हिंसा नहीं, संवाद से बनेगा सभ्य समाज

चिंतन

हिंसा नहीं, संवाद से बनेगा सभ्य समाज

कुलभूषण उपमन्यु

 

मणिपुरी गिटार वादक चोंगथाम विक्रम सिंह की 6 सितंबर को दिल्ली में की गई मॉब लिंचिंग हत्या की घटना हृदय विदारक होने के साथ साथ समाज के पतन का भी प्रमाण है। दिल्ली को देश का दिल कहा जाता है। यह देशव्यापी हिंसक संस्कृति के विकास का भी प्रमाण है। हत्या के पीछे एक मामूली हस्तक्षेप था। गिटार वादक ने उसके आवास के बगल में डीजे और शराब पीकर शोर शराबा न करने के लिए ही कहा था। इसी बात पर उस प्रसिद्ध कलाकार को पीट-पीट कर मार डाला गया। दिल्ली इस तरह की घटनाओं की पहले भी गवाह बनती रही है। जब पूर्वोत्तर के लोगों के साथ ऐसी घटना होती हैं, तो उसमें नस्ली भेदभाव का भाव भी जुड़ जाता है। यह देश की एकता और अखंडता के लिए भी चिंताजनक बात है। कुछ शराबी मनचलों को देश की राजधानी में इस तरह अराजक हिंसक व्यवहार की छूट न केवल चिंता की बात है बल्कि घटियापन और शर्मिंदगी का उदाहरण भी है। दोषियों को तो कड़ी से कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए, किन्तु समग्र समाज और उसमें दी जा रही शिक्षा और पारिवारिक संस्कारों पर भी सवाल उठाना जरूरी है।

हमें आत्मावलोकन करना पड़ेगा कि क्या कारण हो गया है कि हम बात बात पर आपे से बाहर हो जाते हैं। इसे बहादुरी तो कदापि नहीं कह सकते, यह तो विकृत मानसिकता पूर्ण कायरता का नमूना है। जब हमारी समझ अक्ल से समझदारीपूर्ण तरीके से समस्या का समाधान करने में असमर्थ हो जाती है तब हम हिंसक व्यवहार द्वारा अपनी धाक जमाने की दिशा में मुड़ते हैं। बहादुरी सीमा पर होती है, या गुंडों से निपटने में हो सकती है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे से भी बाहर की बात है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता हमेशा दूसरे की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करने से भी जुड़ी रहती है। जब हम किसी के साथ इस तरह का हिंसक व्यवहार करेंगे तो कोई हमारे साथ भी ऐसा व्यवहार कर सकता है। तब हमारे पास कोई तर्क अपने बचाव के लिए नहीं बचेगा। संविधान, कानून और सामजिक व्यवस्था की यह मांग है कि हम दूसरे की स्वतंत्रता का उल्लंघन न करें, बल्कि सम्मान करें। जब हम हिंसक व्यवहार करते हैं तो दूसरे को भी प्रतिहिंसा या बदले के लिए प्रेरित करते हैं। इस तरह समाज तो हिंसा- प्रतिहिंसा में ही फंसा रहेगा। कब रचनात्मक सोच और काम के लिए समय निकलेगा। समाज अशांति का शिकार हो जाएगा। अशांत समाज कभी सुखी नहीं हो सकता। इन्सान का सारा संघर्ष तो सुख पूर्वक जीवन जीने के लिए ही है।

पहाड़ में तो परंपरा रही है कि जब दो रिश्तेदार या परिचित मिलते हैं तो सुख-शांति संदेश का आदान प्रदान करते हैं। हम भी सुखी और शांत हैं और आप भी सुखी और शांत हों। किन्तु अब तो उलटी धारा बहने लगी है। अपराधवृत्ति लोग तो लूट डकैती, फिरौती आदि में लगे ही हुए हैं, किन्तु यदि आम आदमी भी बात बात पर हिंसक होने लगे तो गुंडे और शरीफ का अंतर तो मिट ही जाएगा। आए दिन रोड रेज की घटनाएं देखने को मिल रही हैं। तुम्हारी गाड़ी मेरी गाड़ी से आगे कैसे निकल गई, छू कैसे गई, हॉर्न क्यों बजा दिया, ऐसी छोटी-छोटी बातों पर भी हम बातचीत या कानूनी तरीके से बात निपटाना भूलते जा रहे हैं।

पर्यटन के लिए निकलते हैं तो तलवारें, लाठियां और कट्टे ले कर निकलते हैं। आखिर हम डर किससे रहे हैं या डराना किसे चाहते हैं। डरने-डराने में ही जिंदगी निकल जाएगी, और फंस गए तो जेल में। एक रचनात्मक, क्रियाशील, और सुखी-विकासशील समाज की रचना आंतरिक शांति से ही की जा सकती है, जिसकी जिम्मेदारी केवल कानून व्यवस्था बनाने वाली पुलिस पर ही नहीं डाली जा सकती। पुलिस की ताकत भी सभ्य और अहिंसक समाज ही है। अगर सभी हिंसक और कानून तोड़ने वाले हो जाएंगे तो पुलिस किस किस को पकड़ेगी। इसलिए हम सबकी जिम्मेदारी बनती है कि अहिंसक समाज की रचना में अपना योगदान दें। शिक्षा में इन बातों को जोड़ा जाए। सुबह शाम अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने की कोशिश करें। पांच दस साल तक दिए संस्कार आजीवन सही दिशा दिखाते हैं।

शासन तो कुछ मनमानी करने वाले जोरावर किस्म के गैर जिम्मेदार लोगों को नियंत्रित करने के लिए ही बना। इसीलिए सबसे पहले शासन नामक संस्था की नींव पड़ी, जिसकी पहली अभिव्यक्ति कबीले के सरदार के रूप में हुई। फिर छोटे राजे, बड़े रजवाड़ों से होते हुए हम वर्तमान राष्ट्रों तक पंहुचे हैं। कानून हाथ में लेने की जरूरत नहीं है। तकलीफ है तो कानूनी समाधान मांगिए। कानून के रखवाले लापरवाह हो गए हैं और किसी की सुनते नहीं यह बहाना भी ठीक नहीं। इन्हीं संस्थाओं को कार्य कुशल होने के लिए दबाव बनाना पड़ेगा, किन्तु खुद कानून तोड़ने वाला कभी ऐसा दबाव नहीं बना सकता। सभी कानून के जानकार भी नहीं हो सकते, इसलिए कानून जानने की भी जरूरत नहीं है, जो बात और व्यवहार हमें कष्ट देता है वैसा व्यवहार हम दूसरे से न करें. इतना ही हो जाए तो रास्ता सही दिशा की ओर ले जाएगा। गांधी जी इसीलिए अहिंसा द्वारा सुखी और न्यायपूर्ण समाज की रचना की बात करते थे, इसके बिना सभ्य समाज बनाने का और कोई तरीका नहीं है।

कुलभूषण उपमन्यु अध्यक्ष, राष्ट्रीय हिमालय नीति अभियान

Comments

Your email address will not be published.

0