लघु कथा
लोग क्या कहेंगे… और लोग क्या करेंगे?
~ डॉ रीटा अरोड़ा
“पापा, नौकरी छोड़कर अपना काम शुरू करना चाहता हूँ।”
“तो कर न बेटा!”
“इतना आसान नहीं है पापा। काम नहीं चला तो लोग क्या कहेंगे?”
“अच्छा, नुकसान हुआ तो कौन उठाएगा?”
“मैं ही उठाऊँगा।”
“फिर लोगों की इतनी फिक्र क्यों?”
“पापा, समाज में रहना है। सबके सामने शर्मिंदा तो नहीं हो सकते!”
पिता कुछ पल चुप रहे।
“बेटा, याद है जब मेरी नौकरी चली गई थी?”
“हाँ पापा, घर की हालत बहुत खराब थी।”
“तब तेरी माँ ने अपने कंगन बेचे थे। लेकिन एक बात तुझे नहीं पता। उस दिन घर में आटा तक नहीं था। तेरी माँ खुद भूखी सो गई थी।”
“क्या? माँ ने कभी बताया ही नहीं!”
बेटे की आँखें भर आईं।
“और जिन लोगों की बातों से हम डरते थे, उनमें से कोई एक किलो आटा लेकर भी नहीं आया।”
“पापा, फिर आप उनकी इतनी परवाह क्यों करते रहे?”
“बस बेटा, वही गलती तू मत करना।”
“तो किसी की न सुनूँ?”
“सुन सबकी, बेटा! लेकिन अपनी ज़िंदगी का रिमोट कंट्रोल दूसरों के हाथ में मत देना।”
“और हार गया तो?”
पिता ने उसका हाथ थाम लिया।
“तो घर लौट आना बेटा। यहाँ तेरी हार का हिसाब नहीं, तेरा इंतज़ार होगा।”
फिर धीरे से बोले-
“लोग उँगली उठाने आएँगे, तेरे हिस्से का बोझ उठाने नहीं।”
