कविता
फिजा का मिजाज बदलने लगा है
अनुपम शर्मा
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फिजा का मिजाज बदल रहा है
हवाओं में कुछ नए विचार
महकने लगे हैं।
उनकी कोशिश थी कि
सारे फूल एकरंगी हों
पर जहां में बाग सतरंगी
खिलने लगे हैं।
जो आए थे पकड़ उंगली
भगवान की
अब उनके नकाब
उतरने लगें हैं।

जो सिखा रहे थे हमें
नए-नए मंत्रों के उच्चारण
अब उन्हीं के खिलाफ
नए-नए नारे लगने लगे हैं।
जिन्होंने बांट रखी थी धरती
जाति और मज़हब के नाम पर
अब उनकी दीवारों में
दरारों के निशान दिखने लगें हैं।
जिन्होंने कहा था –
“सवाल मत करो बस हमारी सुनो”
अब उन्हीं के किए पर
सवाल उठने लगे हैं।
ख़ामोशी को उन्होंने
अपनी ताकत समझ लिया था
मगर दबे हुए लफ्ज़
अब आवाज़ करने लगे हैं।
फिजा का मिजाज बदल रहा है
हवाओं में कुछ नए विचार
महकने लगे हैं।
