व्यक्तिवाद का विष: ‘मैं’ ने निगल लिया ‘हम’ को
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अधिकार तो सीख लिए… लेकिन रिश्ते निभाना भूल गए
डॉ रीटा अरोड़ा
*अधिकार तो सीख लिए… लेकिन रिश्ते निभाना भूल गए
आधुनिक समाज ने व्यक्ति को अभूतपूर्व स्वतंत्रता दी है। शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता, व्यक्तिगत अधिकार और अभिव्यक्ति की आज़ादी ने लोगों को अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने की शक्ति प्रदान की है। यह परिवर्तन आवश्यक भी था, क्योंकि सदियों तक समाज के कई वर्ग, विशेषकर महिलाएँ, सामाजिक दबावों और आर्थिक निर्भरता के कारण अपनी इच्छाओं और पहचान को दबाकर जीवन जीने को मजबूर थे।
लेकिन हर परिवर्तन अपने साथ एक खतरा भी लेकर आता है। आज वही स्वतंत्रता धीरे-धीरे व्यक्तिवाद (Individualism) में बदलती दिखाई दे रही है, जहाँ “हम” की जगह “मैं” ने ले ली है। परिणामस्वरूप परिवारों की संरचना कमजोर हो रही है, रिश्तों में स्थिरता कम हो रही है और समाज भावनात्मक रूप से विखंडित होता जा रहा है।
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता सामूहिकता रही है। यहाँ व्यक्ति केवल स्वयं तक सीमित नहीं था, बल्कि परिवार, समाज और रिश्तों से जुड़ा हुआ था। “हम” की भावना व्यक्ति को जिम्मेदारी, धैर्य और त्याग का बोध कराती थी। संयुक्त परिवार केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं थे; वे भावनात्मक सुरक्षा के केंद्र थे।
आज यह संरचना तेजी से टूट रही है।
आधुनिक शिक्षा और कॉर्पोरेट संस्कृति ने व्यक्ति को प्रतिस्पर्धी बनाया है। बचपन से ही युवाओं को सिखाया जाता है कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण उनकी व्यक्तिगत सफलता है। बेहतर करियर, अधिक वेतन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और “अपनी शर्तों पर जीवन” को आधुनिक उपलब्धि माना जाने लगा है। इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब रिश्ते भी केवल “व्यक्तिगत सुविधा” के आधार पर देखे जाने लगते हैं।
आज कई युवा रिश्तों को जिम्मेदारी नहीं, बल्कि विकल्प की तरह देखने लगे हैं। यदि रिश्ता उनकी अपेक्षाओं के अनुसार नहीं चलता, तो उसे छोड़ देना आसान समाधान माना जाता है। “Adjust क्यों करें?” और “मैं क्यों झुकूँ?” जैसी सोच धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है।
यही कारण है कि तलाक, अलगाव और पारिवारिक टूटन के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।
विशेष चिंता का विषय यह है कि आज अधिकारों की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन कर्तव्यों की बात कम होती है। हर व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है, लेकिन रिश्तों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को लेकर उतना संवेदनशील नहीं दिखता।
उदाहरण के लिए, आर्थिक स्वतंत्रता महिला सशक्तीकरण की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। इससे महिलाओं को आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता मिली है। लेकिन जब आर्थिक स्वतंत्रता रिश्तों में सहयोग के बजाय अहंकार का कारण बनने लगे, तब समस्या पैदा होती है। “मुझे किसी की जरूरत नहीं” जैसी मानसिकता रिश्तों को साझेदारी के बजाय शक्ति संघर्ष में बदल देती है।
यह समस्या केवल महिलाओं या पुरुषों तक सीमित नहीं है। पुरुषों में भी अहंकार, नियंत्रण की प्रवृत्ति और संवेदनहीनता बढ़ी है। आधुनिक व्यक्तिवाद ने दोनों पक्षों को अधिक आत्मकेंद्रित बना दिया है। परिणाम यह हुआ कि रिश्तों में संवाद और सहनशीलता कम होती गई।
सोशल मीडिया ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। आज लोग दूसरों की “परफेक्ट” जिंदगी देखकर अपने रिश्तों की तुलना करने लगते हैं। हर व्यक्ति अपने जीवन का केवल चमकदार हिस्सा दिखाता है, लेकिन देखने वाला उसे पूरी सच्चाई मान बैठता है। इससे असंतोष और अवास्तविक अपेक्षाएँ बढ़ती हैं।
न्यूक्लियर फैमिली ने भी समाज की संरचना बदल दी है। संयुक्त परिवारों में बुजुर्ग एक संतुलनकारी भूमिका निभाते थे। वे अनुभव और धैर्य से छोटे विवादों को बढ़ने से रोक लेते थे। आज पति-पत्नी अक्सर अकेले संघर्ष कर रहे हैं। उनके पास सलाह देने वाला, समझाने वाला और भावनात्मक सहारा देने वाला कोई नहीं होता।
इसका सबसे गहरा असर बच्चों पर पड़ रहा है। जिन घरों में निरंतर तनाव, अलगाव और अहंकार का वातावरण होता है, वहाँ बच्चे भावनात्मक असुरक्षा के साथ बड़े होते हैं। वे रिश्तों को अस्थायी मानने लगते हैं। धीरे-धीरे उनके भीतर धैर्य और सहनशीलता कम होने लगती है।
समाज के लिए यह एक चेतावनी है। यदि आने वाली पीढ़ियाँ केवल अधिकार सीखेंगी और कर्तव्य नहीं, तो भविष्य में परिवार केवल कानूनी व्यवस्था बनकर रह जाएँगे, भावनात्मक संस्था नहीं।
इसका समाधान आधुनिकता का विरोध नहीं है। समाज को पीछे लौटाना न संभव है और न ही आवश्यक। आवश्यकता संतुलन बनाने की है।
युवाओं को यह समझना होगा कि स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता नहीं है। आत्मनिर्भरता का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति रिश्तों से ऊपर हो जाए। रिश्तों में बराबरी जरूरी है, लेकिन बराबरी का अर्थ संघर्ष नहीं, सहयोग होना चाहिए।
हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि रिश्ते केवल अधिकारों से नहीं चलते। उन्हें धैर्य, संवाद, त्याग और जिम्मेदारी की आवश्यकता होती है। हर असहमति अलगाव का कारण नहीं होती; कई बार रिश्ते समय और समझ से मजबूत बनते हैं।
यदि समाज ने समय रहते इस बढ़ते व्यक्तिवाद पर नियंत्रण नहीं किया तो आने वाली पीढ़ियों के पास आधुनिक सुविधाएँ तो होंगी, लेकिन भावनात्मक सुरक्षा नहीं। बड़े घर होंगे, लेकिन उनमें अपनापन कम होगा।
अंततः, सभ्यता केवल तकनीकी प्रगति से नहीं बचती; वह रिश्तों की मजबूती से बचती है। और जब “मैं” पूरी तरह “हम” को निगल लेता है, तब समाज धीरे-धीरे भीतर से खोखला होने लगता है।
*अधिकारों की लड़ाई में अगर रिश्ते हार गए,*
*तो आने वाली पीढ़ियों के पास सुविधाएँ होंगी… परिवार नहीं।*
