समय समाज
जब जमीन सिर्फ जमीन नहीं थी
ओमप्रकाश तिवारी
भूमि सुधार, ऊसर सुधार और इंदिरा गांधी की वह विरासत जिसे नई पीढ़ी भूलती जा रही है
भारत जैसे कृषि प्रधान समाज में जमीन केवल संपत्ति नहीं होती। जमीन सम्मान है, सुरक्षा है, आत्मनिर्भरता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए भविष्य की गारंटी है।
जिस व्यक्ति के पास अपनी जमीन नहीं होती, वह इस बात को सबसे गहराई से समझता है। खेत का छोटा-सा टुकड़ा उसके लिए सिर्फ मिट्टी का टुकड़ा नहीं होता। वह उसे पहली बार यह अहसास देता है कि उसके पास भी कुछ अपना है—जिस पर उसका अधिकार है, जिसके सहारे वह अपने बच्चों का भविष्य बना सकता है और जिसके कारण समाज में उसका सिर कुछ और ऊंचा हो जाता है।
आज की पीढ़ी के लिए यह बात शायद उतनी सहज नहीं है। शहरों में पली-बढ़ी या ऐसी परिस्थितियों में बड़ी हुई पीढ़ी, जिसने जमीन की कमी और भूमिहीनता का दर्द नहीं देखा, उसके लिए यह समझना कठिन है कि कभी एक-दो बीघा जमीन मिल जाना भी किसी गरीब परिवार के जीवन की दिशा बदल देने वाली घटना हुआ करती थी।
यहीं से भारत के भूमि सुधारों का महत्व समझ में आता है।
भूमि सुधार का मतलब क्या था?
आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी सामाजिक-आर्थिक समस्याओं में से एक थी—भूमि का असमान वितरण।
एक तरफ बड़े भू-स्वामी थे, दूसरी तरफ ऐसे खेतिहर मजदूर और ग्रामीण परिवार थे जिनके पास खेती करने के लिए अपनी जमीन तक नहीं थी। आजादी के बाद भूमि सुधारों में जमींदारी और बिचौलिया व्यवस्थाओं का उन्मूलन, काश्तकारी सुधार, भूमि-सीमा कानून, अतिरिक्त भूमि का वितरण, चकबंदी और सरकारी तथा बंजर भूमि को भूमिहीन ग्रामीणों तक पहुंचाने जैसे कदम शामिल थे।
यह समझना भी जरूरी है कि इन सुधारों की शुरुआत इंदिरा गांधी से नहीं हुई थी। आजादी के शुरुआती दशकों में विभिन्न राज्यों ने अपने-अपने भूमि सुधार कानून बनाए। उत्तर प्रदेश में भी भूमि सुधार और भूमि-सीमा से जुड़े महत्वपूर्ण कानून उनसे पहले लागू हो चुके थे।
लेकिन इंदिरा गांधी के दौर में इस सवाल को राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में लाया गया।
इंदिरा गांधी और भूमि का सवाल
1975 में इंदिरा गांधी सरकार ने 20 सूत्री कार्यक्रम घोषित किया। उसमें कृषि भूमि पर सीमा लागू करने और अतिरिक्त भूमि को ग्रामीण गरीबों में बांटने को स्पष्ट स्थान दिया गया। 1982 में जब कार्यक्रम का पुनर्गठन हुआ, तब भी कृषि भूमि की सीमा लागू करना और अतिरिक्त भूमि का वितरण उसके प्रमुख बिंदुओं में रहा।
यह सिर्फ कागज पर लिखी हुई बात नहीं थी। भूमि सुधार की सरकारी नीति में सीलिंग से प्राप्त अतिरिक्त जमीन, सरकारी बेकार/बंजर जमीन और भूदान की जमीन को भूमिहीन ग्रामीण गरीबों तक पहुंचाने पर जोर दिया गया।
भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, भूमि-सीमा कानूनों के तहत लगभग 73.67 लाख एकड़ भूमि को अतिरिक्त घोषित किया गया, करीब 64.97 लाख एकड़ पर कब्जा लिया गया और लगभग 54.03 लाख एकड़ भूमि 57.46 लाख ग्रामीण गरीबों में वितरित की गई। इनमें लगभग 51 प्रतिशत लाभार्थी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से थे। सरकारी वेस्टलैंड के वितरण के तहत भी लगभग 147.47 लाख एकड़ भूमि भूमिहीन ग्रामीण गरीबों को दी गई।
इन आंकड़ों को केवल सरकारी उपलब्धि के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।
इनके पीछे लाखों परिवारों की जिंदगी थी।
किसी के घर पहली बार खेत आया।
किसी के बच्चे पहली बार अपने खेत की मेड़ पर खेले।
किसी परिवार ने मजदूरी के साथ-साथ अपनी फसल उगानी शुरू की।
किसी ने जमीन के सहारे साहूकार पर निर्भरता कम की।
और सबसे बड़ी बात—भूमिहीन आदमी भूमिधर बना।
जमीन का एक टुकड़ा क्यों इतना बड़ा बदलाव था?
जिस व्यक्ति के पास जमीन नहीं होती, उसके पास अक्सर अपनी मेहनत के अलावा कुछ नहीं होता।
वह दूसरों के खेत में काम करता है। फसल उसकी मेहनत से पैदा होती है, लेकिन जमीन उसकी नहीं होती। बारिश अच्छी हो या खराब, फसल का जोखिम उसका पूरा नहीं होता, मगर उसकी रोजी-रोटी हमेशा असुरक्षित रहती है।
ऐसे व्यक्ति को जमीन मिलना केवल आर्थिक परिवर्तन नहीं था।
यह मनोवैज्ञानिक परिवर्तन भी था।
वह कह सकता था—
“यह खेत मेरा है।”
यही दो शब्द किसी गरीब परिवार की सामाजिक स्थिति बदलने के लिए काफी थे।
आज जमीन की कीमत करोड़ों रुपये में सुनने वाली पीढ़ी शायद यह भूल जाती है कि कभी जमीन का एक छोटा टुकड़ा किसी गरीब के लिए बैंक खाते से अधिक बड़ा सुरक्षा कवच था।
लेकिन भूमि सुधार की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती
भूमि मिल जाने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती।
अगर जमीन ऊसर है, उसमें पानी नहीं है, उसमें फसल नहीं होती, या मिट्टी में लवणता इतनी ज्यादा है कि गेहूं और धान तक पैदा न हो सकें, तो कागज पर जमीन का मालिक बनना और वास्तविक अर्थ में किसान बनना दो अलग-अलग बातें हैं।
यहीं ऊसर भूमि सुधार का महत्व सामने आता है।
उत्तर भारत, खासकर गंगा के मैदानी इलाकों में बड़ी मात्रा में ऐसी जमीन रही है जिसे स्थानीय भाषा में ऊसर कहा जाता है। वैज्ञानिक भाषा में इसका एक बड़ा हिस्सा सोडिक या क्षारीय मिट्टी है।
ऐसी मिट्टी में लवणता और सोडिसिटी के कारण पौधों की वृद्धि बुरी तरह प्रभावित होती है। कई जगहों पर फसल पैदा करना लगभग असंभव हो जाता है।
उत्तर प्रदेश में इस समस्या का पैमाना बहुत बड़ा रहा है। ICAR के अनुसार, आज भी राज्य में लगभग 14 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की आर्थिक उत्पादकता पर सोडिसिटी, लवणता और उससे जुड़ी समस्याओं का असर है।
ऊसर से उपजाऊ खेत तक
ऊसर जमीन को खेती योग्य बनाना कोई जादू नहीं था।
इसके पीछे वर्षों का वैज्ञानिक अनुसंधान और सरकारी निवेश था।
ICAR के केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान ने 1960 के दशक के अंत से समस्या वाली मिट्टियों पर काम किया। जिप्सम के प्रयोग, जल निकास, सिंचाई और लवण-सहिष्णु फसलों की तकनीक विकसित की गई। ICAR के अनुसार, जिप्सम तकनीक से देश में लगभग 20.7 लाख हेक्टेयर सोडिक भूमि के पुनर्वास में मदद मिली।
उत्तर प्रदेश में भी 1970 के दशक से ऊसर भूमि के पुनर्वास के प्रयोग और योजनाएं चलती रहीं। उपलब्ध शोध के अनुसार, शुरुआती वर्षों में काम धीमा था, लेकिन बाद में बड़े पैमाने पर सरकारी योजनाओं और संस्थागत प्रयासों से इसकी गति बढ़ी। 1998-99 तक लगभग 0.42 मिलियन हेक्टेयर और 2001-02 तक लगभग 0.51 मिलियन हेक्टेयर सोडिक भूमि के पुनर्वास का आंकड़ा दर्ज किया गया; 2006-07 तक यह विभिन्न योजनाओं के तहत लगभग 0.64 मिलियन हेक्टेयर तक पहुंच गया।
इसलिए ऊसर सुधार को केवल एक नेता की व्यक्तिगत उपलब्धि कहना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही गलत होगा कि इस पूरे दौर में सरकारों द्वारा किए गए उस बड़े प्रयास को ही भुला दिया जाए, जिसने ऐसी जमीन को फिर से उत्पादन में लाने की दिशा में काम किया।
ऊसर जमीन पर गेहूं की बालियां केवल फसल नहीं थीं
सोचिए उस किसान के बारे में जिसकी जमीन पर पहले घास तक मुश्किल से उगती थी।
उसकी आंखों के सामने जब पहली बार गेहूं की बालियां आई होंगी तो वह दृश्य उसके लिए किसी सरकारी रिपोर्ट का आंकड़ा नहीं रहा होगा।
वह उसके जीवन का प्रमाण रहा होगा।
“मेरी जमीन अब बेकार नहीं है।”
और जब उसी खेत की फसल उसके घर के चूल्हे तक पहुंची होगी, तब ऊसर सुधार का असली अर्थ सामने आया होगा।
आज हम जब गेहूं की लहलहाती फसल देखते हैं तो अक्सर सिर्फ उत्पादन देखते हैं।
हमें यह भी देखना चाहिए कि कई जगह वह जमीन कभी ऐसी थी जिस पर खेती करना लगभग असंभव था।
ICAR के एक अध्ययन में उत्तर प्रदेश के सोडिक क्षेत्र में पुनर्वास के बाद पहले अनुपजाऊ पड़े खेतों को खेती में लाए जाने और धान-गेहूं की उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। तीन वर्ष के पुनर्वास के बाद पहले uncultivated रहे खेत खेती के अंतर्गत आ गए और फसल उत्पादन में नुकसान भी काफी कम हुआ।
यह काम सिर्फ मिट्टी का सुधार नहीं था
ऊसर सुधार को केवल कृषि तकनीक मानना भी अधूरा होगा।
यह गरीबी सुधार का कार्यक्रम भी था।
क्योंकि जिस गरीब के पास जमीन है लेकिन जमीन उपजाऊ नहीं है, उसकी स्थिति उस गरीब से बहुत अलग नहीं होती जिसके पास जमीन ही नहीं है।
इसलिए भूमि सुधार का पहला चरण था—
जमीन तक पहुंच।
और भूमि विकास का अगला चरण था—
उस जमीन को उत्पादन के योग्य बनाना।
एक ने अधिकार दिया।
दूसरे ने उस अधिकार को आर्थिक ताकत में बदलने का रास्ता दिया।
यही कारण है कि भूमि सुधार और भूमि विकास को अलग-अलग खानों में देखने के बजाय ग्रामीण सामाजिक परिवर्तन की एक ही श्रृंखला के रूप में देखना चाहिए।
“लाभार्थी” शब्द से आगे की कहानी
आज सरकारी भाषा में “लाभार्थी” शब्द बहुत सामान्य हो गया है।
लेकिन पिछली पीढ़ी के लिए जमीन पाने वाला व्यक्ति केवल “लाभार्थी” नहीं था।
वह अधिकार पाने वाला नागरिक था।
यह अंतर महत्वपूर्ण है।
कल्याणकारी राज्य का उद्देश्य किसी गरीब व्यक्ति को हमेशा किसी योजना का लाभार्थी बनाए रखना नहीं, बल्कि उसे इतना सक्षम बनाना होना चाहिए कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके।
जमीन का पट्टा, खेत का मालिकाना हक और उसे उपजाऊ बनाने की सुविधा—ये किसी गरीब को सिर्फ तत्काल राहत नहीं देते। ये उसे आत्मनिर्भरता की शुरुआत देते हैं।
यही वह दृष्टि थी जिसमें भूमि सुधार को देखा गया।
लेकिन इतिहास को रोमांटिक बनाने की जरूरत भी नहीं
भूमि सुधारों की कहानी पूरी तरह सफल कहानी भी नहीं थी।
कई राज्यों में भूमि-सीमा कानूनों को लागू करने में कानूनी अड़चनें आईं। अतिरिक्त भूमि की पहचान, मुकदमेबाजी, प्रशासनिक कमजोरी और राजनीतिक प्रभाव ने कई जगह प्रक्रिया को धीमा किया। विशेषज्ञ अध्ययनों में भी भारत के भूमि सुधारों की सीमित सफलता और राज्यों के बीच बड़े अंतर की चर्चा मिलती है।
इंदिरा गांधी के 20 सूत्री कार्यक्रम के दौरान भी अतिरिक्त भूमि के वितरण को लेकर आलोचनाएं हुईं और संसद में यह सवाल उठाया गया कि घोषित अतिरिक्त भूमि का पर्याप्त हिस्सा वास्तव में भूमिहीनों तक क्यों नहीं पहुंचा।
इसलिए इतिहास के साथ न्याय करने का अर्थ यह नहीं कि हम हर सरकारी दावे को बिना जांचे स्वीकार कर लें।
बल्कि सही बात यह है कि—
जहां सफलता हुई, उसे याद रखा जाए; जहां कमी रही, उसे भी स्वीकार किया जाए।
आज की पीढ़ी को क्या याद रखना चाहिए?
आज जमीन की कीमत बढ़ गई है।
कई गांव शहरों के विस्तार में आ गए हैं। जमीन के छोटे से टुकड़े की कीमत लाखों-करोड़ों रुपये तक पहुंच गई है।
लेकिन जमीन का महत्व केवल उसकी बाजार कीमत से तय नहीं होता।
किसी बुजुर्ग किसान से पूछिए, जिसने जीवन भर दूसरों के खेत में मजदूरी की और फिर उसे अपना छोटा-सा खेत मिला था।
वह शायद आपको जमीन की कीमत रुपये में नहीं बताएगा।
वह कहेगा—
“अब किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं थी।”
यही भूमि सुधार का सबसे बड़ा अर्थ है।
इतिहास को पार्टी की नजर से नहीं, समाज की नजर से देखिए
इंदिरा गांधी की राजनीति पर बहस हो सकती है। उनके शासन की आलोचना भी हो सकती है। आपातकाल पर इतिहास का अपना कठोर मूल्यांकन है और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रश्न पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए।
लेकिन किसी राजनीतिक नेता के पूरे मूल्यांकन को केवल उसके विवादित अध्यायों तक सीमित कर देना भी इतिहास के साथ न्याय नहीं है।
इसी तरह किसी सरकार की उपलब्धि को केवल इसलिए नकार देना कि आज की राजनीति में उससे असहमति है, यह भी इतिहास को छोटा करना है।
भूमि सुधार, अतिरिक्त भूमि का वितरण, ग्रामीण गरीबों के लिए भूमि तक पहुंच और ऊसर जैसी अनुपजाऊ जमीन को उत्पादन में लाने के प्रयासों को उसी ऐतिहासिक संदर्भ में देखना चाहिए जिसमें वे हुए।
क्योंकि उस दौर में भारत का एक बड़ा सवाल यह था—
जिसके पास जमीन नहीं है, उसे जमीन कैसे मिले?
और दूसरा सवाल था—
जिस जमीन पर कुछ उगता नहीं, उस पर फसल कैसे उगे?
पहले सवाल का जवाब भूमि सुधारों ने खोजा।
दूसरे का जवाब भूमि विकास और वैज्ञानिक ऊसर सुधार ने।
इन दोनों प्रक्रियाओं ने मिलकर लाखों ग्रामीण परिवारों के जीवन को प्रभावित किया।
नई पीढ़ी के लिए सबसे जरूरी सबक
किसी भी समाज की स्मृति केवल बड़े बांधों, बड़ी फैक्ट्रियों और बड़े शहरों की कहानी नहीं होती।
कभी-कभी इतिहास सबसे छोटे खेत की मेड़ पर लिखा होता है।
वह उस किसान के चेहरे पर लिखा होता है जिसने पहली बार अपने खेत में हल चलाया।
उस परिवार की आंखों में लिखा होता है जिसने पहली बार अपनी जमीन की फसल घर में रखी।
और उस बच्चे के भविष्य में लिखा होता है जिसके पिता को अब केवल मजदूरी पर निर्भर नहीं रहना पड़ा।
इसलिए जब हम भूमि सुधार की बात करें तो उसे सिर्फ आंकड़ों में न समेटें।
एक एकड़ के पीछे एक परिवार था।
एक खेत के पीछे एक आत्मसम्मान था।
एक ऊसर जमीन के पीछे एक अधूरा सपना था।
और उस जमीन में फसल उगना सिर्फ कृषि की सफलता नहीं, जीवन की वापसी थी।
इसीलिए इतिहास को याद रखना जरूरी है।
क्योंकि जो पीढ़ी यह भूल जाती है कि उसके गांव के गरीबों को जमीन कैसे मिली, ऊसर खेत खेती योग्य कैसे बने और भूमिहीन परिवार जमीन के मालिक कैसे बने—वह केवल एक राजनीतिक इतिहास नहीं भूलती।
वह अपने समाज के संघर्ष और परिवर्तन की कहानी भूल जाती है।
भूमि सुधार की असली उपलब्धि यही थी कि उसने जमीन के मालिकों की सूची में उन लोगों का नाम जोड़ा, जिनके पास कभी जमीन नहीं थी।
और ऊसर सुधार की असली उपलब्धि यह थी कि उसने ऐसी जमीन को, जिसे लोग बेकार समझ चुके थे, फिर से खेत बना दिया।
इन दोनों को याद रखना किसी व्यक्ति की पूजा करना नहीं है।
यह उस दौर के उन लाखों गरीब परिवारों के संघर्ष और बदलाव को याद रखना है, जिनके लिए जमीन सचमुच जिंदगी बदल देने वाली चीज थी।
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