कविता
मंचन सत्य का
नरसिंह कुमार ‘मयूर’
भगवा की ओढ़ के चादर,
जो छल का खेल रचाते हैं,
धर्म-कर्म की बातें करके,
जनता को भरमाते हैं।
संसद के प्रांगण में जब,
वो पर्दाफाश किया गया,
पाखंडी किरदारों का,
जब मंचन खास किया गया।
सत्य दिखा तो तिलमिलाए,
जो छद्म वेश में बैठे हैं,
सत्ता के गलियारों में,
जो झूठी ऐंठ में बैठे हैं।
नारी की गरिमा से खेले,
संतों की पहचान चुराया,
धर्म नाम पर लूटा जग को,
राम नाम की तान सुनाया।
मातृभूमि की पावन माटी,
स्वर्ग से भी है ऊपर,
दंभ और पाखंड का चेहरा,
उतर गया अब भूतल पर।
जाग उठी है जनता अब,
चालें सब पहचान रही,
कौन लुटेरा, कौन पुजारी,
सच को अब वो जान रही।
नाटक नहीं, ये चेतावनी,
उन ढोंगियों के नाम है,’मयूर’
मर्यादा की रक्षा करना ही,
अब हर नागरिक का काम है।
