महेंद्र सिंह टिकैत: किसान, किसान आन्दोलन और भारतीय कृषि-राजनीति की विरासत

महेंद्र सिंह टिकैत: किसान, किसान आन्दोलन और भारतीय कृषि-राजनीति की विरासत

डॉ. रामजीलाल

भारत मूलतः एक कृषि-प्रधान सभ्यता है। कृषि को केवल सकल घरेलू उत्पाद में उसके प्रतिशत से मापना भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज की वास्तविकता को छोटा कर देना होगा। कृषि भोजन, रोजगार, ग्रामीण जीवन, सामाजिक संरचना और करोड़ों परिवारों की आय का आधार है। नवीनतम सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2023–24 में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों का भारत के सकल मूल्य वर्धन में लगभग 18 प्रतिशत योगदान था और आर्थिक सर्वेक्षण ने कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताते हुए लगभग 46 प्रतिशत आबादी के जीवन से इसके संबंध को रेखांकित किया है।

इसीलिए भारत के इतिहास को किसान आंदोलनों के इतिहास से अलग करके नहीं समझा जा सकता। औपनिवेशिक काल के लगान-विरोधी संघर्षों से लेकर स्वतंत्र भारत में फसल के लाभकारी मूल्य, सिंचाई, बिजली, कर्ज, भूमि-अधिग्रहण और कृषि-नीतियों के प्रश्नों तक किसान बार-बार राजनीतिक शक्ति के रूप में सामने आया है।

संगठित किसान राजनीति के इतिहास में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का स्थान विशिष्ट है। उन्होंने महापंचायत को केवल सामाजिक संस्था न रहने देकर किसान शक्ति के आधुनिक राजनीतिक हथियार में बदल दिया। उनका विश्वास चुनावी राजनीति से अधिक किसान की सामूहिक आर्थिक शक्ति में था।

महेंद्र सिंह टिकैत का जन्म 6 अक्टूबर 1935 को मुजफ्फरनगर जिले के सिसौली गांव में हुआ था। उनके पिता चौधरी चौहल सिंह का निधन 1943 में हुआ, तब महेंद्र सिंह की आयु केवल आठ वर्ष थी। इतनी कम आयु में उन्हें बालियान खाप की चौधराहट मिली। मुजफ्फरनगर जिला प्रशासन के आधिकारिक विवरण में भी इस प्रारम्भिक उत्तराधिकार का उल्लेख मिलता है।

उनका यह बचपन आगे के नेतृत्व को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। वे उस ग्रामीण समाज में पले जहां पंचायत सामूहिक विचार-विमर्श और निर्णय की पारंपरिक संस्था थी। उन्होंने इस संस्था को समाप्त नहीं किया; बल्कि उसके सामाजिक अधिकार को किसानों के आर्थिक संघर्ष की शक्ति में बदल दिया।

गौरांग सहाय के समाज शास्त्रीय अध्ययन से स्पष्ट होता है कि 1987–89 में भारतीय किसान यूनियन की पश्चिमी उत्तर प्रदेश में असाधारण लामबंदी के पीछे जाति, बिरादरी, पारंपरिक सांस्कृतिक प्रतीकों और पंचायत जैसी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

भारतीय किसान यूनियन और किसान शक्ति:

1980 के दशक में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरित क्रांति के कारण कृषि तेजी से बाजार से जुड़ चुकी थी। गेहूं और गन्ने की खेती ने किसान को बिजली, नल कूप, खाद, मशीनरी, ऋण, चीनी मिल और सरकारी खरीद व्यवस्था पर निर्भर बना दिया था। इसलिए किसान की समस्या केवल जमीन की नहीं रही; उत्पादन की लागत और उपज के मूल्य के बीच संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया।

इसी परिस्थितियों में महेंद्र सिंह टिकैत भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख नेता बनकर उभरे। भारतीय किसान यूनियन के इतिहास में 1986–87 को उनके नेतृत्व में संगठन के पुनर्गठन का निर्णायक काल माना जाता है।

 बाबा महेंद्र सिंह टिकैत के 1986 से 2011 तक के आंदोलन:

बाबा महेंद्र सिंह टिकैत ने 1986 से 2011 तक किसान राजनीति में अहम भूमिका निभाई। उनका पहला बड़ा आंदोलन 1987 में कमरू खेड़ा पावर हाउस में हुआ, जहाँ उन्होंने बिजली के रेट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। इस आंदोलन में उनकी जीत ने उन्हें जल्द ही मशहूर कर दिया। इसके बाद, टिकैत ने कई बड़े आंदोलनों को लीड किया, जिसमें मेरठ किसान मार्च (फरवरी 1988), राजभर सत्याग्रह (मार्च-जून 1988), दिल्ली बोट क्लब किसान पंचायत (25 अक्टूबर, 1988), फर्टिलाइजर सब्सिडी पंचायत (2 अक्टूबर, 1991), और जुलाई 1990 से जून 1992 तक चली कई लखनऊ पंचायतें शामिल हैं। उनके लीड किए गए दूसरे खास आंदोलनों में गाजियाबाद किसान भूमि अधिग्रहण मुआवजा आंदोलन (सितंबर-अक्टूबर 1993) और दक्कल डाक-बीज आंदोलन (1993) शामिल हैं। टिकैत ने किसी पॉलिटिकल पार्टी की ऑर्गनाइज़ेशनल मशीनरी पर भरोसा किए बिना बड़ी संख्या में किसानों को इकट्ठा किया। 1986 से 2011 तक 25 सालों में, बाबा महेंद्र सिंह टिकैत ने किसानों के लिए जमकर लड़ाई लड़ी, 37 बार जेल गए और 40 कानूनी केस का सामना किया।

 

 A.टिकैत के नेतृत्व वाले प्रमुख किसान आन्दोलन:

 

1.1987 का बिजली आन्दोलन:

 

टिकैत के नेतृत्व का पहला बड़ा किसान संघर्ष कृषि बिजली की दरों को लेकर हुआ। 1987 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने बिजली दरों में वृद्धि का विरोध किया। शामली क्षेत्र के खेड़ी करमू में बड़ी संख्या में किसान एकत्र हुए। आंदोलन ने शीघ्र ही व्यापक रूप ग्रहण कर लिया और सरकार को बिजली दरों के प्रश्न पर पीछे हटना पड़ा।

 

यह संघर्ष केवल बिजली बिल का संघर्ष नहीं था। इसका मूल प्रश्न यह था कि यदि सरकार आधुनिक कृषि, सिंचाई और उत्पादन बढ़ाने की बात करती है, तो उन साधनों की लागत किसान की आय को ही समाप्त नहीं कर सकती। बिजली का प्रश्न इस प्रकार कृषि की आर्थिक व्यवहार्यता का प्रश्न बन गया।

 

2.मेरठ आन्दोलन, 1988:

 

27 जनवरी 1988 को महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों ने मेरठ मंडलायुक्त के कार्यालय का घेराव किया। आंदोलन कुछ दिनों में समाप्त होने के बजाय लगभग 25 दिन तक चला। बड़ी संख्या में किसान वहां डटे रहे। समकालीन रिपोर्टों और बाद के समाज शास्त्रीय अध्ययनों ने इस आंदोलन को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान शक्ति के निर्णायक प्रदर्शन के रूप में दर्ज किया है।

 

इस आंदोलन की विशेषता यह थी कि इसमें पंचायत, सामूहिक निर्णय और लंबे धरने का प्रयोग किया गया। महिलाओं की भागीदारी भी दिखाई दी। एक मुस्लिम किसान हाफिज खलील अहमद को विशाल पंचायत की अध्यक्षता सौंपना भी उल्लेखनीय था। इससे यह संकेत मिलता है कि आर्थिक मुद्दे के आधार पर टिकैत किसान पहचान को जाति और धर्म की सीमाओं से आगे ले जाने का प्रयास कर रहे थे।

 

3.दिल्ली का ऐतिहासिक बोट क्लब आन्दोलन:

 

महेंद्र सिंह टिकैत का नाम राष्ट्रीय किसान राजनीति में सबसे अधिक अक्टूबर 1988 के दिल्ली बोट क्लब आन्दोलन से जुड़ा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित अनेक क्षेत्रों से लाखों किसान दिल्ली पहुंचे। विभिन्न स्रोतों में संख्या अलग-अलग है, लेकिन समकालीन तथा बाद के अध्ययनों में इसे कई लाख किसानों की ऐतिहासिक लामबंदी माना गया है।

 

किसानों की मांगों में कृषि बिजली की दरों में राहत, गन्ने का लाभकारी मूल्य, कृषि बकायों में राहत और अन्य कृषि आर्थिक समस्याएं शामिल थीं। भारतीय किसान यूनियन का 35 सूत्रीय मांग-पत्र उस समय के व्यावसायिक किसान की आर्थिक समस्याओं का व्यापक दस्तावेज था।

 

इस आंदोलन का राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव बहुत बड़ा था। बैलगाड़ियां, ट्रैक्टर, पशु, हुक्का, चूल्हे और गांव का जीवन दिल्ली के सत्ता-केंद्र में दिखाई देने लगा। किसानों ने यह प्रतीकात्मक संदेश दिया कि भारत की राजधानी और नीति-निर्माता उस ग्रामीण भारत से अलग नहीं हैं जो देश के लिए भोजन पैदा करता है।

 

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के एक आधुनिक अध्ययन ने 1988 के इस आंदोलन को हरित क्रांति के बाद उभरती किसान राजनीति के महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा है। अध्ययन के अनुसार किसान राजनीति का केंद्र भूमि और जमींदारी के पुराने प्रश्नों से हटकर कृषि मूल्य, बिजली, खाद और राज्य द्वारा निर्धारित उत्पादन की आर्थिक शर्तों की ओर बढ़ चुका था।

 

B.टिकैत के अन्य प्रमुख किसान आन्दोलन:

 

टिकैत का संघर्ष 1988 पर समाप्त नहीं हुआ। 1990 में लखनऊ किसान पंचायत में बड़ी संख्या में किसान जुटे। गन्ने के अधिक मूल्य और बिजली बकायों में भारी राहत की मांग प्रमुख थी।

 

1991 में दिल्ली किसान पंचायत में खाद सब्सिडी का प्रश्न उठाया गया। 1992 में लखनऊ में फिर किसान पंचायत आयोजित की गई, जिसमें खाद की कीमतों और बिजली दरों में वृद्धि का विरोध हुआ। भूमि-अधिग्रहण के मामले में किसानों को उचित मुआवजा दिलाने के लिए गाजियाबाद क्षेत्र में भी आंदोलन किया गया।

 

इस प्रकार टिकैत के आंदोलनों का विस्तार बिजली से गन्ने, खाद, पानी, कर्ज, भूमि-मुआवजा और कृषि लागत तक हुआ। किसान की आर्थिक समस्याओं को उन्होंने अलग-अलग मुद्दों के रूप में नहीं, बल्कि कृषि संकट की परस्पर जुड़ी हुई कड़ियों के रूप में देखा।

 

टिकैत की राजनीति की विशेषता:

 

महेंद्र सिंह टिकैत की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण तत्व था गैर-दलीय किसान राजनीति। वे राजनीतिक दलों से दूरी रखते थे क्योंकि उनका मानना था कि यदि किसान संगठन किसी पार्टी से जुड़ जाएगा तो वह उसी पार्टी की नीतियों की आलोचना करने में कमजोर पड़ सकता है।

 

उनकी भाषा सरल थी, पहनावा ग्रामीण था और हुक्का उनकी पहचान का हिस्सा बन गया था। लेकिन यह सादगी केवल व्यक्तिगत शैली नहीं थी; यह उनकी राजनीतिक वैधता का आधार बन गई। किसान उन्हें अपने बीच का व्यक्ति समझता था।

 

फिर भी टिकैत की विरासत का आलोचनात्मक मूल्यांकन आवश्यक है। शोध से पता चलता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना, विशेषकर जाट कृषक समाज की शक्ति, BKU की लामबंदी का महत्वपूर्ण आधार थी। दूसरी ओर, आर्थिक प्रश्नों के केंद्र में आने पर आंदोलन धार्मिक और सामाजिक सीमाओं को पार करने में भी सक्षम हुआ। सहाय का अध्ययन यह भी बताता है कि जब संगठन अधिक राजनीतिक और चुनावी दिशा में गया तो उसकी पुरानी संगठनात्मक शक्ति कमजोर हुई।

 

अतः टिकैत की विरासत को केवल महिमा मंडित करने के बजाय उसकी जटिलताओं को समझना अधिक शैक्षणिक दृष्टि से उचित है।

 

निधन और विरासत:

 

महेंद्र सिंह टिकैत का निधन 15 मई 2011 को मुजफ्फरनगर में लंबी बीमारी के बाद हुआ। उस समय उनकी आयु 76 वर्ष थी।

 

उनकी वास्तविक विरासत किसी एक मांग या समझौते में नहीं है। उनकी सबसे बड़ी देन यह थी कि उन्होंने किसान को उसकी सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति का अहसास कराया।

 

उनकी विरासत के प्रमुख तत्व हैं—किसान एकता, लाभकारी मूल्य, उत्पादन लागत में राहत, बिजली और सिंचाई, कर्ज से मुक्ति, गन्ने का उचित मूल्य, भूमि के उचित मुआवजे और सरकार से सीधी बातचीत।

 

राकेश टिकैत और 2020–21 का किसान आन्दोलन:

 

महेंद्र सिंह टिकैत के बाद उनके पुत्र नरेश टिकैत और राकेश टिकैत किसान राजनीति में सक्रिय रहे। राकेश टिकैत ने आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान बनाई। वे पहले दिल्ली पुलिस में कार्यरत रहे, लेकिन बाद में किसान आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गए।

 

उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा 2020–21 के किसान आंदोलन में हुई। तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और देश के अन्य क्षेत्रों के किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर लंबा आंदोलन किया। गाजीपुर सीमा पर राकेश टिकैत प्रमुख चेहरा बनकर उभरे।

 

26 जनवरी 2021 की घटनाओं के बाद आंदोलन संकट में दिखाई दे रहा था। लेकिन 28 जनवरी को राकेश टिकैत की भावनात्मक अपील ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को फिर से लामबंद कर दिया। गाजीपुर सीमा पर आंदोलन को नया जीवन मिला। अंततः नवंबर 2021 में केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की।

 

शैक्षणिक अध्ययनों ने 2020–21 के आंदोलन को केवल तीन कानूनों के विरोध के रूप में नहीं, बल्कि ग्रामीण राजनीतिक पहचान के पुनरुत्थान के रूप में देखा है। सतेंद्र कुमार के अनुसार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान पहचान फिर मजबूत हुई और विभिन्न सामाजिक वर्गों तथा किसान-मजदूर समूहों के बीच नए गठजोड़ बने। जेन्स लेर्चे ने इस आंदोलन का विश्लेषण वर्ग, जाति, लिंग और कृषि के बदलते आर्थिक ढांचे के संदर्भ में किया है।

 

इस दृष्टि से महेंद्र सिंह टिकैत और राकेश टिकैत के बीच संबंध केवल पिता-पुत्र का संबंध नहीं है। यह दो पीढ़ियों की किसान राजनीति के बीच ऐतिहासिक निरंतरता है। पिता की पीढ़ी ने बिजली, गन्ना मूल्य और कृषि बकायों का प्रश्न उठाया; पुत्र की पीढ़ी ने MSP, कृषि बाजार, निजी कॉरपोरेट भागीदारी और कृषि कानूनों के प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया।

 

आज की प्रासंगिकता:

 

आज किसान के सामने समस्याएं और अधिक जटिल हैं—जलवायु परिवर्तन, छोटी होती जोतें, बढ़ती उत्पादन लागत, कर्ज, अस्थिर बाजार, भूजल संकट, कॉरपोरेट एकाग्रता, मशीनरी, ग्रामीण युवाओं का पलायन और खेती के भविष्य का प्रश्न।

 

इसलिए आज की किसान राजनीति को केवल गन्ना मूल्य या बिजली दरों तक सीमित नहीं किया जा सकता। उसे छोटे और सीमांत किसानों, खेत मजदूरों, महिला किसानों, आदिवासी कृषकों, बटाईदारों और अन्य ग्रामीण उत्पादकों को साथ लेकर चलना होगा। लाभकारी मूल्य के साथ टिकाऊ कृषि, सिंचाई, सस्ता संस्थागत ऋण, सामाजिक सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और आधुनिक तकनीक तक समान पहुंच भी आवश्यक है।

 

महेंद्र सिंह टिकैत की सबसे बड़ी ऐतिहासिक शिक्षा यही है कि किसान सरकार की नीतियों का केवल प्राप्तकर्ता नहीं है; वह नीति-निर्माण को प्रभावित करने वाला संगठित नागरिक भी हो सकता है।

 

6 अक्टूबर को उनकी जयंती पर उन्हें याद करने का सबसे सार्थक तरीका केवल “बाबा टिकैत” को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस अधूरे प्रश्न को फिर से उठाना है जिसे उनके आंदोलनों ने भारतीय लोकतंत्र के सामने रखा था:

 

यदि किसान देश के लिए अन्न पैदा करता है और भारतीय अर्थव्यवस्था के इतने बड़े हिस्से को सहारा देता है, तो कृषि से जुड़े आर्थिक निर्णयों में किसान की आवाज इतनी कमजोर क्यों हो?

 

सिसौली से मेरठ, मेरठ से दिल्ली के बोट क्लब और फिर गाजीपुर तक की यात्रा केवल एक परिवार या संगठन की कहानी नहीं है। यह भारतीय किसान की उस दीर्घ यात्रा की कहानी है जिसमें वह उत्पादक से नागरिक, नागरिक से संगठित शक्ति और संगठित शक्ति से नीति-निर्माण के दावेदार के रूप में विकसित हुआ है।

 

महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत का सार यही है—किसान की आर्थिक शक्ति को उसकी सामाजिक एकता और लोकतांत्रिक आवाज में बदलना।

 

डॉ. रामजीलाल, सामाजिक वैज्ञानिक और पूर्व प्रिंसिपल, दयाल सिंह कॉलेज, करनाल (हरियाणा, भारत)

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