष पुराने ग्रामीण जीवन की स्मृतियाँ हैं। पहले चौपालें सामाजिक जीवन का केंद्र थीं। पड़ोसी परिवार की तरह होते थे, राहगीरों का स्वागत किया जाता था और सुख-दुःख में पूरा गाँव साथ खड़ा होता था। त्योहारों, फाग और सर्दियों की धूणी जैसी परंपराएँ लोगों को आपस में जोड़ती थीं। आज आधुनिक जीवन ने इन सहज संबंधों और परंपराओं को काफी बदल दिया है।

कवि को अपने पुराने घर, पिता, गाँव, खेत और बुजुर्गों की याद आती है। इन स्मृतियों से उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। अंततः कविता यह संदेश देती है कि धन, सत्ता और भौतिक संपत्ति स्थायी नहीं हैं। मनुष्य की असली पूँजी प्रेम, इंसानियत, ईमानदारी, रिश्ते, संस्कार और पूर्वजों से मिली विरासत हैं। यदि हम इन्हें खो देंगे, तो भौतिक उन्नति के बावजूद जीवन भीतर से खाली हो जाएगा।

प्यार की पूँजी नहीं कती सै इब तलक,
धरम जात में उलझी ताणी लिखद्यूँ के।
डाहकै गाळ मैं चरखा रोज दुपहरी मैं,
सूत कात्यूँ बड़ी र्याणी लिखद्यूँ के।
करकै याद घर गाँव खेत नै बुढ़ै की,
आँख्यां के मैं रिसदा पाणी लिखद्यूँ के।
पुरख्यां की जायदाद लुटा दी हो जिसनै,
‘केसर’ उसकी कुणबा घाणी लिखद्यूँ के।

कविता का विस्तृत भावार्थ

यह कविता हरियाणवी लोकभाषा में लिखी गई एक भावपूर्ण और संवेदनशील रचना है। कवि ने बहुत कम शब्दों में प्रेम, जाति-धर्म के भेदभाव, ग्रामीण जीवन, चरखे, श्रम, गाँव-घर, खेत, बुजुर्गों की याद तथा पूर्वजों की विरासत जैसे अनेक विषयों को समेट लिया है। कविता में व्यक्तिगत भावनाओं के साथ-साथ सामाजिक चिंता भी दिखाई देती है।

कवि अपने जीवन और समाज को देखते हुए महसूस करता है कि मनुष्य ने सच्चे प्रेम को अपनी सबसे बड़ी पूँजी नहीं बनाया। इसके बजाय वह धर्म, जाति, स्वार्थ और सामाजिक भेदभाव में उलझ गया है। इसी कारण मनुष्य के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। दूसरी ओर कवि को अपना पुराना ग्रामीण जीवन, घर, गाँव, खेत और बुजुर्ग याद आते हैं। इन स्मृतियों से उसकी आँखों में आँसू भर आते हैं।

कविता के अंत में कवि पूर्वजों से मिली संपत्ति और विरासत की ओर संकेत करता है। वह बताता है कि पूर्वजों ने मेहनत से जो कुछ बनाया, यदि उसे अगली पीढ़ी नष्ट कर दे तो उसका नुकसान केवल धन-संपत्ति का नहीं होता, बल्कि परिवार के भविष्य और संस्कारों का भी होता है।

“जीवन कहर कमाल देख्या, मानस में तड़फन्दा देख्या।”

कवि ने जीवन के अनेक रूप देखे हैं। जीवन कभी बहुत सुंदर और अद्भुत दिखाई देता है, तो कभी अत्यंत कठिन और पीड़ादायक बन जाता है। कवि ने मनुष्य को परिस्थितियों के कारण अंदर से परेशान और तड़पते हुए देखा है। मनुष्य बाहर से सामान्य दिखाई दे सकता है, लेकिन उसके मन में अनेक चिंताएँ और दुख चल रहे होते हैं। इस पंक्ति में जीवन के सुख-दुःख और मनुष्य की मानसिक पीड़ा का चित्रण है।

“अनदाता की जूँ बुरी सै, हमनै धक्के खांदा देख्या।”

यहाँ कवि मेहनत करने वाले और अन्न पैदा करने वाले व्यक्ति की कठिन स्थिति की ओर संकेत करता है। किसान अथवा गरीब मेहनतकश व्यक्ति अपने परिवार का पेट पालने के लिए दिन-रात मेहनत करता है, फिर भी उसे अनेक परेशानियों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वह जीवन में आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करता है और कई बार दूसरों के धक्के भी सहता है। कवि ने समाज में मेहनतकश व्यक्ति की विवशता को करीब से देखा है।

“इतनी ताकत सुनी प्यार में, गूँगा गाणे गान्दा देख्या।”

प्रेम में बहुत बड़ी शक्ति होती है। सच्चा प्रेम उस व्यक्ति को भी अपनी भावनाएँ व्यक्त करने की क्षमता दे सकता है, जो सामान्यतः बोल नहीं पाता। कवि ने प्रेम की ऐसी अद्भुत शक्ति देखी है कि गूँगा व्यक्ति भी मानो गीत गाने लगा हो। यहाँ “गूँगा गाना गाता” प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। इसका अर्थ है कि प्रेम मनुष्य के भीतर छिपी भावनाओं को जागृत कर देता है।
. “बच्च्यां के मुख खातर बाब्बू, बड़े-बड़े दुख ठान्दा देख्या।”
पिता अपने बच्चों के सुख और भविष्य के लिए अनेक कठिनाइयाँ सहन करता है। वह स्वयं दुखी रहता है, मेहनत करता है, आर्थिक परेशानियों का सामना करता है, लेकिन बच्चों के सामने अपनी परेशानी प्रकट नहीं करता। उनके चेहरे पर मुस्कान देखने के लिए वह बड़े-बड़े दुख अपने सिर पर ले लेता है। इस पंक्ति में पिता के त्याग, प्रेम, जिम्मेदारी और संघर्ष का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है।

“इसक मंदारी बड़े-बुजुर्गां नै, आंगळी पै नचांदा देख्या।”

प्रेम की शक्ति इतनी प्रभावशाली होती है कि उम्रदराज और अनुभवी व्यक्ति भी उसके प्रभाव से बच नहीं पाते। कवि ने देखा है कि प्रेम कभी-कभी बड़े-बड़े बुजुर्गों को भी अपने प्रभाव में ले लेता है। “आंगळी पै नचाना” मुहावरे का अर्थ है—किसी को अपने प्रभाव में कर लेना। यहाँ कवि प्रेम की शक्ति और उसके आकर्षण को रोचक ढंग से प्रस्तुत करता है।

. “किराए पा-पा रोया बंगला, छप्पर मौज मनांदा देख्या।”

इस पंक्ति में कवि ने जीवन की विडंबना और सुख की वास्तविकता को बताया है। एक व्यक्ति किराए पर बड़ा बंगला लेकर भी परेशान और दुखी रह सकता है, जबकि दूसरा व्यक्ति साधारण-से छप्पर के नीचे रहते हुए भी खुशी और संतोष से जीवन बिता सकता है। इससे पता चलता है कि सच्चा सुख धन, बड़े मकान या बाहरी सुविधाओं में नहीं, बल्कि मन की शांति और संतोष में होता है।

“ठेकेदार का देख हाजमा क्यूँकर उन्हें डकारे।
रेता-रूता, बजरी-बुजरी, पत्थर-पाथर सारे।”

कवि ठेकेदारों की भ्रष्ट प्रवृत्ति पर व्यंग्य करता है। निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाली रेत, बजरी और पत्थर आदि में भी हेराफेरी और भ्रष्टाचार किया जाता है। ठेकेदार सरकारी या सार्वजनिक धन को हड़पकर अपना लाभ कमाते हैं और इस भ्रष्टाचार को बड़ी आसानी से पचा जाते हैं।

बाब्बा की करामात देखिए, सब चरणां में बैठै,
धाकड़-धुकड़, अफसर-उफसर, लीडर-लाडर सारे।”

यहाँ कवि किसी प्रभावशाली व्यक्ति की शक्ति और उसके सामने अधिकारियों तथा नेताओं के झुकने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य करता है। बड़े-बड़े अफसर और नेता भी स्वार्थ के कारण प्रभावशाली व्यक्ति के सामने नतमस्तक दिखाई देते हैं। इससे समाज में व्याप्त चापलूसी और सत्ता के दुरुपयोग का चित्र सामने आता है।

“चौगिरदे इब दिखते कोन्या, के बेरा कित लुहकग्ये,
तोते-तातै, चील-चूल अर तीतर-तातर सारे।”

कवि कहता है कि पहले चारों ओर अनेक प्रकार के पक्षी दिखाई देते थे, लेकिन अब वे धीरे-धीरे गायब हो गए हैं। तोते, चील, तीतर आदि पक्षियों का न दिखाई देना पर्यावरण के बिगड़ने और प्रकृति के विनाश की ओर संकेत करता है। मनुष्य के स्वार्थ और विकास की अंधी दौड़ ने प्राकृतिक संतुलन को नुकसान पहुँचाया है।

“मतलब सेती आवैं-जावैं, मतलब सेती बोलैं,
सग्गे-सगूर, भाई-भूरै, मित-मातर सारे।”

आज के समय में रिश्तों में भी स्वार्थ प्रवेश कर गया है। लोग एक-दूसरे से तभी मिलते-जुलते और बातचीत करते हैं, जब उसमें उनका कोई लाभ हो। भाई, रिश्तेदार और मित्र जैसे संबंध भी स्वार्थ से प्रभावित हो गए हैं। कवि सच्चे और निस्वार्थ संबंधों के समाप्त होने पर चिंता व्यक्त करता है।

“खंडहर देखकै बुढ़ा बोला, सब मर खपग्ये इसमें,
राजे-रूजे, राणी-रूणी, नौकर-नाकर सारे।”

खंडहर देखकर बूढ़ा व्यक्ति जीवन की नश्वरता को याद करता है। कभी जिन महलों में राजा-रानी और नौकर-चाकर रहते थे, आज वे सभी समाप्त हो चुके हैं और केवल उनके भवनों के अवशेष बचे हैं। इससे कवि संदेश देता है कि धन, सत्ता, पद और वैभव स्थायी नहीं हैं; अंततः सबको मृत्यु का सामना करना पड़ता है।

“याद आवैं जाड़्यां में जद बाज्यां से दंदकौड़ी,
धूणा-धाणा, गींट्ठी-गाँठ्ठी, हीटर-हाटर सारे।”

सर्दियों के दिनों की पुरानी यादें कवि के मन में आती हैं। पहले लोग ठंड से बचने के लिए अलाव और धूणी जलाते थे तथा लकड़ियों और दूसरे पारंपरिक साधनों का प्रयोग करते थे। अब आधुनिक साधनों, जैसे हीटर आदि ने उनका स्थान ले लिया है। यहाँ कवि बदलते समय और बदलती जीवन-शैली का चित्र प्रस्तुत करता है।

“रंग नै तजके वीर फाग पै मरदां ऊपर गैरें,
पाणी-पुणी, चीक्कड़-चाक्कड़, गोबर-गाबर सारे।”

इस पंक्ति में ग्रामीण जीवन और होली के उत्सव का चित्रण है। फाग के अवसर पर लोग रंग और पानी से एक-दूसरे को भिगोते हैं। कीचड़ और गोबर आदि से खेलकर ग्रामीण परिवेश में होली का आनंद लिया जाता था। कवि लोकजीवन की सहजता, उल्लास और पारंपरिक संस्कृति को सामने लाता है।

“डामगर, बछा, बाड़ा, खेत-खलियाण बिक्याऊ सै,
दबी पड़ी सै करज तळे, याह जान बिक्याऊ सै।”

कवि कहता है कि आज जमीन-जायदाद, पशु, खेत और मकान तक बिकने की स्थिति में हैं। लोगों पर कर्ज का इतना बोझ है कि मानो उनकी पूरी जिंदगी ही कर्ज के नीचे दब गई है। धन की आवश्यकता ने मनुष्य को अपनी मेहनत और जीवन-मूल्यों तक का सौदा करने के लिए मजबूर कर दिया है।

“अफसर, लीडर बेच रह्ये ईमान बिक्याऊ सै,
कहके मुकरै तुरत, बदलजै जिबान बिक्याऊ सै।”

यहाँ कवि प्रशासन और राजनीति में फैली बेईमानी पर कटाक्ष करता है। अधिकारी और नेता अपने ईमान तक को बेचने लगे हैं। वे वादे करते हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद ही अपने वचन से मुकर जाते हैं। उनके लिए सिद्धांत और ईमान से अधिक महत्व स्वार्थ और धन का हो गया है।

“बासण-भांडडा, चूल्हा सूबे सामान बिक्याऊ सै,
भुखमरी मैं ढूँढ अर ढोरे छान बिक्याऊ सै।”

गरीबी और भूख की भयावह स्थिति का चित्रण करते हुए कवि कहता है कि घर का सामान और बर्तन तक बेचने की नौबत आ गई है। भूख से परेशान व्यक्ति इधर-उधर भोजन की तलाश में भटक रहा है। यह पंक्तियाँ आर्थिक असमानता और गरीबों की मजबूरी को सामने रखती हैं।

“इब तो साध फकीरां का बी ध्यान बिक्याऊ सै,
काम-वासना माया चाहिए दान बिक्याऊ सै।”

कवि धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में आई गिरावट पर भी व्यंग्य करता है। अब साधु-संतों का ध्यान भी सांसारिक मोह-माया और धन की ओर आकर्षित हो गया है। त्याग और वैराग्य की जगह धन, कामना और दिखावे ने ले ली है।

“गुरद, फेफड़े, खून बिकै नादान बिक्याऊ सै,
सबनै चाहिए नोट उरे इंसान बिक्याऊ सै।”

इन पंक्तियों में कवि समाज में धन की बढ़ती लालसा को बहुत तीखे ढंग से प्रस्तुत करता है। स्थिति इतनी खराब हो गई है कि मनुष्य के शरीर और रक्त तक को धन के सामने महत्वहीन समझा जाने लगा है। हर व्यक्ति को नोट चाहिए और इंसानियत का मूल्य कम होता जा रहा है।

“जमीर बेचकै सेठ बण्या धनवान बिक्याऊ सै,
बाट-ताखड़ी, सौदा सपै दुकान बिक्याऊ सै।”

यहाँ कवि कहता है कि कुछ लोग अपना जमीर और नैतिकता बेचकर धनवान बन गए हैं। व्यापार में भी ईमानदारी का अभाव दिखाई देता है। तराजू, बाट और सौदे तक में बेईमानी होने लगी है। अर्थात व्यापार का उद्देश्य सेवा नहीं, बल्कि अधिक से अधिक लाभ कमाना बन गया है।
कवि कहता है कि पहले लोग धीरे-धीरे पहाड़ों जैसे ऊँचे स्थानों और बड़े-बड़े पेड़ों की छाँव में बैठकर आपस में समय बिताते थे। बड़ और पीपल जैसे विशाल पेड़ों की छाया गाँव के लोगों के मिलने-जुलने का स्थान हुआ करती थी। वहाँ बैठकर लोग बातें करते, आराम करते और एक-दूसरे के साथ अपनापन बाँटते थे।

पहले गाँव में बैठकें और चौपालें लोगों के सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं। बुजुर्ग वहाँ बैठकर पुरानी बातें और अनुभव सुनाते थे। राहगीर भी वहाँ रुकते, पानी पीते और भोजन करते थे। किसी अजनबी को भी पराया नहीं समझा जाता था। इससे उस समय के ग्रामीण समाज में मौजूद अतिथि-सत्कार और भाईचारे का पता चलता है।

कवि आगे कहता है कि पहले पड़ोसी केवल पड़ोसी नहीं होते थे, बल्कि परिवार के सदस्यों की तरह होते थे। लोग एक-दूसरे के सुख-दुःख में बराबर शामिल होते थे। यदि किसी पड़ोसी के घर कोई काम या परेशानी होती, तो पूरा गाँव उसके साथ खड़ा हो जाता था। आज स्थिति बदल गई है। लोग अपने ही कामों में इतने व्यस्त हैं कि पड़ोसी से मिलने का समय भी नहीं निकाल पाते।
पहले घर-आँगन में पक्षियों की चहचहाहट सुनाई देती थी। कौए आदि पक्षियों की आवाजें ग्रामीण जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थीं। कवि को लगता है कि आज वह पुराना वातावरण भी समाप्त हो गया है और मनुष्य तथा प्रकृति के बीच का संबंध कमजोर पड़ गया है।

कवि रिश्तेदारों के बदलते व्यवहार पर भी व्यंग्य करता है। पहले रिश्तेदार बिना किसी स्वार्थ के नियमित रूप से मिलते थे, लेकिन अब वे केवल कभी-कभार औपचारिकता निभाने आते हैं। यहाँ तक कि विवाह जैसे पारिवारिक अवसरों पर भी रिश्तेदार कई दिनों पहले आकर घर में रहने के बजाय केवल थोड़े समय के लिए आते-जाते हैं। इससे रिश्तों में बढ़ती औपचारिकता और दूरी दिखाई देती है।

कवि आगे अपने पुराने घर और परिवार की स्मृतियों को याद करता है। उसे अपने पिता और पुराने घर की याद आती है। वह बताता है कि पहले घर में लोगों के आने-जाने से चहल-पहल रहती थी। किसी यात्री या अतिथि के आने पर उसके लिए भोजन और आराम की व्यवस्था करना स्वाभाविक माना जाता था।

किताब – गुल्लर के फूल
कवि – कर्मचंद केंसर
प्रकाशन – यूनिक पब्लिशर
मूल्य – 299 रुपये

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