जसवीर त्यागी की पांच कविताएं

जसवीर त्यागी की पांच कविताएं

समय

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मेरे पास एक पुरानी घड़ी है
नौकरी लगने के समय की
लंबे समय से हम दोनों एक-दूसरे के साथ हैं
जीवन के अच्छे-बुरे हालातों में
वह सदा मेरे साथ रही

यदा-कदा उसमें जब भी कोई खराबी आती
मैं उसे घड़ीसाज से मिलवा लाता
एक बार बाज़ार घूम आने के बाद
वह बहुत दिनों तक शांत रहती
और खामोशी से अपना काम करती रहती

पिछले कुछ दिनों से
घड़ी अपना काम ठीक से नहीं कर रही थी
मैं उसे पुराने घड़ीसाज के पास लेकर गया
वहाँ पहुँचकर मैंने देखा
एक लंबी कतार में बहुत सारे लोग
अपनी-अपनी घड़ियों के साथ वहाँ प्रतीक्षारत हैं

कतार में मेरा नम्बर अंतिम था
मैंने देखा कुछ लोग पुरानी घड़ियों के बदले
नयी घड़ियाँ खरीद रहे हैं
कुछ पुरानी घड़ियों को ही ठीक करवाने में लगे हैं

पंक्ति में खड़े-खड़े मैंने महसूस किया
बहुत सारे लोगों का समय खराब चल रहा है

और हर कोई
सही समय का बेताबी से इंतजार कर रहा है।

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किसी की हँसी

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कुछ लोग बहुत हँसते हैं
उनकी हँसी से कई बार
दूसरे लोग सकते में आ जाते हैं
और वे हँसने वाले की हँसी के
रहस्यों को टटोलने लगते हैं

इंसान को किसी का रोना ही
दुविधा में नहीं डालता
किसी की हँसी भी
खटके की खाई में धकेल देती है

दूसरों को लगता है
यह सामने वाला आदमी इतना क्यों हँसता है?
क्या इसके जीवन में
कोई दुःख,परेशानी या संकट नहीं ?

क्यों यह हँसी का हार पहनकर ?
इतराता फिरता है यहाँ से वहाँ

दूसरे उसकी हँसी को
हँसी के रूप में ही पकड़ते हैं
और अपने-अपने अनुमान के तीरों से
लगाते हैं उसकी हँसी पर निशाना

जरूरी नहीं जो हँस रहा है
वह सुखी-सम्पन्न ही हो
गौर से पढ़िए
उसके चेहरे पर अंकित हँसी का हस्ताक्षर

यह भी तो हो सकता है
जिसे तुम उसकी हँसी समझते हो
वह उसका रुदन हो
जो भेष बदलकर प्रकट हुआ हो।

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दूसरों के लिए

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घर में इंसानों से ज्यादा किताबें हैं
किताबें इतनी
कि मैं जिस कॉलोनी में रहता हूँ
उसकी आबादी से भी अधिक होंगी

फिर भी नयी किताबों का आकर्षण
मुझमें कम नहीं हुआ

अब जब किताबें खरीद ही लेता हूँ
तो उनको रखने
और सहेजने की जिम्मेदारी भी मेरी ही है

किताबों की अलमारी से अनुनय-विनय करता हूँ
कि नयी किताबों के सिर पर अपना हाथ रखे
और उनका माथा चूमकर अपनी संगत में उन्हें ले

अलमारी नेह भरे नयनों से
दूसरी किताबों की ओर देखती है
पुरानी किताबें नयी किताबों की ओर
आँख उठाकर भी नहीं देखतीं

मैं अलमारी की बड़ी-बड़ी किताबों से आग्रह करता हूँ
कि वे अपनी दरियादिली का दरवाजा खोलकर
नयी किताबों को अंक में भर दुलार ले

अलमारी की बड़ी-बड़ी किताबें
टस से मस नहीं होती
अपने गुरुर भरी गलियों में टहलती रहती हैं

जब पुरानी बड़ी किताबें
नयी किताबों की अंगुली नहीं पकड़ती
मैं उदासीनता की उमस से परेशान हो उठता हूँ

तब अलमारी की छोटी किताबें आगे आकर
नयी किताबों को गले लगाती हैं
और अपनी मूल जगह भी
नयी किताबों के स्वागत में छोड़ देती हैं

सब बड़ी-बड़ी किताबों की चर्चा करते हैं
उन्हीं पर रखरखाव का खर्चा करते हैं

बड़ा वह नहीं
जो आकार-प्रकार कीमत में बड़ा है
बड़ा वही होता है
जो दूसरों के लिए खड़ा है।

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कुछ लोग

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संसार में असंख्य लोग हैं
हम जानते हैं

लेकिन हम
असंख्य लोगों को नहीं जानते

असंख्य में से
संख्य को जानते हैं

कुछ लोगों से ही है हमारी दुनिया आबाद
कुछ लोगों को हम
और कुछ हमें करते हैं याद

कुछ से ही है हमारी ख़ुशी
प्रेम-प्यार

कुछ से ही हैं हमारे उत्सव
तीज-त्योहार

कुछ से ही है
हमारी लड़ाई-झगड़ा तकरार

कुछ से ही हमारे सपने हैं
कुछ ही हमारे अपने हैं

कुछ के बीच ही
हम रोते-हँसते हैं

और कहने को तो
असंख्य लोगों की दुनिया में
हम बसते हैं।

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आकर्षण

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रेल की खिड़की के पास बैठा आदमी
बाहर का दृश्य देख रहा है

बाहर के लोग
रेल में बैठे हुए आदमी को देख रहे हैं

दोनों तरफ
कुछ-न-कुछ ऐसा है

जो भीतर-बाहर को
आर्कषक बना रहा है।

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