युद्ध केवल संबंधित देशों की समस्या नहीं

सम सामयिक

युद्ध केवल संबंधित देशों की समस्या नहीं

शीतल पी सिंह

 

युद्ध अब केवल सीमाओं, सैनिकों और हथियारों का मामला नहीं रह गया है। दुनिया के किसी एक हिस्से में मिसाइल चलती है तो उसकी कीमत हजारों किलोमीटर दूर बैठा वह परिवार भी चुकाता है, जिसका उस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं। किसी बंदरगाह पर हमला होता है तो जहाज का रास्ता बदलता है; जहाज का रास्ता बदलता है तो तेल, खाद्यान्न और खाद की ढुलाई महंगी होती है; फिर महंगाई, बेरोजगारी और भूख का नया चक्र शुरू हो जाता है।

इस समय सबसे चिंताजनक स्थिति सऊदी अरब और यमन के आसपास बन रही है। 2022 के युद्धविराम के बाद जिस यमनी गृहयुद्ध को कुछ हद तक शांत मान लिया गया था, वह फिर उग्र हो गया है। ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने यमन के पश्चिमी तट पर अपनी स्थिति मजबूत की है और सऊदी अरब के भीतर मिसाइल तथा ड्रोन हमलों की क्षमता दिखाई है। Abha, Khamis Mushait और Jazan जैसे दक्षिणी सऊदी शहर पहले भी हमलों की चपेट में आते रहे हैं, लेकिन अब खतरे का दायरा Jeddah, Taif, Yanbu और Al-Ula जैसे अपेक्षाकृत भीतर के क्षेत्रों तक फैलता दिख रहा है।

18 सितंबर की रात सऊदी Civil Defence ने Jeddah, Taif, Khamis Mushait और Al-Ula सहित कई क्षेत्रों में संभावित खतरे की चेतावनी जारी की और लोगों से सतर्क रहने को कहा। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि चेतावनी जारी होना अपने-आप में इन सभी शहरों पर सफल हमला होने का प्रमाण नहीं है। फिर भी इतने विस्तृत क्षेत्र में एक साथ चेतावनी जारी होना बताता है कि सऊदी सुरक्षा प्रतिष्ठान खतरे को कितना गंभीर मान रहा है। इससे पहले Abha, Khamis Mushait और Jazan पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की पुष्टि हो चुकी है तथा आग लगने और दर्जनों लोगों के घायल होने की खबरें आई थीं।

सबसे गंभीर पहलू सऊदी तेल व्यवस्था पर बढ़ता हमला है। सऊदी अरब के पूर्वी तेल क्षेत्रों को लाल सागर के Yanbu बंदरगाह से जोड़ने वाली East-West pipeline उसकी ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ है। इसका महत्व इसलिए और बढ़ गया था क्योंकि फारस की खाड़ी और Hormuz जलडमरूमध्य पहले से असुरक्षित हो चुके हैं। लेकिन हाल के ड्रोन हमले में इस पाइपलाइन के तीन pumping stations क्षतिग्रस्त हुए और Yanbu से तेल की सामान्य आवाजाही अस्थायी रूप से बाधित हुई। इसके बाद Saudi Aramco को अक्टूबर में कुछ यूरोपीय रिफाइनरियों को दी जाने वाली कच्चे तेल की खेप रोकनी पड़ी। रिपोर्टों के अनुसार पाइपलाइन को पूरी क्षमता पर लौटने में छह सप्ताह तक लग सकते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि सऊदी अरब की तेल व्यवस्था समाप्त हो गई है। उसके पास वैकल्पिक मार्ग, विशाल भंडार और मरम्मत की बड़ी क्षमता है। लेकिन खतरा यह है कि पूर्व में Hormuz और पश्चिम में लाल सागर—दोनों प्रमुख मार्ग एक साथ असुरक्षित हो रहे हैं। लाल सागर के दक्षिण में Bab-el-Mandeb से होकर यूरोप और एशिया के बीच बड़ी मात्रा में तेल, कंटेनर और खाद्यान्न गुजरते हैं। इस मार्ग पर असुरक्षा बढ़ने पर जहाजों को अफ्रीका के Cape of Good Hope से घूमना पड़ता है। इससे यात्रा लंबी, बीमा महंगा और मालभाड़ा अधिक हो जाता है।

युद्ध का पहला बड़ा शिकार फिर यमन ही बन रहा है। संयुक्त राष्ट्र की International Organization for Migration के अनुसार हाल की लड़ाई से यमन में कम-से-कम 1,12,000 लोग अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं। करीब 3,000 लोग जान जोखिम में डालकर भीड़ भरी नौकाओं में Djibouti पहुंचे हैं। जिस देश की स्वास्थ्य, जल और खाद्य व्यवस्था वर्षों के युद्ध से पहले ही टूट चुकी हो, वहां एक नया सैन्य दौर भूख और बीमारियों को कई गुना बढ़ा सकता है।

लेकिन संकट यमन और सऊदी अरब तक सीमित नहीं है। यूक्रेन युद्ध ने अनाज, खाद और ऊर्जा बाजार को वर्षों से अस्थिर कर रखा है। सूडान में लगभग दो करोड़ लोग भूख का सामना कर रहे हैं। गाजा, अफगानिस्तान, साहेल और अफ्रीका के कई क्षेत्रों में युद्ध, सूखा और सहायता में कटौती एक साथ लोगों को संकट में धकेल रहे हैं। World Food Programme के अनुसार दुनिया में लगभग 26.6 करोड़ लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा से गुजर रहे हैं। संस्था 83 देशों में दस करोड़ से अधिक लोगों तक सहायता पहुंचाती है, लेकिन आर्थिक संसाधन इतने कम हैं कि सभी जरूरतमंदों की मदद संभव नहीं हो पा रही।

महंगे तेल का असर हवाई यात्रा पर भी दिखाई देने लगा है। American Airlines ने केवल चौथी तिमाही में ईंधन खर्च करीब एक अरब डॉलर बढ़ने का अनुमान लगाया है। American, United और Southwest जैसी कंपनियां कम लाभ वाले मार्गों और प्रस्तावित उड़ानों में कटौती पर विचार कर रही हैं। उड़ानें घटेंगी तो टिकट महंगे होंगे, पर्यटन प्रभावित होगा और उन देशों की आय घटेगी जो पर्यटन तथा विदेशों में काम करने वाले नागरिकों पर निर्भर हैं।

भारत भी इस संकट से अछूता नहीं रह सकता। हमारा अधिकांश कच्चा तेल आयात होता है। तेल महंगा होने पर केवल पेट्रोल और डीजल नहीं महंगे होते—ट्रक भाड़ा, विमान किराया, खाद, खेती, बिजली उत्पादन, प्लास्टिक, दवाएं और रोजमर्रा की लगभग हर वस्तु प्रभावित होती है। सरकार यदि कर घटाकर पूरा बोझ अपने ऊपर नहीं लेती तो अंततः इसका बड़ा हिस्सा उपभोक्ता को चुकाना पड़ता है। छोटे ट्रांसपोर्टर, किसान, मजदूर और निम्न-मध्यवर्ग सबसे पहले और सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

दुनिया अभी तत्काल सभ्यता-विनाश के मुहाने पर खड़ी है, ऐसा कहना अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि ये युद्ध केवल संबंधित देशों की समस्या हैं। अलग-अलग दिखाई देने वाले युद्ध अब ऊर्जा, समुद्री मार्ग, खाद्यान्न, उर्वरक, विमानन और मानवीय सहायता के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ गए हैं। युद्ध के फैसले सरकारें और सेनाएं करती हैं, हथियार कंपनियां मुनाफा कमाती हैं, लेकिन कीमत वह आम नागरिक चुकाता है जो कहीं अपनी रोटी खोता है, कहीं अपना घर, कहीं रोजगार और कहीं पूरा भविष्य।

शीतल पी सिंह के फेसबुक वॉल से साभार

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