एक धुंधली खामोशी

एक धुंधली खामोशी

रोहन कुरैशी

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार, भाषाई विविधता के मामले में पापुआ न्यू गिनी, इंडोनेशिया और नाइजीरिया के बाद भारत चौथे स्थान पर है। 2011 की जनगणना में, भारत में 19,500 से अधिक भाषाएँ और बोलियाँ दर्ज की गई थीं।

हालाँकि, भारत एक बड़े भाषाई संकट से गुजर रहा है। अनुमान बताते हैं कि पिछले छह दशकों में भारत ने 250 से अधिक भाषाएँ खो दी हैं, जबकि यूनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को ‘खतरे में’ (endangered) माना है, जिनकी स्थिति ‘कम खतरे’ (vulnerable) से लेकर ‘गंभीर रूप से खतरे’ (critically endangered) तक है। भाषाविदों ने चेतावनी दी है कि अगर भाषाओं के खत्म होने का यह सिलसिला जारी रहा, तो अगले 50 वर्षों के भीतर लगभग 400 भारतीय भाषाएँ—जो देश की कम बोली जाने वाली भाषाओं का आधे से अधिक हिस्सा हैं—पूरी तरह विलुप्त हो सकती हैं।

सिक्किम की माझी भाषा 2016 में अपने अंतिम ज्ञात बोलने वाले की मृत्यु के साथ विलुप्त हो गई। त्रिपुरा की सैमार भाषा को बोलने वाले लोगों की संख्या 2012 में केवल चार रह गई थी, जबकि तीन साल पहले यह संख्या 25 थी। तमिलनाडु की टोडा, झारखंड की बिरहोर, असम की ऐटोन, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की निहाली, तथा उत्तराखंड की राजी जैसी कई मूल भाषाएँ विलुप्त होने की कगार पर हैं।

किसी भाषा को जीवित रखने में राज्य की भूमिका को जम्मू-कश्मीर की डोगरी भाषा के उदाहरण से बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। जहाँ घाटी में कश्मीरी भाषा को अधिक संस्थागत समर्थन मिला है—जिसमें संविधान की आठवीं अनुसूची में इसे शामिल करना और स्कूलों में आठवीं कक्षा तक इसे अनिवार्य रूप से पढ़ाना शामिल है—वहीं जम्मू में व्यापक रूप से बोली जाने वाली डोगरी को 2003 में आठवीं अनुसूची में तो शामिल किया गया, लेकिन इसे संस्थागत उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही के एक सर्वेक्षण के अनुसार, डोगरी भाषा को पढ़ने और लिखने में सक्षम लोगों की संख्या में काफी कमी आई है। डोगरी का उदाहरण यह दिखाता है कि हालाँकि संवैधानिक मान्यता से भाषा को वैधता तो मिलती है, लेकिन भाषाएँ तब जीवित रहती हैं जब सरकारें उन्हें कक्षाओं और रोज़मर्रा के जीवन में लगातार जगह देती हैं।

डिजिटल क्षेत्र पर अंग्रेजी के वर्चस्व को बढ़ाने और भाषाई साम्राज्यवाद को बढ़ावा देने का आरोप तो लगता ही है, लेकिन इसमें भाषाई और जातीय लचीलेपन को मजबूत करने की भी काफी संभावनाएं हैं। इस दिशा में सबसे आशाजनक साधनों में से एक ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) है।

भारत में, AI-आधारित पहलें उन भाषाओं के लिए नए डिजिटल स्थान बना रही हैं, जिन्हें अब तक बहुत कम तकनीकी सहयोग मिला है। ‘आदि वाणी’, ‘भाषिणी’ और ‘AI4भारत’ जैसी पहलें भारतीय भाषाओं के लिए अनुवाद, स्पीच रिकग्निशन (बोलने की पहचान) और अन्य तकनीकी सुविधाओं को विकसित कर रही हैं। इनमें सबसे उल्लेखनीय है ‘स्रावाणी’ (SraVaani) – एक ऐसा AI मॉडल जिसे 65 भारतीय भाषाओं और बोलियों (जिनमें 40 से अधिक क्षेत्रीय भाषाएं शामिल हैं) पर प्रशिक्षित किया गया है। यह स्पीच टेक्नोलॉजी में लंबे समय से चली आ रही कमी को दूर करने का प्रयास करता है। जिन भाषाओं को अब तक पर्याप्त तकनीकी मदद नहीं मिली है या जो संविधान की अनुसूची में शामिल नहीं हैं, उन तक स्पीच टेक्नोलॉजी पहुंचाकर, ये पहलें डिजिटल दुनिया में इन भाषाओं की उपस्थिति बढ़ा सकती हैं। इसी तरह, गूगल का ‘एंडेंजर्ड लैंग्वेजेज प्रोजेक्ट’ (लुप्तप्राय भाषा परियोजना) और पूर्वोत्तर भारत में समुदाय-आधारित AI वॉयस रिकॉर्डिंग यह दिखाती हैं कि तकनीक किस तरह लुप्त होने की कगार पर खड़ी भाषाओं को दर्ज करने और उन्हें पुनर्जीवित करने में दोहरी भूमिका निभा सकती है।

हालाँकि, किसी भाषा का अस्तित्व अंततः उसे बोलने वाले समुदाय पर निर्भर करता है। असुर समुदाय, जो लगभग 24,000 की आबादी वाला एक ‘विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह’ (PVTG) है, मुख्य रूप से झारखंड में रहता है। यूनेस्को ने इनकी भाषा, ‘असुरी’ को “स्पष्ट रूप से संकटग्रस्त” (definitely endangered) की श्रेणी में रखा है। इस भाषा को न तो कोई संस्थागत समर्थन प्राप्त है, न ही इसकी कोई डिजिटल उपस्थिति है, और न ही इसे स्कूली पाठ्यक्रम में कोई जगह मिली है। फिर भी, जनजातीय कार्यकर्ता वंदना टेटे के नेतृत्व में, समुदाय के लोगों ने ‘असुर अखरा मोबाइल रेडियो’ की शुरुआत की है। इस पहल के ज़रिए, नेतरहाट के आस-पास लगने वाले साप्ताहिक हाटों में असुरी भाषा में संगीत, पारंपरिक कहानियाँ और स्थानीय समाचारों से जुड़े पहले से रिकॉर्ड किए गए कार्यक्रम सुनाए जाते हैं। भाषा को सार्वजनिक और डिजिटल मंचों तक पहुँचाकर, इस पहल ने असुरी भाषा और संस्कृति के बारे में जागरूकता बढ़ाने में मदद की है।

भारत ने लंबे समय से अपनी भाषाई विविधता को स्वीकार किया है। लेकिन इस विविधता को बचाए रखने के लिए सरकार के निरंतर समर्थन, तकनीक के सार्थक उपयोग और सबसे बढ़कर, ऐसे समुदायों की ज़रूरत है जो गर्व के साथ अपनी भाषाओं को अपनाना चाहें।

द टेलीग्राफ से साभार

रोहन कुरैशी एक सांस्कृतिक शोधकर्ता और लेखक हैं।

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