नरसिंह कुमार ‘मयूर’ की दो कविताएं

नरसिंह कुमार ‘मयूर’ की दो कविताएं

 

तर्क, डर और अंधविश्वास

 

डर का आवरण और तर्क का आलोक

दंतकथाओं का जो ताना-बाना बुनते हैं,

 

वो भय के गहरे साये में ही जीते हैं।

तार्किक वो हैं जो डर से पार निकल आए,

अज्ञान का अँधेरा जो प्रज्ञा से पीते हैं।

 

इशारों में समझो तो जग की सच्चाई है,

जहाँ इंसानी मन ने ही सीमाएँ बनाई हैं।

 

जब-जब ढाए गए इबादतगाह और देवालय,

तब पत्थरों में नहीं, इन्साँ में आई तन्हाई है।

 

न कोई अलौकिक शक्ति आई घर को बचाने,

ना आसमान से उतर आए कोई मसीहा पुराने।

 

जब-जब पूरी दुनिया पर संकट गहराया,

मानव की बुद्धि ही आई उसे राह दिखाने।

 

भय ही तो अंधविश्वास की मूल जड़ है,

तर्क ही हर झूठ के आगे अड़ा धड़ है।

 

छोड़कर डर के साए, ज्ञान का दीप जलाएँ,

अंधविश्वास की बेड़ियों को मिलकर आज मिटाएँ।

——————————-

 

नैरेटिव का खेल और सच की तलाश

 

नीतियों और सिद्धांतों की, अब बात नहीं होती,

मुद्दों पर गंभीर बहस की, कोई रात नहीं होती।

 

एक तरफ़ा नैरेटिव का, जाल बुना जाता है,

चुनिंदा सवालों का ही, शोर सुना जाता है।

 

नैतिकता का तराजू भी, सहूलियत से तौले,

एक तरफ तो चुप्पी साधे, दूजे पर ही बोले।

 

व्यक्तिगत हमलों की राजनीति, जब ज़ोर पकड़ती है,

जनता के असली मुद्दों की, सांसें तब उखड़ती हैं।

 

तर्क की जगह जब गाली और, आरोप चलाए जाएँ,

निष्पक्षता के नकाबों में, षड्यंत्र छिपाए जाएँ।

 

विरोधियों की छवि बिगाड़ना, ही जब लक्ष्य बने,

सत्य की आवाज़ दबाकर, मिथक के अक्ष बने।

 

दूध के धुले बनने की होड़ में, सब उलझे रहते हैं,

जनता के प्रश्नों से भागकर, अपने नैरेटिव कहते हैं।

 

पर राजनीति का अर्थ तो केवल, जन-सेवा का भाव है,

सत्ता के इस खेल से परे, सच का ही प्रभाव है।

—————

0