नरसिंह कुमार ‘मयूर’ की ग़ज़ल
हर एक सच की सदा को दबा के देखते हैं,
वो हर सवाल पे तोहमत लगा के देखते हैं।
उठी जब जंगल से हक की सदा तो डर से वो,
हमें डराने को ‘नक्सल’ बना के देखते हैं।
जो शहर, ज्ञान और तर्कों से मांगता है न्याय,
उसे वो ‘अर्बन’ का ठप्पा लगा के देखते हैं।
पढ़े-लिखे नवजवानों की सोच से भयभीत,
‘दिमागी नक्सल’ का तमगा सजा के देखते हैं।
उन्हें नफ़रत है उजाले से, दीप-ऐ-दानिश से,
वो उत्तम मदरसा-व-मकतब गिरा के देखते हैं।
अगर ये उत्तम दिमागों की फ़ौज जग उठी ‘मयूर’ तो,
अपाहिज सोच का अंजाम क्या होगा? ये आज़मा के देखते हैं।
