संबोधन में छिपा अपनापन

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

लघु कथा

संबोधन में छिपा अपनापन

डॉ रीटा अरोड़ा

 

“दीदी, आप मेरी बात मान क्यों नहीं रही हैं?”

“क्योंकि हर बार तुम्हारी बात सही हो, यह जरूरी नहीं है!”

सविता और मीना पड़ोस में रहने वाली दो महिलाएँ थीं। छोटी-सी बात पर सुबह से दोनों में तकरार चल रही थी। बात बढ़ी तो दोनों ने एक-दूसरे से बोलना तक बंद कर दिया।

तभी राधा वहाँ पहुँची। दोनों के चेहरे देखकर उसने पूछा, “क्या हुआ दीदियों?”

सविता झट से बोली, “इससे पूछो! मेरी बात सुनने को तैयार ही नहीं है।”

मीना भी बोल पड़ी, “दीदी भी कह दिया और मेरी बात मानती भी नहीं!”

राधा हँसते हुए बोली, “अरे दीदी, अब छोड़ो भी। इतनी-सी बात के लिए मन क्यों खराब कर रही हो?”

कुछ पल के लिए दोनों चुप हो गईं।

मीना ने धीरे से पूछा, “दीदी, चाय पियोगी?”

सविता ने उसकी ओर देखा, “हाँ, लेकिन चीनी कम रखना।”

“अच्छा दीदी।”

राधा चुपचाप दोनों को देखती रही। कुछ देर पहले जो शब्द एक-दूसरे को चोट पहुँचा रहे थे, अब उन्हीं के बीच ‘दीदी’ का संबोधन बार-बार लौट रहा था।

शिकायतें शायद अभी बाकी थीं, नाराज़गी भी पूरी तरह नहीं गई थी। फिर भी बातचीत का स्वर बदल चुका था।

राधा ने सोचा—कभी-कभी रिश्तों को जोड़ने के लिए बड़े तर्क नहीं, बस एक छोटा-सा अपनापन भरा संबोधन ही काफी होता है।

लेकिन क्या सचमुच रिश्ते संबोधनों से ही बंधे रहते हैं?

~डॉ रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल>
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