सामाजिक सरोकार
आंदोलनकारी लड़कियों की भाषाई तमीज़ का सवाल
राजकुमार कुम्भज
जंतर-मंतर पर आंदोलनकारी लड़कियों की भाषाई तमीज़ और सामाजिक मर्यादा का सवाल उठाने का अभिप्राय ये नहीं समझा जाना चाहिए कि प्रश्नकर्ता आंदोलन विरोधी हैं.समर्थक हैं तो क्या सवाल नहीं पूछ सकते हैं? मगर हाँ ॳॅंधभक्त होना दीग़र मामला है.
एशियन गेम्स की सफलता से हरेक भारतीय उत्साहित व प्रसन्न हो रहा है.
प्रसन्नता इस बात की भी है कि खेल का मैदान हो,चाहे शिक्षा की सीढ़ियाॅं,सभी क्षेत्रों में लड़़कियाॅं आगे चल रही हैं,लेकिन राजनीतिक-सत्ता के क्षेत्र में पिछली सीट पर हैं.अगर कुछ क्षेत्रों में लड़़कियाॅं पिछली सीट पर चल रही हैं,तो ये सवाल विचारणीय है,जबकि देश में सभी को एक समान अधिकार प्राप्त हैं.
समान अधिकार प्राप्त होने से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि लड़कियाॅं पिछली सीट पर क्यों हैं? क्या सिर्फ़ भाषाई तमीज़ और सामाजिक मर्यादा को कोई बड़ा कारण माना जा सकता है?
चाहते हुए और नहीं चाहते हुए के मौलिक द्वंद्व में कभी-कभार पीछे-पीछे चलने के यथास्थितिवादी यथार्थ को स्वीकार कर लेने की मन: स्थिति के पीछे क्या कुछ हो सकता है?
यथास्थितिवादी व्यवस्था के व्यापक स्वीकार का निर्णय क्या लड़कियों का अपना निर्णय हो सकता है?

लड़कियों को शायद ऐसा लग रहा है कि पर्याप्त शिक्षित और योग्य होने के बाबजूद उन्हें भिखारी जैसा समझकर कुछ देने की कल्पनाशीलता अपनाई जा रही है!
अन्यथा नहीं है कि दोयम दर्ज़े की व्यवहार-कुशल व्यवस्था के विरुद्ध लड़कियों में अपार गुस्सा दिखाई दे रहा है?
किन्तु खेद का विषय है कि जंतर-मंतर की आंदोलनकारी लड़कियाॅं,विरोध में विषयोचित भाषा के अभाव की वज़ह से आकस्मिकतौर पर पिछड़ रही हैं.
आश्चर्यजनक स्थिति तो यहाॅं तक दिखाई दे रही है कि उनके समर्थकों में भी सहमति और सहानुभूति की बजाय कुछ प्रखर मतभेद उभर रहे हैं.
अनुशासन को दकियानूसी क़रार देते हुए ख़ारिज़ किया जा सकता है,जो कि किया जाता रहा है,किन्तु कौन नहीं जानता है कि क़ानून तोड़ने की सामूहिकता से क्राॅंति का जन्म होता है?
देखना ये भी होगा कि अनुशासन तोड़ा जा सकता है,किन्तु मर्यादा स्वत:अपनाई जाती है.गाली-गलौच की कुत्सित मानसिकता से आख़िर इस आंदोलन का क्या लेना-देना हो सकता है?आशय पूछना आपराध नहीं होना चाहिए.
भूलना नहीं चाहिए कि भाषा की तमीज़ से आदमी के क़द और मद का पता मिलता है.
किसी आंदोलन में लड़कियों का शामिल होना बहुत पहले कभी वर्जित अथवा अप्रत्यक्षतौर पर अपवाद हुआ करता था,किन्तु अति प्रसन्नता का विषय है कि अब तो लड़कियाँ खुल्लमखुल्ला आगे बढ़कर ख़ुद नेतृत्व कर रही हैं.
देश और काल की सीमाओं का कोई ज़ोर नहीं हो रहा है और धीरे-धीरे हिम्मतें बढ़ रही हैं.
राजनीतिक-सत्ता के केंद्र में भी धीरे-धीरे लड़कियाँ आगे आ रही हैं और सफलतापूर्वक अपनी जगह ख़ुद तय कर रही हैं.
लड़कियाँ दुनिया भर में परिवर्तन ला रही हैं और अनुकरणीय उदाहरण बन-बनाकर ला रही हैं.
ये क्या कुछ कम क्राँतिकारी तलाश है कि राजनीतिक परिवर्तन के साथ ही साथ लड़कियों द्वारा सामाजिक परिवर्तन की भी नई-नई पटकथाऍं लिखी जा रही हैं?
सफलताऍं और प्रशॅंसाऍं आगे वाँछित स्वागत-सत्कार के लिए उत्सुकता से तैयार व आतुर हैं.
जंतर-मंतर पर आ-जा रही आंदोलनकारी तथा क्राँति-कामी लड़कियों को रोकने का कोई कारण और मतलब नहीं है.ये सोचना अकारण नहीं है कि यहाँ पुलिस की उपस्थिति समूचे वातावरण को असामान्य बना रही है.
परिवर्तन प्रकृति की अनिवार्यता है,किन्तु भाषाई तमीज़ और सामाजिक मर्यादा को किंचित् अपने आंदोलन से जोड़ लेने में कोई बुराई भी तो नहीं है?
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