लघु कथा
हक़ किसका?
डॉ रीटा अरोड़ा
“सुनीता, तेरी बहू कैसी है?”
“हक़ की बात खूब करती है।”
“और जिम्मेदारी?”
“वो उसकी नहीं।”
“घर में हाथ बँटाती है?”
“कहती है—‘मैं नौकरानी नहीं हूँ।’”
“बात तो सही है।”
“बिल्कुल। मैं भी नहीं चाहती वो नौकरानी बने।”
“फिर दिक्कत क्या है?”
“बस… परिवार का हिस्सा भी तो बने।”
“वो क्या कहती है?”
“‘मेरी जिंदगी, मेरे फैसले।’”
“और परिवार?”
“उसका जवाब नहीं।”
दूसरी महिला कुछ देर चुप रही।
“सुनीता, बहू को हक़ तो मिलना चाहिए।”
“मैं कब मना करती हूँ?”
“फिर?”
“बस, जिम्मेदारी भी समझे।”
“और तू?”
“मैं क्या?”
“तू उसकी जिंदगी में कितना दखल देती है?”
सुनीता चुप हो गई।
उसी वक्त अंदर से आवाज़ आई-
“माँ! मेरी चाय बना दी?”
सुनीता उठने लगी।
दरवाजे तक पहुँचकर रुकी।
दूसरी महिला ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“बैठ… आज चाय मैं बनाती हूँ।”
दोनों रसोई की ओर देखने लगीं।
अंदर बहू मोबाइल पर व्यस्त थी।
चूल्हे पर रखा दूध धीरे-धीरे उबलकर नीचे गिरने लगा।
सुनीता की नजर चूल्हे पर थी… और दूसरी महिला की नजर सुनीता पर।
